मनुष्य एक विचारशील जीव है। पशु और मनुष्य में यही अंतर है कि पशु सब काम अंत:प्रज्ञा से करते हैं। जबकि मनुष्य हर प्रश्न को भावात्मक और वैचारिक दोनो नज़रियों से देख परख कर निर्णय लेने की सामर्थ्य रखता है।
यही उसे पशु से अलग जीव बनाता है। ऐसा नहीं है की वह अंत: प्रज्ञा से काम करता ही नहीं। करता है। सतत विचार करने के अभ्यास से ही यह सहज प्रवृत्ति विकसित हो जाती है और कई काम हम इतनी सहज वृत्ति से करते हैं कि अनायास होते जाते हैं। रोज़मर्रा के काम करते हुए जैसे खाना बनाते हुए, हम क़रीब क़रीब, बिला सोचे अभ्यास से एक के बाद एक काम करते जाते हैं। इसे आम बोलचाल में अन्दाज़ से वनाया गया भी कहा जाता है। पर वही व्यंजन को स्वाद बख्शता है, जो किसी के हाथ में होता है, किसी के में नहीं।
कलाकृति या साहित्यिक कृति रचते हुए भी, कृतिकार अनायास रचना करता है पर उसकी प्रज्ञा पशु की अन्तःप्रज्ञा से भिन्न रहती है क्योंकि उसके मूल में वर्षों के विचार और मनन से उत्पन्न ज्ञान रहता है। एक उंचाई पर पहुँच कर विचार ज्ञान में तब्दील हो जाता है। मतलब यह है कि रचना करते समय हमें रुक रुक कर एक ख़ास विषय के बारे में विचार नहीं करना पड़ता, क्योंकि वह हमारे मानस का अंग बन चुका होता है। वही उसे निर्मत्ति न बना कर कृति बनाता है।
इसका सर्वोत्तम दृष्टांत है व्हिसलर की मशहूर पेंटिंग “व्हिसलर्स मदर” की कहानी। शायद आपने सुनी हो। फिर भी उसे सुनाना ज़रूरी है। जब पेंटिंग बन कर तैयार हो गई तो तय खरीदार के उसका मूल्य इतना कम लगाया कि विह्सलर ने पेंटिंग देने से इन्कार कर दिया। मामला अदालत में चला गया। अदालत में जज ने पूछा, पेंटिंग बनाने में कितना समय लगा। व्हिसलर ने कहा दस घण्टे।
“बस! दस घण्टे! दस घण्टे के काम के लिए आप इतनी कीमत माँग रहे हैं?”
“जी नहीं, यह कीमत दस घण्टों की मेहनत की नहीं, पूरे जीवन में अर्जित ज्ञान की है।”
जीवन पर्यन्त स्वयं अपने लिए सोचते रहने से ही वह ज्ञान उत्पन्न होता है, जो सहज ही दूसरों को भी अपने लिए सोचने के लिए प्रेरित कर देता है।
मेरे साथ भी अस्सी के दशक में एक दिलचस्प घटना हुई थी।
मेरा नाटक “एक और अजनबी” आकाशवाणी से पुरस्कार प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय नाटक श्रेणी मै आने से सभी भारतीय भाषाओं में अनेक बार प्रसारित हुआ था। पर जब उसे दूरदर्शन पर दिखलाने की पेशकश हुई तो अंतिम दिन दूरदर्शन महानिदेशक ने उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उसमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कई नामी अभिनेता भाग लेने वाले थे। सबके इसरार पर मैं महानिदेशक से मिली और उनसे प्रतिबन्ध लगाने का कारण पूछा। पहले तो उन्होंने कहा, वह विवाह संस्था के खिलाफ़ है। जब मैंने उनका ध्यान हाल में प्रसारित कई बचकाने पर स्पष्ट रूप से विवाह संस्था के खिलाफ़ बोलने वले नातकों की तरफ़ दिलवाया तो उनका तत्काल आया उत्तर काफ़ी मानीखेज़ था। उन्होंने कहा, “उनकी बात और है। वे केवल मनोरंजन करते हैं। आपका नाटक लोगों को सोचने पर मजबूर करता है।” आप समझ सकते हैं मेरे लिए नाटक न खेले जाने की नाउम्मीदी से कहीं बढ़ कर यह जानने की खुशी थी कि सत्ता को लोगों के सोचने से डर लगता है।
पर पिछ्ले काफ़ी समय से लगने लगा है कि वह समय बीत गया। अब तो हमारे यहाँ कानून की हालत यह हो गई है कि कोई भी बहाना बना कर, बल्कि समाज में बदलाव लाने का ही डर दिखला कर, हर विचार को जेल में डाला जा सकता है। यह एक भयावह परिणति है!
