जब मानव को आत्मचेतन प्राणी कहा जाता है तो उसका आशय यह होता है कि वह अपने को शेष सृष्टि से न केवल अलग अनुभव करता है, बल्कि इस अलग होने पर विचार करने के साथ-साथ इस अलगाव, इस पार्थक्य के भाव को मिटाकर पुन: शेष सृष्टि से एकत्व महसूस करना तथा उसके उपायों की तलाश पर भी विचार करता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एरिक फ्रॉम का मानना है कि मानवीय आचरण को प्रभावित करनेवाले प्रबल तत्त्व उसके अस्तित्व की स्थितियों अर्थात उसके मानव होने की स्थिति में ही निहित होते हैं। मानव-स्थिति से फ्रॉम का तात्पर्य उस ऐतिहासिक-सामाजिक स्थिति में है, जिसमें मनुष्य आप ही मनोविश्लेषण के क्षेत्र में अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर फ्रॉम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य केवल जैविक आवेगों द्वारा निर्मित नहीं है, जैसा फ्रॉयड मानते हैं, बल्कि ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में जिन मानवीय भावनाओं यथा – प्रेम, स्वतंत्रता, सामाजिकता आदि का उसमें विकास हुआ है, वे ही उसकी जीवन शैली और आचरण को प्रभावित करनेवाली प्रेरक शक्तियाँ हैं – उन्हें किसी भी तरह जैविक आवेगों की अपेक्षा दूसरे दर्जे की प्रवृत्तियाँ नहीं स्वीकार किया जा सकता। इस प्रकार इस विचार ने मानव तथा उसके विकास को भावात्मक सांस्थानिक पृष्ठभूमि में समझाना चाहा।
तात्पर्य यह हुआ कि प्रेम, स्वतंत्रता, सामाजिकता, न्याय आदि मानव की वे सहजात भावनाएँ या मूल वृत्तियाँ है, जो उसके जीवन की दिशा और शैली के निर्धारण में प्रधान भूमिका निभाती हैं। स्वंतत्रता, प्रेम, सामाजिकता और न्याय की भावना से युक्त मानव-प्राणी की स्वचेतना की अनुभूति है और समाज में रहते इस स्वचेतना की सन्तुलित सिद्धि न पाने के कारण ही वैयक्तिक और सामूहिक स्तर पर मानसिक असन्तुलन पैदा होता है, जो मनोविक्षोभ का मूल कारण बन जाता है। इस प्रकार एरिक फ्रॉम स्वतंत्रता और सामाजिकता को, जो समाज-चिन्तन में मूल्य का दर्जा रखते हैं, मनोविज्ञान के क्षेत्र में मानव-प्रकृति की सहज वृत्ति बना देते हैं। यहाँ यह स्मरण कर सोच की प्रसंगांतर नहीं होगा कि डार्विन ने भी ‘डिसेंट ऑव मैन’ में यही माना है कि जीवन के मानव में रूपान्तरित होने के साथ ही नैतिकता और सामाजिकता के सवाल स्वत: ही उत्पन्न हो जाते हैं अर्थात ये प्रवृत्तियाँ मानव स्वभाव की सहज प्रवृत्तियाँ हैं।
लेकिन इस सहज स्वभाव के अनुसार सहज आचरण इतना सहज नहीं है क्योंकि ऐतिहासिक प्रक्रिया निरन्तर गतिशील और परिवर्तनशील है, अत: उसके बदलते हुए रूपों के साथ सही सम्बन्ध बनाए रखने में व्यक्ति और समाज को निरन्तर सक्रिय रहना पड़ेगा। स्वतंत्रता का अनुभव मानव-अस्तित्व का सहजात अनुभव है। मानव के रूप में अस्तित्व में आने के साथ ही मनुष्य अपने से इत्तर विश्व से स्वयं को स्वतंत्र