विविध

औपनिवेशिक आधुनिकता और हिंदी साहित्य – राजकुमार

यदि मान लें कि आधुनिक युग की शुरुआत उन्नीसवीं सदी में हुई तो फिर यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। उन्नीसवीं सदी से पहले हिन्दी साहित्य शिष्ट और लोकसाहित्य से संवाद करते हुए विकसित होता रहा। किन्तु उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक शासन के दौरान शिष्ट और लोक के अतिरिक्त एक अन्य तत्त्व भी जुड़ गया। इसका सम्बन्ध पश्चिमी आधुनिकता से है। उन्नीसवीं सदी में अँग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत के साथ भारतीय प्रबुद्ध वर्ग पश्चिमी आधुनिकता से परिचित हो गया। पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

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पंडित जी – एक संस्मरण – विभूति नारायण राय

दीपावली कहना हमेशा मुश्किल सा लगता है । दीवाली ज़्यादा सहज स्वाभाविक ढंग से बोलचाल मे निकलता है । इस दीवाली पर न जाने क्यों इंटरमीडिएट के अपने संस्कृत अध्यापक पंडित जयानन्द मिश्रा याद आ रहें हैं । उम्र के इस पड़ाव पर स्मृतियों का क्या ? आगे पीछे दौड़तीं हैं । पिछली दीवाली की चीजें धुँधली हैं पर अचानक पचास वर्ष पूर्व कालिदास के रघुवंशम को रस ले कर पढ़ाते हुये अपने अध्यापक का चेहरा पानी मे आधा डूबता आधा उतराता सा दीखता है ।

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शख्सियत : जौहर की गत जौहरी जाने – मीना बनर्जी

राशिद ख़ान! राशिद ख़ान!- भई क्या आवाज पाई है और क्या अंदाज़ है। जो भी सुने, इन बातों का कायल हुए बिना नही रह सकता। सो चाहने वालों की कमी भी नहीं। वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, कवि, संगीतकार या फिर विद्यार्थी, दुकानदार यहाँ तक कि टैक्सी चालक तक। इंदीपॉप और फिल्मी गानों के इस दौर में शास्त्रीय गायक की ऐसी लोकप्रियता से आश्चर्य? नहीं, राशिद के संगीत की तासीर ही कुछ ऐसी है।

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