जब अनेक लोगों के विचार मेल खाते हैं तो कई बार होता यह है कि आपस में विचार विमर्श के दौरान, वे इतने क़रीब आ जाते हैं कि एक या अनेक विचाधाराओं का जन्म हो जाता है। इसमें कोई बुरी बात नहीं है। विचारधारा का जन्म होने पर ही राजनीतिक पार्टियाँ बनती हैं,जो सरकार बनाने के लिए चुनाव लड़ती हैं और एक राजीनीतिक तंत्र विकसित होता है। उसके अनुसार सत्ता के सिद्धांत, उनका रंग रूप और रूपरेखा निर्धारित होती है। चाहे लोकतंत्र हो अथवा तानाशाही, उसके मूल में एक विचारधारा रहती ही है, जो उसके कानून, विधि विधान आदि निर्धारित करती है।
दिक़्क़त तब पैदा होती है जब यह विचार धारा रूढ़ होने लगती है, इस हद तक कि उसमें न किसी बदलाव की गुंजाइश रहती है न वैविध्य की। विचार एक सतत प्रवहमान प्रक्रिया है, जिसे हर व्यक्ति अपने सोच के मुताबिक गति और दिशा देता है। उस वैविध्य से ही प्रगति के बीज अंकुरित होते हैं। जैसे ही इस वैविध्य या स्वतंत्र चेतना का ह्रास होता है, वह प्रवाह के बजाय एक ठहरा हुआ जल कुंड बन जाती है, जिसमें धीरे-धीरे काई-कीच जमने लगती है, जो हर दिशा में हर प्रकार की प्रगति अवरुद्ध कर देती है।
जैसे-जैसे कुछ बलशाली सत्तासीन दल उस पर काबिज़ होते जाते हैं, वह ऐसा वाद बन जाता है, जो हर नागरिक पर जबरन थोपा जाने लगता है। कुछ लोग स्वयं समर्पण कर देते है यानी सत्तासीनों के अर्ध सत्यों या अतिश्योक्तियों को अंतिम सत्य की तरह स्वीकार कर लेते हैं।
कुछ लोग प्रतिरोधी विचार व्यक्त करते हैं पर सत्ता उन्हें किसी न किसी प्रकार प्रताड़ित और पीड़ित करने में सफल हो जाती ही। अधिकतर भेड़ चाल चल रहे जन उनसे किनारा कर लेते हैं और धीरे-धीरे वह वाद सर्वत्र लागू हो जाता है; उसका विरोध करना कठिन से कठिनतर होता जाता है । वाद कोई भी हो सकता है। जो खतरनाक है, वह अपने में वाद नहीं बल्कि उसका निर्विवाद सत्य की तरह स्वीकार किया जाना। तालिबानी इस्लाम हो, हिंदुत्ववाद हो, मार्क्सवाद, या कोई भी कट्टरपंथी सोच, इस मोड़ पर आ कर हर वाद तानाशाही में तब्दील हो जाता है। यह सिर्फ़ तालिबान शासित अफ़गानिस्तान का सच नहीं है। साम्यवादी रूस, चीन, उत्तर कोरिया, मैयनमार या उसके विपरीत दिशा में सोचने वाले पूंजीवादी अमरीका का भी सच है। कहीं तानाशाह, सरकार होती है तो कहीं, कॉरपोरेट जगत।
जब तक वाद लचीला रहता है, वह लोक हित में काम करता है और लोक को सत्ता में जगह देता है।जैसे 1991 में अमरीकन हस्तक्षेप से पहले का समाजवादी युगोस्लाविया या काफी संघर्ष और ज़ुल्म कर लेने के बाद का प्रगति करता क्यूबा।
पर अधिकतर राजतंत्रों के नागरिक स्वतंत्र विचार करने की हिम्मत ही नहीं, तर्क बुद्धि भी खो देते हैं।
जब एक घोषित लोकतंत्र में जहाँ चुनाव की प्रक्रिया का चलन है, जनता स्वय चुन कर एक ऐसे इंसान या इंसानों के हाथों में सत्ता थमा देती है, जिसमें/जिनमें भावी तानाशाह बनने के तमाम चिह्न विद्ध्यमान होते हैं तो उस जाल से बाहर निकलना सबसे कठिन हो जाता है। ज़ाहिर है जिन्होंने वोट दे कर उन्हें चुना होता है, वे अपने चयनित मुखिया को भगवान का दर्जा देने की भूल कर लेते हैं।
यानी वे उसके द्वारा प्रचारित विचार धारा का इस तरह आंतरिकरण कर लेते हें कि उससे पृथक हर मुक्त विचार को बिला सोच विचार,पहले से खारिज करने को तैयार बैठे रहते हैं।