और अलग अनुभव करने लगता है और बाह्य जगत की उसके लिए अपने से अलग एक अन्य इयत्ता होता है। लेकिन, स्वतंत्रता और अलगाव का यह अनुभव उसके लिए असहनीयता की हद तक कष्टप्रद होता है क्योंकि अलग होने में वह खुद को इस विशाल जगत के सम्मुख अपने को असहाय और अकेला पाता है। इस कष्टप्रद असहायता और अकेलेपन की भावना से उबारने के दो ही रास्ते हो सकते हैं। पहला है – अपनी स्वतंत्रता के बोध और तनाव से बच निकलने के लिए उपायों की खोज यानी प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीकों से किसी अन्य के सम्मुख अपनी स्वतंत्रता के समर्थन के माध्यम से जगत के साथ अलगाव को समाप्त करने का प्रयास। सभी प्रकार की राज्यवादी, समूहवादी या राष्ट्रवादी विचारधाराएँ, दल, कार्यक्रम आदि स्वतंत्रता के समर्थन के माध्यम से अलगाव दूर करने के रास्ते हैं। लेकिन वैसे प्रयास कभी भी मानव को उस तरह विश्व के साथ एक नहीं कर सकते, जिस प्रकार तब वह व्यक्ति मानव के रूप में विकसित होने से पूर्व था क्योंकि उसके एक व्यक्ति मानव होने के तथ्य को उलटा नहीं जा सकता। इस कारण यह प्रयास किसी स्वस्थ और सुखी जीवन की ओर ले जाने के बजाय एक कठोर संजाल में उसे फँसा देता है, जिसमें वह निरन्तर भय, दुिश्चन्ता और तनावों के बीच रहने को विवश हो जाता है क्योंकि इन विचारधाराओं और उनके कार्यक्रमों में वह उस स्वतंत्रता, प्रेम, सामाजिकता और न्याय का अनुभव नहीं कर पाता, जो उसी तरह सहजात भावनाएँ हाे गई हैं, जैसे भूख अथवा यौनेच्छा। इस प्रकार उसका अपना अस्तित्व ही उसके लिए असहनीय हो जाता है। सर्व सत्तावाद के सभी प्रकारों के व्यवहारिक रूप इतिहास में इन रास्तों के अन्याय के नहीं, बल्कि उनके मानवत्व-विरोधी होने की गवाही देते हैं। आधुनिक सामाजिक-राजनैतिक जीवन ही नहीं, वैयक्तिक जीवन के बहुत-से तनावों के मूल में भी यही तथ्य सक्रिय रहता है।
इस सारी प्रक्रिया में विचारों की भूमिका कम उत्तरदायी नहीं है। विचार की अपनी प्रक्रिया तर्क-प्रधान होती है, लेकिन किसी भी तर्क की प्रामाणिकता उस निष्कर्ष से जानी जा सकती है, जिस ओर वह ले जाता है, अर्थात यह देखना आवश्यक हो जाता है कि क्या तर्क का निष्कर्ष और उसका व्यावहारिक रूप उस दिशा में ले जाता है, जो मानव की सहजात भावात्मक प्रवृत्तियों अर्थात स्वतंत्रता, प्रेम, सामाजिकता आदि की निर्दोष सिद्धि का रास्ता है। यदि कोई विचार इन भावनाओं को पुष्ट करने के बजाय उन्हें ही नष्ट या आहत करता है तो यही मानना होगा कि उस विचार का मानव की सहमति भावनाओं अर्थात मानवत्व से सम्बन्ध विच्छेद हो जाने के कारण वह न केवल अन्याय बल्कि अवैज्ञानिक भी हो गया है क्योंकि वह मानव की मनोविज्ञानसम्मत भावात्मक सांस्कृतिक अावश्यकताओं की पूर्ति कर सकना तो दूर, बल्कि उसके विपरीत, उनका दमन करने लगा है। तात्पर्य यह कि अकेलेपन और असहायता की