स्वायत्तता या मूल्य हीनता से आगे का रास्ता – सुखजोत

स्वायत्तता या मूल्य हीनता से आगे का रास्ता – सुखजोत

 

विश्व युद्ध के दौरान बच्चों से भरा एक विमान प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरते हुए एक निर्जन और बीहड़ द्वीप पर दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। छह से बारह वर्ष की उम्र के सब बच्चे, किसी भी तरह की  रोकटोक से मुक्त, नाते रिश्तों से मुक्त, किसी भी तरह के नियम, व्यवस्था या क़ानून से मुक्त, केवल अपनी इच्छा से कुछ भी, कभी भी करने को स्वतंत्र हो जाते हैं।

एक अकल्पनीय, पूर्ण आज़ादी – जो किसी भी जीव की एकमात्र चाह है। एक स्वायत् शासन – कोई नियम-मर्यादा नहीं। जहां किसी को किसी का कोई डर नहीं। जहां कोई बड़ा-छोटा नहीं।

विलियम गोल्डिंग के नावेल ‘Lord of the Flies’ की कहानी के अनुसार कुछ समय पा कर वे बच्चे एक दूसरे को ढूंढ लेते हैं। “The world, that understandable and lawful world, was slipping away.” …

 

खाने और ज़िंदा रहने जैसी ज़रूरतों के पूरा होते ही, शुरु होता है एक द्वन्द – न सिर्फ़ द्वन्द, बल्कि एक भयावह अराजकता। एक क्रूर और पशुवत हिंसक प्रवृति, जो कुछ सालों तक एक सभ्य समाज में रह चुके इन बच्चों पर हावी हो जाती है। नैतिक और अनैतिक का भेद समाप्त हो जाता है। हैवानियत की भावना इतनी प्रबल हो जाती है कि एक दूसरे को जान से मार डालने में भी इन बच्चों को गुरेज़ नहीं। एक दूसरे के खून के प्यासे ज़्यादातर बच्चे ख़ूँख़ार, वहशी बने किसी भी तरह की कोमल और सभ्य भावना के अंश से भी दूर, मानो दरिंदे बन जाते हैं।

 

“We did everything adults would do. What went wrong?”

“Maybe there is a beast… maybe it’s only us.”
–  William Golding ( Lord of the Flies)

 

इस चरम सवाल को खंगालने की कोशिश की है विलियम गोल्डिंग ने कि क्या पूर्ण आज़ादी सिर्फ़ एक भ्रम है? तो क्या मनुष्य एक तरह से पशु ही है, जिसके लिये सभ्य और संवेदनशील होने का कोई अर्थ नहीं? क्या किसी भी मर्यादा के ख़त्म होते ही हर प्रकार की अच्छाई और सभ्यता का हनन हो जाता है? मासूम से बच्चे एक व्यवस्था के अभाव में ख़तरनाक हैवान में तब्दील हो जाते हैं? इस का अर्थ ये हुआ कि पशुवत व्यवहार अस्वाभाविक नहीं। स्वायतत्ता मिलते ही कुछ समय पाकर मूल्यों का ह्रास शुरू हो जाता है। सब गुण या अवगुण इंसान के अंदर ही मंडराते रहते हैं और दो विपरीत शक्तियों की रस्साकशी भीतर ही भीतर हमेशा विद्यमान रहती है। इस सब के विपरीत कोई तो स्वाभाविक गुण है जिसने सदियों से मनुष्य को सभ्य समाज बनाये रखने की ताक़त बख्शी है।

 

“I know there isn’t no beast—not with claws and all that, I mean—but I know there isn’t no fear, either.”
Piggy paused.”
“Unless—”
Ralph moved restlessly.
“Unless what?”
“Unless we get frightened of people.”