वाद शासित राजतंत्र, राज को राष्ट्र घोषित कर देता है और हर स्वतंत्र विचार को राष्ट्र द्रोह।
हर मुल्क को अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि उसके यहाँ यह स्थिति तो नहीं बन रही। अगर बन रही है पर चुनाव प्रक्रिया अब भी चालू है तो विचारधारा मुक्त विचार की आवृत्ति ही उसकी रक्षा कर सकती है। पर उसके लिए एक प्रकार की क्रान्ति की आवश्यकता होती है। यानी मुक्त विचार करने वालों को भी एकजुट होना पड़ता है और अलग विचारधारा विकसित करनी पड़ती है। यानी उसी बिन्दु पर लौटना पड़ता है जहाँ से चले थे। फिर शुरु होती है , वही विचार को मुक्त रखने की कशमकश।
जब जब तानाशाही का विघटन हुआ है जैसे सोवियत संघ में तो इसके पीछे शब्द को अर्थ से विलग कर सत्य को प्रचारित या विज्ञापित सच बनाने का बहुत बड़ा हाथ रहा है। जब हर शब्द अपना अर्थ खो कर निरर्थक हो जाता है तो आम जन, हर अतिश्योक्ति के पीछे छिपा झूठ पकड़ने में सफ़ल होने लगता है। राजतंत्र या तानाशाह के ऊपर से उसका विश्वास टूट जाता है और वह मुक्त विचार की महत्ता को समझने लगता है। अतिश्योक्ति युक्त विज्ञापन या प्रचार के बिना तानाशाह या विचार की नाकद्री करने वाले सत्तासीनों का काम नहीं चलता। यही उसकी मजबूरी है और इसी में उसका नाश छिपा हुआ है। बहुमुखी या बहुआयामी सत्य को समाप्त कर एकांगी सत्य को स्थापित करने के चक्कर में वह उसी बहुआयामी प्रतिभा को जाग्रत कर देता है, जिसे नेस्तनाबूद करने चला था। ऐसा होगा ही, हम नहीं कह सकते पर यही एक सम्भावना है जो हमारे पास बची रहती है।
| सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ वर्षो तक रूस में पूंजीवादी व्यवस्था, खुला बाजार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि क़ायम करने की कोशिश हुई। पर कुछ ही बरसों में,पुतिन के प्रमुख बनने के बाद
तानाशाही दोबारा क़ायम हो गई। अब तो पुतिन ने खुद को आयु पर्यन्त प्रमुख घोषित कर दिया है, यानी तमाम चुनाव रद्द हो गए हैं। आजकल तो यूक्रेन पर हमला बोल उसे नेस्तनाबूद करने का नापाक काम चल रहा है। और पूरी दुनिया चुपचाप तमाशा देख रही है। अणु हथियारों के रहते तृतीय विश्व युद्ध की संभावना से सब डर कर चुप बैठे रहते हैं। |
दूसरी सम्भावना बेहद ख़तरनाक है। जैसे नात्ज़ी जर्मनी और फ़ासिस्ट इटली का पतन तब हुआ जब वहाँ विदेशी हस्तक्षेप हुआ या बाक़ायदा विदेशी ताक़तों (मुल्कों) ने उसके विरुद्ध युद्ध छेड़ा।
उसके भयंकर परिणाम जापान में अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी में अणु बम फेंके जाने तक सीमित नहीं थे।
1948 में फ़िलिस्तीन का विभाजन करके एक हिस्से को इज़्राइल का नया राष्ट्र घोषित कर दिया गया। अमरीका ने तुरंत उसे मान्यता दे दी। दरअसल 1947 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने फ़िलिस्तीन का विभाजन करके एक हिस्से को यहूदी राष्ट्र इज़्राइल बनाने की पेशकश की थी। यद्यपि अरब देश ने उसे अस्वीकार कर दिया, फिर भी 1948 में यह काम हो गया। येरुशलम को फ़िलिस्तीन और इज़्राइल दोनों अपनी राजधानी मानते हैं। इसके बावजूद उसे इज़्राईल की राजधानी घोषित कर दिया गया। इस काम में अमरीका ने अहम भूमिका निभाई।
इसके फ़िलिस्तीनियों या अरब मूल के निवासियों का कमोबेश वैसा ही शोषण हुआ जैसा नात्ज़ी जर्मनी में यहूदियों का हुआ था। कोन्सन्ट्रेशन कैम्प भले न बने हों पर युद्ध की स्थिति निरंतर बनी रही। अमरीकन ताक़त के ज़ोर पर फ़िलिस्तीन पर बराबर हमले होते रहे और उसके निवासियों को युद्ध बन्दियों के से हालात में जीना पड़ा।
