कहानी : झूठे थे वे माफ़ीनामे! – मधु कांकरिया
अम्मा जी आसमान बन चुकी थी। धरती पर लावारिस सी पड़ी उनकी डायरी पर एकाएक मेरी नज़र पड़ गयी थी। डायरी का पहला पृष्ठ खोला। उसके बीचो बीच लिखा हुआ था ; ‘वापस लेती हूँ उन माफियों को जिन्हें मुझे परिवार से मजबूरन मांगनी पड़ी ,पर सच्चे मन से मैंने कभी नहीं मांगी वे माफियां क्योंकि मेरी जिन आवाज़ों को दबाया गया वे सिर्फ़ सच्चाइयों की बुलंद आवाज़ थी ,लेकिन दवाब में मुझे अपनी सच्ची आवाज़ के लिए भी 'सॉरी ‘ कहना पड़ा लेकिन वे सिर्फ़ मेरे अल्फाज थे रूह से निकले जज्बात नहीं।