–  William Golding ( Lord of the Flies)

 

नैतिक और अनैतिक के बीच स्वायत्तता की क्या सीमा हो सकती है, ये सदियों पुराना प्रश्न है। प्राचीन यूनानी दार्शनिकों प्लैटो और अरस्तू ने आत्मनिर्भरता और स्वनियंत्रण को मानवता के साथ जोड़ा। लेकिन जैसे जैसे धार्मिक प्रभाव कम होता गया, राजनीतिक स्वतंत्रता का विचार उदय हुआ, स्वायत्तता का अर्थ बदला।अनेकों दार्शनिकों ने इस विषय पर बहुत लिखा है। कन्फ्यूशियस से लेकर इम्मैनुएल कांत, जॉन स्टुअर्ट मिल, फ्रीडरिक नीत्ची सब ने इसका गहरा मंथन किया है।

 

“He who is unable to live in society, or who has no need because he is sufficient for himself, must be either a beast or god.”

—  Aristotle, 384-322 BC

 

जर्मन दार्शनिक कांत के अनुसार स्वेच्छा ही किसी भी नैतिकता की पूर्वधारणा है। मनुष्य पशुओं से इसलिए ही भिन्न है कि वह एक तर्क और लक्ष्य के साथ नैतिकता का पालन करने में हर तरह से सक्षम है। किसी भी बाहरी दबाव के बावजूद स्वायत्तता बनाये रखने के लिए नैतिक नियमों का पालन एक कर्तव्यबद्धता से होना चाहिये। इसके विपरीत दूसरे जर्मन दार्शनिक फ्रीडरिक नीत्ची (Freidrich Neitzsche) का मानना है कि अधिकतर लोग क्या अच्छा है, क्या बुरा में पड़ते हैं। वे उसे Master Morality और Slave Morality कहते हैं। उनका मत है कि समाज में  में एक धागा, एक Construct होना ज़रूरी है, जिससे स्वायत्तता भी परिभाषित होती है। नैतिकता से आज़ाद होने को वह स्वायत्तता मानते हैं। Jean Piaget स्विस मनोवैज्ञानिक हैं – जो कांत और फ्रीडरिक नीत्ची के बीच का रास्ता चुनते हैं। उनका कहना हैं कि दस साल की उम्र के बाद वच्चे समझने लगते हैं कि इंसान के द्वारा बने नैतिक मापदंड गलत हो सकते हैं, उसके बाद वे Autonomous Morality का रास्ता चुन सकते हैं।

 

वाद विवाद अभी जारी है, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, समाज शास्त्री, मनोवैज्ञानिक, व्यापार-नीति विशेषज्ञ सभी के अपने-अपने मत हैं। इतना आसान भी नहीं स्वायत्तता और नैतिकता को परिभाषित करना, क्योंकि हर समाज में नैतिकता की अलग परिभाषा है।

 

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स्वायत्तता की चर्चा शिक्षा नीतियों, कानूनी अधिकार, कार्यस्थल वातावरण और चिकित्सा क्षेत्र इत्यादि में अक्सर होती है। यह बात सर्वविदित है कि कोई भी अविष्कार, कोई भी बड़ा काम हुआ है तो स्वायत्तता के चलते ही हुआ है। स्वायतत्ता के चलते ही मौलिक चिंतन संभव है। कार्य स्थलों पर पूर्ण आज़ादी संभव नहीं हैं। फिर भी कार्य स्थल पर जहां भी नियंत्रण इतने सख्त नहीं और इंसान की मर्यादा का सम्मान किया जाता है, वहां सब लोग खुश और ज्यादा  रचनात्मक हो सकते हैं।अगर गूगल या टेस्ला की Innovation lab का ही उदाहरण लिया जाये तो वहाँ के कर्मचारी अपनी मर्ज़ी से किसी भी वक्त, कितने भी समय के लिये दफ़्तर में आकर अपना काम कर सकते हैं। न कोई वक्त की पाबंदी न कोई बॉस और न कोई अधीनस्थ! न कोई आपसे आपके काम का हिसाब माँगेगा! हर कर्मचारी अपने काम का ख़ुद ज़िम्मेवार!  दूसरी ओर यही स्वतंत्रता चिकित्सा या कानून के क्षेत्र में नहीं दी जा सकती। वहाँ कार्यस्थल पर मनमर्ज़ी और स्वेच्छा की बजाय एक नियम और क़ायदे के साथ  चलना ही दरकार होगा।