अत्यन्त कष्टप्रद स्थिति से उबरने का िनषेधात्मक रास्ता मनोवैज्ञानिक स्तर पर पर-पीड़न, आत्मपीड़न और स्वतंत्रता के अपने से इतर किसी सत्ता के सम्मुख समर्पण के विविध रूपों की ओर ले जाता है, जिससे अधिनायकवाद, सर्वसत्तावाद और विनाशात्मकता जैसी विकृतियाँ समाज में विकसित हो जाती हैं। ये सत्ताएँ राजनैतिक, आर्थिक या धार्मिक-सामाजिक भी हो सकती हैं। सामाजिक जीवन में रूढि़गत आचरण, जाति, सम्प्रदाय, दल, राज्य आदि पर निर्णय छोड़ देना तथा जनमत, कामनसेंस, यहाँ तक कि हर बात पर अाचरणसिद्ध अन्त:करण आदि भी सहज स्वतंत्रता से पलायन के विभिन्न ढंग हैं।
लोकतंत्र, समाजवाद या साम्प्रदायिकता जैसे विचार यद्यपि स्वतंत्रता, सामाजिकता अथवा बन्धुत्व जैसे भावों से प्रेरित होते हैं, लेकिन वे जब किसी संकीर्णता में बद्ध अथवा रूढि़गत होकर एक विचारधारा या उसका एक सख़्त कार्यक्रम होकर रह जाते हैं तो वे उन्हीं भावनाओं, मूल्यों अथवा उद्देश्यों का दमन करने लग जाते हैं, जो स्वयं उनकी प्रेरणा रहे होते हैं। धर्म एक ऐसी ही प्रवििध है जो मानव मात्र को विराट भाव से जोड़ती है, लेकिन जब किसी तत्वमीमांसा, उपासना पद्धति अथवा नियमावली में जकड़ जाती है तथा अन्य पद्धतियों और प्रक्रियाओं को हीन अथवा असत्य मानकर उनके प्रति विरोध या विद्वेष को बढ़ाने लगती है तो विराट से जुड़ने के भाव से वििच्छन्न होकर अन्य धर्मावलम्बियों से पार्थक्य ही नहीं, घृणा और आक्रमकता में रुपान्तरित हो जाती है। राजनीति में समाजवाद जैसी विचारधाराओं का यही हश्र हुआ है तथा लोकतंत्र एवं संविधानवाद भी केवल औपचारिक पद्धति मात्र होकर रह पाते हैं। लोकतंत्र किस तरह बहुमतवाद होकर व्यक्ति की गरिमा तथा मानव समता की अवहेलना ही नहीं बल्कि अल्पमत के लिए दमनकारी सिद्ध हो जाता है, इसके उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं। कभी कोई सोच नहीं सकता था कि लोकतांत्रिक निर्वाचन भी अधिनायकों को जन्म दे सकता है, लेकिन इतिहास में इसके भी उदाहरण मिल जाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ किसी तरह व्यक्ति की गरिमा के बजाय राज्य के शक्ति-संवर्धन और नागरिक को असहाय बना देती हैं, सभी आधुनिक लोकतंत्र इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। सोवियत क्रान्ति के बाद जब ‘केन्द्रीकृत लोकतंत्र’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया था, तो लोकतंत्र के सिद्धान्तकारों में इस अवधारणा का उपहास किया जाता था कि लोकतंत्र केन्द्रीकृत कैसे हो सकता है, लेकिन आज सभी लोकतांत्रिक राज्यों में शक्ति तथा बहुराष्ट्रीय निगमों में अर्थसत्ता के केन्द्रीकरण की प्रवृत्तियाँ प्रभावी हैं।