कहने का तात्पर्य यह है कि विदेशी हस्तक्षेप, खतरनाक सर्जरी की तरह मरीज़ को स्वस्थ करने के बजाय, पूरी तरह खत्म कर सकती है।
इसके विपरीत संसार में जो नवाचार आया है, प्रगति हुई है, नई तकनीक विकसित हुई है या मानवीय व सामाजिक सम्बन्धों में जो बदलाव आये हैं, सब किन्हीं दो चार स्वतंत्रचेता विचारकों के माध्यम से आये हैं। चाहे वह सीधे सीधे टेलिफ़ोन, वायरलैस या पेनीसिलिन का आविष्कार हो या फ़्रायड तथा जुंग आदि विचारकों द्वारा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के नये औज़ारों की इजाद। या इतिहास और वर्गों के बीच के अविरल चल रहे युद्ध की मार्क्स द्वारा अभिनव पड़ताल।
बाद में व्यवहारिक स्तर पर मार्क्स के विश्लेषण का राजनीतिक उपयोग किया जाने लगा। अन्ततः तानाशाह नेताओं की तदबीरों से, वह एक ग़ैर लचीली विचारधारा में तब्दील हो गया, पर इसमें शुबहा नहीं है कि वह ऐसा क्रान्तिकारी सोच था, जो एक विचारधारा मुक्त मस्तिष्क की उपज था।
जैसा मार्क्स ने स्वयं कहा था, मैं मार्क्सिस्ट नहीं हूँ।
राजतंत्र के संचालन में मार्क्सवाद भारत के दो प्रदेशों में प्रयुक्त हुआ पर एक दूसरे से विपरीत तरीके से और उसका प्रभाव भी उतना ही विरोधाभासी था। पश्चिम बंगाल में विचार पूरी तरह से विचारधारा के प्रभुत्व में आ गया और अपने प्रदेश के उद्योग या प्रगति के बारे में सोचने के बजाय, जनता सोवियत संघ का डंका पीटने में लगी रही। कितने ही प्रतिभावान नवयुवकों की हत्या हुई या संविधान के विरुद्ध उन्हें जेल में डाल दिया गया, सिर्फ़ इसलिए कि वे स्वतंत्र रूप से विचार विमर्श करने की हिम्मत कर रहे थे। इसी लकीर पीटने के चक्कर में या नौकरशाही की जकड़ के कारण आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में पश्चिम बंगाल कमोबेश शून्य रहा।
केरल में सरकारी अमला भी प्रगति को कारगर करने में प्रवृत हुआ तो समुदायों और वर्गों के बीच समानता लाने में काफ़ी हद तक सफ़ल हुआ। केरल में ग्रामीण विकास के लिए कई नये कानून बने और देश के अन्य हिस्सों के मुक़ाबले वहाँ के किसानों को अपनी फ़सल के लिए सरकार निर्धारित उचित दाम मिले। गोदामों का भी काफ़ी हद तक वाजिब इंतज़ाम हुआ। यानी ग्रामीण आर्थिक तंत्र में भी नगरों की तरह विस्मयकारी प्रगति नज़र आई।
केवल सामाजिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक क्षेत्रों के विचार या विमर्श ही समाज या संस्कृति का मार्ग दर्शन नहीं करते। जैसा मैंने शुरु में ही कहा था, मुक्त विचार करने की प्रेरणा देने के कारण, हर बदलाव के पीछे एक वायवीय सा लगता पर दूरगामी हस्तक्षेप साहित्य और कला का रहता है। इसीलिए हर तानाशाह तंत्र में लेखकों और कलाकारों और ख़ास तौर पर कार्टूनिस्ट पर प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं। यानी हर तानाशाह उनसे ख़ौफ़ खाता है। याद कीजिए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपना कार्टून बनाने वाले को जेल भिजवा दिया था। उसके विपरीत लोकतंत्र में आस्था रखने वाले प्रधान मंत्री पंडित नेहरू से कार्टूनिस्ट शंकर से पूछा था, “अरे भाई आजकल मेरे कार्टून कम क्यों बनाने लगे। क्या मैं इतना बोरिंग हो गया?”
