पंडित जी – एक संस्मरण – विभूति नारायण राय

पंडित जी – एक संस्मरण – विभूति नारायण राय

एक संस्मरणविभूति नारायण राय

 

दीपावली कहना हमेशा मुश्किल सा लगता है । दीवाली ज़्यादा सहज स्वाभाविक ढंग से बोलचाल मे निकलता है । इस दीवाली पर न जाने क्यों इंटरमीडिएट के अपने संस्कृत अध्यापक पंडित जयानन्द मिश्रा याद आ रहें हैं । उम्र के इस पड़ाव पर स्मृतियों का क्या ? आगे पीछे दौड़तीं हैं । पिछली दीवाली की चीजें धुँधली हैं पर अचानक पचास वर्ष पूर्व कालिदास के रघुवंशम को रस ले कर पढ़ाते हुये अपने अध्यापक का चेहरा पानी मे आधा डूबता आधा उतराता सा दीखता है । इस समय उनकी याद आने की दो वजहें हैं । एक तो मिथिला के किसी सुदूर अंचल से बनारस जैसे बड़े शहर मे आये मिश्र जिस तरह संस्कृत मे रमे रहते थे उसमे तद्भव के लिये यह आग्रह कि उनके छात्र दीपावली की जगह दीवाली कहें कुछ कुछ असंगत लगता था पर उनकी टोका टाकी अवचेतन पर आज भी ऐसे दर्ज़ है कि मुँह से दीपावली निकलने पर घबरा कर चारो तरफ़ देखता हूँ कि पंडित जी सुन तो नही रहे ।

दो वर्ष ही उन्होंने मुझे पढ़ाया और दोनो वर्ष दीवाली की छुट्टी के पहले वाले दिन वे हर साल की अपनी आदत के मुताबिक़ दीयों के त्योहार पर पूरे घंटे बोले । उसी विद्यालय मे अध्यापक हो गये उनके कुछ वरिष्ठ छात्र  निर्दोष आनंद ले ले कर उन के उद्बोधन के लगभग प्रत्याशित आदि , मध्य और अंत बताते चलते थे । उनका एक प्रिय विषय था कि अंतरतम के कूड़े करकट की सफ़ाई  बाहरी साफ़ सफ़ाई से ज़्यादा महत्वपूर्ण है । छात्र कितना सीखते थे , यह कह सकना तो मुश्किल है पर बाहर निकलने के बाद ठहाके लगाते हुये अंदरूनी सफ़ाई की व्याख्या ज़रूर बड़ी दिलचस्प होती । उनका दूसरा प्रिय विषय सुशासन था , जो अयोध्या वापसी के बाद राम द्वारा स्थापित शासन प्रणाली से था और जो जनता के सारे दुःख दर्द की दवा था । यही दूसरा विषय एक कारूणिक प्रसंग मे आज मुझे सता रहा है ।

वर्षों बाद जब मै अपनी सेवा के दौरान बनारस मे नियुक्त हुआ तो अचानक एक दिन मुझे पंडित जी का संदेश मिला कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं , अस्वस्थता के कारण ख़ुद नही आ सकते , क्या मै उनके घर आ सकता हूँ ? ग्लानि हुयी कि इतने वर्षों मे कितनी बार इस शहर से गुज़रा पर मुझे ख़ुद अपने इस प्रिय शिक्षक की याद क्यों नही आयी । दीवाली दो दिन बाद थी मिठाई का एक डब्बा लेकर उसी शाम उनके यहाँ पँहुच गया । मेरे पिता मानते थे कि बिना संस्कृत पढ़े हिंदी नही आती इस लिये सालों तक गर्मियों की छुट्टियों मे हम संस्कृत का ट्यूशन पढ़ते । इसी चक्कर मे दो तीन साल उनके घर भी आया था । समय के साथ शहर में बहुत कुछ बदला था पर उनकी गली वैसी ही थी । एक मध्यवर्गीय आबादी की बसावट वाली इस गली को ढूँढने मे प्रयास नही करना पड़ा । पुराने ख़स्ता हाल मकान मे समय जैसे रुक सा गया था । जिस मोटी सी कुंडी को खटखटाने पर अंदर आपकी सूचना पहुँचती थी , वह अभी भी यथावत थी पर उसके बगल मे ही एक काल बेल लगी दिखी । दबाते ही एक लड़का बाहर निकल आया ।