वास्तव में, जब विचार को मानव-संवेदन से अलग एक स्वतंत्र प्रक्रिया बना दिया जाता है, तो उसके तर्क अमानवीय तक हो सकते हैं। बाजार को अपने नियमों से संचालित होने दिया जाए—इस तर्क को मानवीय संवेदन से अलग कर देने पर ही इसकी यह दुर्व्याप्ति समझ में आ सकती है कि पूरा जीवन ही बाजार द्वारा संचालित होना चाहिए। इस तर्क का सीधा तात्पर्य यह होता है कि जो जीवन बाजार के लिए उपयोगी नहीं है, उसे बाजार के लिए ही नहीं, जीवन मात्र के लिए अनुपयोगी मान लिया जाना ही सही होगा। इसका एक ज्वलन्त उदाहरण विकासशील देशों में शिशु-मृत्यु को रोकने की आर्थिक मूल्यवत्ता का आकलन करनेवाला यह पर्चा है, जिसे कॉसमॉस क्लब के दो सदस्यों—डॉ. स्टीफन इंके तथा रिचर्ड ए. ब्राउन ने प्रस्तुत किया था। इन दोनों आकलनों का तर्क है कि प्रत्येक व्यक्ति एक पूँजीगत मूल्य होता है क्योंकि वह उत्पादक पर उपभोक्ता होने के नाते राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान करता है। लेकिन यदि मरने जा रहे इन शिशुओं का कोई आर्थिक मूल्य नहीं है—क्योंकि ऐसा शिशु न उत्पादक है, न उपभोक्ता तो उन्हें बचाने के लिए सार्वजनिक धन का अपव्यय क्यों किया जाना चाहिए। स्पष्ट है कि यदि केवल लाभ ही सभी क्रियाशीलताओं का प्रयोजन मान लिया जाए तो इसी तरह की हिंसक मानसिकता का विकास हो सकता है।
इसी तरह का एक विचार यह है कि आधुनिक तकनीकी का निरन्तर विस्तार अर्थव्यवस्था के लिए ही नहीं, जीवन को सुखी बनाने के लिए अपरिहार्य है। इसी विचार के नैतिकता-निरपेक्ष आग्रह ने ‘प्रौद्योगिकीय नियतिवाद’ जैसी समस्या को जन्म दिया है। यदि इसके परिणामस्वरूप हुए पर्यावरणीय प्रदूषण तथा पारिस्थितिकीय असन्तुलन को छोड़ भी दिया जाए और एक विश्लेषक बेरी कॉमनर के इस निष्कर्ष की अनदेखी भी कर दी जाए कि “नई तकनीकी एक आर्थिक सफलता सिर्फ़ इसी कारण है कि वह एक पारििस्थतिकीय विफलता है।” तो भी स्वयं मानव पर पड़ने वाले उसके दुष्प्रभावों की अनदेखी नहीं की जा सकती। एरिक फ्रॉम जैसे मनोविदों की राय में तो इस तकनीकी पर आश्रित उत्पादन-व्यवस्था में तो मनुष्य स्वयं एक वस्तु में रुपान्तरित हो जाता है और यह तकनीकी उसके साथ वस्तु जैसा ही व्यवहार करती है। आज के औद्योगिक समाज में मनुष्य की निष्क्रियता उसकी प्रधान चारित्रिकता और रोग है—निष्क्रियता के कारण वह स्वयं को शक्तिहीन, अकेला और उद्विग्न महसूस करता है। इस ‘एलियेशन सिंड्रोम’ का जिक्र स्वयं मार्क्स ने भी किया है। लेनिन तक ने अमरीकी प्रसिद्ध वैज्ञानिक टेलर के ‘कॉल इन दि मशीन’ की अवधारणा को एक समाजवादी व्यवस्था के अन्तर्गत भी उपयुक्त मान लिया था। तकनीकी ने उत्पादन के क्षेत्र में जो स्थिति श्रमिक की कर दी है, वही राजनीति के क्षेत्र में नागरिक की—जो एक स्वतंत्र गरिमामय मानव-अस्तित्व के बजाय एक ‘वोट’ होकर रह गया है।