मैंने 1979 में अपने उपन्यास चित्तकोबरा में लिखा था, कोई सभ्यता कितनी आज़ाद खयाल या निडर है, उस समय के कार्टूनों को देख कर मालूम होता है। इस सच में आज भी मेरा यक़ीन क़ायम है। रूस में, पूर्वी जर्मनी में,चेकोस्लावाकिया आदि देशों में समाज साहित्यकारों, कवियों की ज़बरदस्त इज़्ज़त करता था। पर कम्युनिस्म के आते ही लेखकों पर हर मुमकिन प्रतिबन्ध लगाये जाने लगे। बॉरिस पास्तर्नाक को तो नोबेल पुरस्कार लेने की अनुमति भी नहीं मिली। मिलान कुण्डेरा,सोलज़नित्सन जैसे लेखक मुल्क छोड़ने पर मजबूर हुए। जो तथाकथित मार्क्सिस्ट विचारधारा को अभिव्यक्ति देने वाला साहित्य था, उसी को प्रश्रय मिला।
पर चूंकि रूसी संस्कृति और मानसिकता साहित्यकार को हमेशा से नायकत्व प्रदान करती रही थी, इसलिए अपने बचाव के लिए, सत्तासीनों ने क्लासिक प्रतिष्ठित लेखकों को तिरस्कृत नहीं किया। उन्हें नायकों का दर्जा और पहले जैसा सम्मान मिलता रहा। उनके नाम से जानी जाने वाली सड़कों के नाम बदले नहीं गये; न सार्वजनिक स्थलों से उनके बुत हटाये गये। यानी इतिहास को एक नई विचारधारा के तहत परखने के प्रयास के बावजूद, सम्मानित क्लासिक साहित्यकारों को उस इतिहास से बहिष्कृत नहीं किया गया। क्योंकि सत्ता जानती थी कि इसे जनता किसी हाल क़ुबूल नहीं करेगी। बेहतर होगा कि उसे सम्पूर्ण विश्व में कम दाम पर उपलब्ध करवा कर सोवियत साहित्य का डंका बजवाया जाए। वही हुआ! पूरा विश्व रूसी साहित्य का क़ायल हो गया।
कभी कभी सरकार की नीति पर साहित्य का एकदम सीधा असर भी देखा जाता है यद्यपि इसके उदाहरण कम हैं। उनमें चार्ल्स डिकंस के उपन्यास लाजवाब उदाहरण हैं। उन्होंने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद आम रूप से प्रचलित बाल श्रम की शर्मनाक और भयावह स्थिति के यथार्थ को इतने सम्पूर्ण और स्पष्ट रूप से विस्तार में बयान किया कि सारा देश हिल गया। उसका असर सरकार पर भी पड़ा। कानून बनाए जाने लगे जिन्होंने बाल श्रम को तो समाप्त किया ही, मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को भी कानून का दर्जा दे दिया। धीरे धीरे सभी मुल्कों में वह वेलफेयर स्टेट का प्रतीक बन गया।
मगर हमारा देश इस मामले में बंगला देश और श्री लंका से भी पिछड़ा हुआ है।
ऐसा नहीं है कि लेखक इस विषय पर लिख नहीं रहे। लिख रहे हैं पर हमारे देश में साहित्य या गम्भीर पत्रकारिता पढ़ने का चलन नहीं है इसलिए जो स्वयं एकटिविस्ट नहीं हैं, उन्हें छोड़ कर कम ही जन उससे विचलित होते हैं। हों भी तो हमारी सरकार जनता की भावनाओं को उतना महत्व नहीं देती। वह जानती है कि वह चुनाव का मुद्दा नहीं बनेगा। भले कैलाश सत्यार्थी को “आर्थिक मुनाफे के लिए किए जा रहे बच्चों के गम्भीर शोषण के खिलाफ़ आंदोलन” करने के लिए नोबेल पीस प्राइज़ मिल चुका है पर उसका भी सरकार या कानून पर विशेष प्रभाव नहीं हो पाया है। कानून बनते हैं तो वे कागज़ी नियम भर रहते हैं, उनका पालन नहीं होता। कैलाश जी की प्रशस्ति में “गम्भीर” शब्द का प्रयोग हुआ था पर हम जानते हैं कि बाल श्रम शोषण हमारे यहाँ गम्भीर नहीं, हौलनाक है।