 

वास्तव में स्वायत्तता की बात करते हुए स्वच्छंदता, स्वतन्त्रता, स्वेच्छा और व्यक्तिवाद का फ़र्क़ समझना आवश्यक है। सामाजिक, धार्मिक और व्यक्तिगत आचरण और किसी एक संस्था या राजनीतिक पद्धति के अधीन काम करते हुए स्वायत्तता बनाये रखना अलग बात है। दूसरी ओर निरंकुशता, अराजकता को रोकना भी एक सामाजिक आवश्यकता है।

 

Human rights’ are a fine thing, but how can we make ourselves sure that our rights do not expand at the expense of the rights of others…….A stable society is achieved not by balancing opposing forces but by conscious self-limitation : by the principle that we are always duty-bound to defer to the sense of moral justice.” 

– Aleksandr I. Solzhenitsyn,

 

पश्चिम की मूलभूत अवधारणा वैयक्तिक स्वतंत्रता है। छोटे से छोटे बच्चे को भी अपनी मौलिक स्वतंत्रता का पालन सिखाया जाता है। स्वायत्तता का अधिकार धीरे-धीरे आता है बचपन से बड़े होने पर। सुबह से शाम तक छोटे-छोटे रोजमर्रा के काम जैसे कि क्या कपड़ा पहनना है, क्या खाना है, क्या बोलना है, स्वायत्तता के रहते ही संभव है। जैसे-जैसे छोटा बच्चा बड़ा होता है, नई चीजें देखता सीखता है, अपनी पहचान बनाने लगता है।यह मूल्य उसके माता पिता और समाज के दिए होते हैं। किशोरावस्था में एक टकराव मूल्यों और स्वायत्तता का शुरू हो जाता है। इसी टकराव में एक अवसर है। कितना आज़ाद रहने दिया जाए – एक बच्चे और किशोर को। दूसरा मूल्य जो पश्चिम में भरपूर है – एक दूसरे की सहायता करना – वह क्रिश्चियन धर्म से भी आता है। उसके चलते स्वछंदता कुछ कुछ हद तक अपने आप ही निरंकुश नहीं रहती। एक दूसरे का सम्मान करना अपने आप ही रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाता है। सभी लोग समाज में कानून कायदे का पालन करते हैं। न करने की सख्त सजा है।

 

“We’ve got to have rules and obey them. After all, we’re not savages. We’re English, and the English are best at everything.”

– (Lord of the Flies से)

 

हमारे यहां बचपन से ही मूल्य थोप दिए जाते हैं। हर घर का एक स्वामी है, पिता। पुरुषों या लड़कों की निरंकुशता और दूसरी ओर एक बच्ची या स्त्री के हर अधिकार पर अंकुश। एकतरफा अधिकार। जो समाज अभी तक प्रकृति के नियमानुसार प्रेम या यौन संबंधों की स्वीकृति नहीं देता, वह पितृ-सत्तात्मक समाज कैसे एक स्वायत्त मानसिकता का पोषण होने दे सकता है? जब किसी भी प्राणी के पूरे विश्वास, आत्मसम्मान, और दूसरों से संबंधित सभी इच्छाओं और सोच को अंकुश लगा दिया जाए तो स्वायत्तता का ह्रास तो निश्चित ही है।

आजकल हमारे भारतीय समाज में अपराध इस हद तक बड़ गए हैं  कि अख़बार खोलते हुए डर लगता है। वीभत्स घटनाएं और हिंसा रोजाना की बात हो गई है। अक्सर इन घटनाओं  को कानून कायदे की कमी से जोड़ा जाता है। लेकिन सिर्फ वही बात नहीं। समृद्धि के साथ साथ एक निरंकुशता अराजकता और क्रूरता हमारे समाज में आयी है । कई कारण हैं लेकिन   व्यक्तिगत आज़ादी के नाम पर अपने सभी नैतिक मूल्यों सामाजिक जिम्मेदारियों को त्याग देना एक स्वायत्त समाज की परिभाषा नहीं बन सकते।