तात्पर्य यह कि कोई भी राजनैतिक, अार्थिक, सामाजिक या धार्मिक, सांस्कृतिक विचार मानव-संवेदन से विच्छिन्न कर दिए जाने पर एक ऐसा यंत्र बनकर रह जाता है, जिसे मानव क्या जीवन तक उसे कोई सरोकार नहीं रहता। अपनी कुशलता और शक्ति में निरन्तर वृद्धि ही उसका एकमात्र लक्ष्य बन जाता है। वही उसका सत्य होता है, जिसके कठोर या मुलायम होने का मानव-अस्तित्व के लिए कोई अर्थ होता हो तो हो, पर स्वयं उसके लिए यह शब्दावली ही निरर्थक हो जाती है। इसका सबसे बड़ा भयंकर उदारहण युद्ध-तकनीकी है, जिसका एकमात्र लक्ष्य दूरतम प्रहार और विध्वंसक क्षमता होती है, युद्ध के औचित्य अथवा जीवन-विरोधी होने से उसका कोई सरोकार नहीं होता।
इसलिए आवश्यक बल्कि एकमात्र उपाय यही हो सकता है कि विचारों को उनकी संवेदनात्मक बिजाई तथा सिंचाई से सम्पोषित किया जाता रहे। यह केवल राजनीति या अर्थव्यवस्था के बारे में ही नहीं बल्कि जीवन के सभी आयामों के लिए सच है। यह सच है कि चेतना के विकास में विचारों के विकास की अनिवार्य भूमिका है। लेकिन यह वस्तुत: विचार-शक्ति का विकास है। लेकिन जब हम विचार-शक्ति को एक नििश्च त संकीर्ण परिधि में बन्दी बना लेते हैं तो वह स्वयं उसके विकास का अवरुद्ध हो जाता है अर्थात विचार-प्रक्रिया का ही विचार-विरोधी हो जाना। जब हम कहते हैं कि विचार-प्रक्रिया का विकास चेतना का विकास है तो उसे चेतना के उस पहलू से अलग नहीं किया जा सकता, जिसे भाव या संवेदन-क्षमता कहते हैं। तात्पर्य यह कि दोनों का एकात्मक विकास ही चेतना का वास्तविक विकास है क्योंकि जैसे बुद्धि मानव-अस्तित्व में सहजात है, उसी तरह प्रेम, करुणा, सामाजिकता आदि भावनाएँ भी। बुद्धिविहीन भाव केवल गलदश्रु भावुकता होकर रह जाता है, जबकि संवेदनहीन बुद्धि केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया, जिसका स्वयं उस मानव से ही कोई सरोकार नहीं रहता, जो एक भाव सत्ता भी होता है।
साहित्य या कलाओं का उत्स संवेदनात्मक होता है, लेकिन कई बार उन पर भी वैचारिक आग्रह जब हावी होने लगते हैं तो वे अपने मूल प्रयोजन से भटक कर किसी अन्ध प्रयोजन के उपकरण मात्र होकर रह जाते हैं। इस सन्दर्भ में अकसर मुझे जैनेन्द्र के एक निबन्ध ‘यदि मैं गोदान लिखता’ का स्मरण हो आता है। इस निबन्ध में जैनेन्द्र कहते हैं कि यदि वह गोदान लिखते तो होरी को ही नहीं, मालती और मेहता को भी पूँजीवादी सभ्यता के शिकार के रूप में ही चित्रित करते, जिसका तात्पर्य यह होता कि एक पाठक के रूप में तब हम होरी की नियति के साथ-साथ मेहता और मालती की नियति से भी द्रवित होते।
केवल साहित्य-शास्त्र में ही नहीं जीवन के सभी आयामों में करुणा एक केन्द्रीय भाव है, जो एक व्यक्ति मानव को शेष सृिष्ट से भावात्मक एकत्व की अनुभूति करवाता है। सभी धर्मों में भी इसीलिए करुणा को केन्द्रीय महत्व दिया गया है। ईसाइयत में उसे प्रेम, इस्लाम में रहम, सूिफयों में इश्क, बौद्ध धर्म में करुणा और जैनधर्म में अनुकम्पा कहा गया है। जब हमारी बुद्धि इस करुणा से सम्पृक्त होती है, तभी वह मानव-चेतना और जीवन के उत्कर्ष का माध्यम बन सकती है। अन्यथा ज्ञान और बुद्धि तो अन्याय के साथ भी हो सकते हैं।