सालों बाद भी एक परिचित सी सीलन का झोंका नाक से टकराया । घुसते ही एक छोटा सा कमरा , फिर आँगन जो हमेशा की तरह गीला था , सामने एक बरामदे को घेर कर बनायी गयी रसोई और उसके बगल से ऊपर जाने वाली तंग सीढ़ी । कुछ भी बताने की ज़रूरत नही थी , मै बिना किसी इशारे के ऊपर चढ़ता गया । ऊपर के दो छोटे कमरों को मिला कर यह मकान बनता है और इनके बाहर का बरामदा हमारे संस्कृत ट्यूशन का केंद्र था जहाँ एक आसनी बिछा कर पंडित जी पालथी मार कर बैठे होते और सामने एक कंबल को तहाकर जो आसन बनता था उस पर छात्र बैठते थे । उन दिनो  तनख़्वाहें इतनी कम  थी कि ज़्यादातर अध्यापक ट्यूशन पढ़ाते थे , हालाँकि अभी तक शिक्षा व्यवसाय नही बनी थी । छात्र एक या दो के बैच मे आते और गुरु शिष्यों को नंबर से नही वरन नाम से पहचानते थे । सीढ़ी से छत पर पहुँचते ही आदतन नज़र बरामदे पर गयी और धक्क से रह गया । गुरु की आसनी और शिष्यों के बैठने की व्यवस्था ग़ायब थी और उस स्थान को एक झिनगा खटिया भर रही थी । बिना किसी औपचारिक घोषणा के मै समझ गया कि एक समय के तेजस्वी काया के गौरवर्णी पंडित जयांनद मिश्र एक कृषकाय पीतवर्णी ढाँचे की शक्ल मे लेटे हुये हैं ।

वे देर तक अपने बगल पड़ी कुर्सी पर बिठा कर मेरा हाथ पकड़े सहलाते रहे । समझ मे आया कि उन्हे अपने ‘योग्य’ शिष्य पर गर्व है और भी इसी तरह की औपचारिक बातें जिन्हें यहाँ दोहराने का मतलब नही है । जो मुझे साझा करना है वह दीवाली और सुशासन से जुड़ा प्रसंग है । वे स्मृतियों की भूल भूलैया मे यात्रा कर रहे थे और अचानक उन्होंने जो कहा उस से मै हिल गया । बुदबुदाते हुये उन्होंने कहा कि पहले तो वे दीवाली कुत्ते की तरह मनाते थे । मैंने घबरा कर कान उनके मुँह से लगभग सटा दिया । उन्हे जवानी के दिनो की संस्कृत पाठशाला याद आ रही थी जिसमे वे चालीस रुपये मासिक पर अध्यापक नियुक्त हुये थे । उन्ही दिनो एक बार विद्यालय का मुआयना करने डिप्टी साहब पधारे । मिथिला की जलमग्न धरती पर  डिप्टी साहब नाँव से उतरे तो उनकी अभ्यर्थना के लिये खड़े युवा जयानंद को दो चीज़ें अब तक याद हैं । एक तो उनकी अफ़सरी का प्रतीक सोला हैट और दूसरा उनके साथ नाँव पर सफ़र करता बछड़े जैसे आकार का कुत्ता । कुत्ते की ज़ंजीर पकड़े एक नौकर भी था और स्वाभाविक तौर से ये दोनो भी छात्रों और अध्यापकों के भय मिश्रित उत्सुकता के पात्र बने ।

मुआयने भर चलन के मुताबिक़ डिप्टी साहब मास्टरों को डाँटते रहे और जैसे ही मौक़ा पाते कुत्ते के सेवक को डाँटने लगते कि वह ग़रीबी और गंदगी मे लिथड़े बच्चों को टामी नामधारी कुत्ते को छूने दे रहा है । अफ़सर को ख़ुश करने के चक्कर मे किसी अध्यापक ने पूँछ लिया कि श्रीमान कुत्ता खाता क्या है ? एक स्निग्ध मुस्कान के साथ डिप्टी साहब ने नौकर को बुलाकर उससे दिन भर के श्वान  भोजन का मेन्यू पूँछा । नौकर ने  मुँह बाये अध्यापकों के सामने सुबह से रात तक के सामिष और निरामिष भोजन की जो सूची पेश की उस से ज़्यादातर को उस प्राणी से ईर्ष्या तो हुयी ही पर असली दिक्कत तब खड़ी हुयी जब मुआयना ख़त्म होने के बाद गणित के अध्यापक ने जोड़ कर बताया कि कुत्ते पर लगभग डेढ़ रुपया प्रतिदिन खर्च होता था यानि अध्यापकों के वेतन का लगभग ड्योढ़ा । इतना कहकर पंडित जी हंसे । पता नही क्यों उस कमज़ोर शरीर से लहरों मे आती हंसी मुझे रुदन की तरह  लगी ।

कुछ दिनो पहले आक्सफ़ैम के आँकड़े जारी हुये कि एक प्रतिशत भारतीयों की संपत्ति शेष निन्यानबे प्रतिशत की संपत्ति से अधिक है तो मुझे लगा कि जब देश के महाशक्ति बनने की घोषणा करने वाले इन आँकड़ों  को ईसाई षड़यंत्र

कहकर हंसते होंगे तो क्या वे सचमुच हंसते ही होंगे ?

 

N/A