 

स्वायत्तता को अक्सर निरंकुशता या अराजकता के साथ मिलाकर देखा जाता है। इतिहास गवाह है कि जिसके पास भी शक्ति आई, उसने उसका भरपूर गलत इस्तेमाल किया, किसी भी क्रूरता की हद तक। राजनीति में अभी तक भी ऐसे उदाहरण हैं कि रूह कांप जाती है। कितने ही किस्से हैं, हर युग की बात कही जा सकती है।शक्ति आने पर कितने ही आदर्श टूट फूट कर चकनाचूर हो जाते हैं। इसी स्थिति का एक उदाहरण है – George Orwell का अत्यंत प्रसिद्ध लघु उपन्यास Animal Farm (1945)। एक खेत पर विद्रोह हो जाता है। सभी जानवर अपने मालिक से दुखी हैं।वह इंसान सभी जानवरों को हैवान नजर आता है। सभी आपस में सलाह करते हैं कि ऐसा समाज बनाएं, ऐसा फार्म बनाएं जिसमें सभी बराबर हों, खुश हों और समान अवसर मिलें सबको।

The animals were happy as they had never conceived it possible to be. Every mouthful of food was an acute positive pleasure, now that it was truly their own food, produced by themselves and for themselves, not doled out to them by a grudging master….

 

अंततः फिर से वही होता है। नेपोलियन नाम का एक सूअर अराजक बन जाता है और स्थितियां पहले से भी ज्यादा ख़राब हो जाती हैं। नेपोलियन एक डिनर पार्टी करता है। किसानों और सूअरों का गठबंधन किया जाता है। जो भी क्रांतिकारी मूल्य स्थापित किए गए थे, उन्हें हटा दिया जाता है। इंसान और सूअर दोनों ही एक दूसरे की प्रशंसा में लग जाते हैं और ताश के पत्ते खेलते रहते हैं। उसमें धोखाधड़ी भी चलती रहती है। नेपोलियन और Mr. Pilkington, की इस खेल में जोर-जोर से लड़ाई हो जाती है। बाहर दूसरे जानवर समझ ही नहीं पाते कि कौन क्या बोल रहा है।

“Power tends to corrupt and absolute power corrupts absolutely.”

  • (Lord Acton)

 

एनिमल फार्म हो या कोई भी अन्य स्थिति, सत्य यही है की जिसके पास कोई भी शक्ति आई, उस का दुरुपयोग हुआ। किसी भी तरह की  सत्ता को सीमित करना, संतुलन में रखना किसी भी समाज में निहायत ज़रूरी है।

 सत्ता और शक्तिमत्ता समाज में कहीं भी हो, दूसरे व्यक्ति की स्वायत्तता पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है। भारत में या ऐसे देशों में खासकर, जिस मात्रा में, जो जितना कमज़ोर है उसके पास निजी स्वतन्त्रा उतनी ही मात्रा में कम है। आसपास गर्दन घुमा कर देखने से ही पता लग जाता है, शक्तिमता और दोहन दोनों के बहुत से चित्र आम दिख जाते हैं। स्वामित्व, सदाचार, जन्मजात और स्वाभाविक प्रकृति, नैतिकता और चेतना, मानवीय अनुभूति- सब कुछ उघड़ कर सामने साफ़ दिखता है। ख़ासकर हमारे समाज में, बच्चे, स्त्रियां, निर्धन, गरीब मजदूर, घरों में काम करने वाले, साधनहीन या किसी हद तक आज भी दलित, जो भी कमज़ोर है, उसी की स्वायत्तता कम कर दी जाती है। हमारी संस्कृति का यही मापदंड होना चाहिए कि हम उनकी स्वायत्तता की रक्षा करें। हर आज़ाद, सक्षम, मजबूत इंसान अगर इसी दिशा में सोचें और कानून कमज़ोर का साथ दे, तो एक खुशहाल समाज का निर्माण हो सकता है।

“The rights of every man are diminished when the rights of one man are threatened.”

  • John F. Kennedy

 

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