महात्मा गाँधी द्वारा राजनीति में सत्याग्रह तथा आर्थिक क्षेत्र में स्वदेशी की अवधारणाओं का समावेश इन क्षेत्रों में करुणा या प्रेम का समावेश है। क्या कोई प्रेममय प्रतिरोध की बात सोच सकता है? तोलस्तोय तक, जिनसे महात्मा गाँधी स्वयं प्रभावित रहे, यह मानते हैं कि जिसे हम प्रेम करते हैं, उसका प्रतिरोध कैसे कर सकते हैं? इसीलिए वह ‘नििष्क्रय प्रतिरोध’ प्रस्तावित करते हैं। लेकिन महात्मा गाँधी के यहाँ तो कोई प्रतिपक्ष है ही नहीं क्योंकि करुणा तो किसी भी अन्य के साथ एकत्व का अहसास है। सत्याग्रह इसीलिए ‘अन्य रूपी आत्म’ अर्थात अपने ही अन्य रूप के प्रति नैतिक दायित्व से प्रेरित होता है ताकि हम अपने उस ‘अन्य रूपी आत्म’ को उसके द्वारा किए जानेवाले अन्याय से अर्थात असत्य से मुक्त करने के लिए सक्रिय हों। स्वदेशी को भी महात्मा गाँधी ऐसा एकमात्र सिद्धान्त मानते हैं जो विनम्रता और प्रेम के नियम के अनुरूप है क्योंकि उसमें अन्धराष्ट्र भक्ति नहीं बल्कि केवल इस वैधानिक मर्यादा को स्वीकार किया गया है कि मनुष्य की सेवा करने के सामर्थ्य की भी एक सीमा है। स्वदेशी का तात्पर्य केवल देश में बनी वस्तुएँ ही नहीं हैं क्योंकि उनका उत्पादन भी उसी तकनीकी से किया जा सकता है, जो मूलत: एक हिंसक और इसलिए निष्करुण तकनीकी है। यदि एक वाक्य में कहा जाए तो स्वदेशी का तात्पर्य है स्थानीय जरूरतों के लिए स्थानीय संसाधनों द्वारा किया गया उत्पादन और संसाधनों में कच्चा माल और तकनीकी भी सम्मिलित है। हिंसक और मानव-निरपेक्ष तकनीकी के विकल्प के रूप में कितनी वैकल्पिक तकनीकियाँ सुझााई गई हैं, जैसे सॉफ्ट टेक्नोलॉजी, एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी आदि, वे सभी प्रकारान्तर से स्वदेशी के साथ रखी जा सकती हैं क्योंकि वे सभी प्रकृति और उपभोक्ता दोनों के प्रति दायित्व के भाव से प्रेरित हैं और दायित्व अथवा कर्तव्य प्रेम के भाव से ही प्रेरित हैं – ऐसे प्रेम से जो रागमुक्त होता है, जिसे करुणा कहा गया है।
तात्पर्य यह कि करुणा ही वह भाव है जो हमारी चेतना को मानव-पीड़ा के प्रति द्रवित रखता है। मनुष्य को पीड़ा-मुक्त करने के उद्देश्य से निर्मित विचार प्रणालियाँ इस करुणा भाव से विच्छिन्न होने पर हिंसक और मानवविरोधी हो सकती हैं, इसके ढेरों उदाहरण हमें क्रान्ति, राष्ट्रवाद और धर्म के नाम पर की जानेवाली हिंसा में मिल सकते हैं। करुणा भाव से विच्छिन्न शिक्षा-प्रणाली मानव रोबोट को ही पैदा कर सकती है, जो एक मानव निरपेक्ष आर्थिकी और राजनीति का कुशल उपकरण तो बन सकता है, पर तब ऐसे उपकरणों को जैविक अर्थों में तो मानव कहा जा सकता है, पर नैतिक और भावात्मक अर्थों में नहीं। आखिर भवभूति ने करुणा को एकमेव रस यूँ ही तो नहीं कह दिया था!