निहितार्थ यह है कि जब तक समाज में आर्थिक स्थिति मानवीयता की निम्नतम शर्ते पूरी नहीं करतीं और प्रचार द्वारा जनता का ध्यान, जाति,धर्म आदि पर एकाग्र करने में सफलता मिल जाती है तो मुक्त विचार खामख्याली बन कर रह जाता है। सशक्त लोकतंत्र के अभाव और सामाजिक विषमता से आक्रान्त समाज में विचरधारा मुक्त विचार केवल चन्द बुद्धिजीवियों और आंदोलनकारियों तक सिमट कर रह जाता है।
फिर भी जब जब कोई अन्तर आया है तो इसी मुक्त विचार के फलस्वरूप आया है।
ग्राम्शी को सज़ा सुनाते हुए इटली की फ़ासिस्ट अदालत ने कहा था, यह ज़रूरी है कि इस दिमाग़ को कम से कम बीस साल तक काम करने से रोक दिया जाए। यानी वह मुक्त निडर विचार की शक्ति को पहचान रहे थे। पर जैसा मैंने पहले कहा, अन्ततः इटली में फ़ासिज़्म का अन्त विदेशी हस्तक्षेप से ही हुआ हालांकि इटली के भीतर औद्योगिक कर्मचारियों के सशस्त्र विरोध ने भी उसमें काफ़ी अहम भूमिका निभाई। यानी विचारधारा मुक्त विचार को समाज में परिवर्तन लाने में बहुत लम्बा समय लग जाता है। असल विडम्बना यह है कि राज्य किसी भी तर्कहीन विचाधारा का सहारा ले कर, कानून प्रणाली को तोड़ मरोड़ कर, बरसों बरस स्वतंत्र विचार को राष्ट्र के खिलाफ़ षडयंत्र बतला कर कुचलता रह सकता है। राज्य को राष्ट्र बतलाना हर उस विचारधारा का अंग रहता है, जो रूढ़ हो कर तानाशाही या फ़ासिस्म में परिवर्तित हो जाए।
सोशल मीडिया ने सरकार का कां और आसान कर दिया है। ज़्यादातर स्वतंत्र चेता जन उस पर सरकार पर मारक व्यंग्य करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। हालांकि उनमें सड़क पर उतर कर आंदोलन करने की भरसक प्रेरणा रहती है और वक्ता के लिए पर्याप्त ख़तरा भी। पर जब बाक़ी बुद्धिजीवी उस पर सैंकड़ों लाइक या “बहुत ख़ुब” नुमा टिप्पणियों दे कर इतिश्री कर लेते हैं। तब उसकी हालत वैसी ही हो जाती है जैसे उन नाटकों की, जिनके लिए दूरदर्शन महानिदेशक ने फ़रमाया था, उनकी बात और है, वे सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं! यानी सोचने के लिए प्रेरित करने वाले वक्तव्यों को भी सोशल मीडिया अपने मूल स्वभाव के कारण भोथरा बना देता है या केवल मनोरंजन की वस्तु!
वरना हमारे यहाँ नब्बे प्रतिशत विकलांग साईबाबा को यूपा के अन्तर्गत सज़ा सुनाते हुए अदालत ने यही कहा था, देह काम न करती हो तो क्या, दिमाग़ ख़ूब तेज़ है। यानी वही विचार से डर का प्रदर्शन किया था! पर जब इस डर का नतीजा यह हो कि न्यायालय भी न्याय के अनुपालन को अस्वीकार कर राजतंत्र के हाथ मज़बूत करने लगे तो विचार की गति जेल में पड़े रहने की हो कर रह जाती है।
हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अन्ततः विचार की जीत तभी हो सकती है जब समान विचार रखने वाले एक जुट हो कर विरोध करें। बहुत चाह कर भी मैं कोई युटोपियन निष्कर्ष नहीं दे पा रही हूँ तो इसीलिए कि सच से मुँह नहीं मोड़ पा रही।
