भाव, विचार और विचारधारा – अरुण कमल

भाव, विचार और विचारधारा – अरुण कमल

विचार-प्रसार के भीतर ही भाव-प्रसार भी होता है – रामचंद्र शुक्ल
कविता शब्दों से लिखी जाती है,विचारों से नहीं – मलार्मे
किसी भी घटना को नियंत्रित करने वाले नियमों के मुक़ाबले कहीं अधिक सम्पदा स्वयं घटना में होती है – लेनिन
विचार सूख जाते हैं,परंतु जीवन का वृक्ष हरा रहता है – गोयथे

अक्सर भाव और विचार को परस्पर विरोधी और विलोम माना जाता है। कुछ दार्शनिक पद्धतियों और साहित्य आंदोलनों में भाव की स्वायत्त श्रेष्ठता मानी जाती है और विचार को हीनतर अथवा अवांतर माना जाता है। ख़ास कर रोमांटिक आंदोलनों में।कविता के संबंध में यह सही भी लगता है।क्योंकि कविता मुख्य रूप से भावों का खेल है, भावों से बनी और ह्रदय को संबोधित। कविता के पास हम विचारों के लिए नहीं जाते।विचार तो दूसरी जगहों पर ज़्यादा गठे हुए मिल सकते हैं।कविता में और कला में भाव ही प्रधान होते हैं।अगर ऐसा नहीं होता तो सारे विचारक बड़े कवि होते जो कि अक्सर वे नहीं हो पाते।कविता भावों का भूगोल है।अनेक भाव अकेले या एक दूसरे के साथ मिलकर व्यक्ति के आंतरिक जीवन को तथा व्यक्तियों के परस्पर संबंधों को उद्घाटित करते हैं।एक साधारण मनुष्य अपने जगत को ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जानता है।एक वस्तु के संपर्क में आने पर उसकी इन्द्रियाँ प्रतिक्रिया व्यक्त करती हैं, संवेदित होती हैं और यह संवेदना उसे उद्वेलित करती है जिससे वस्तु के प्रति एक प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है या कहें कि भाव उत्पन्न होते हैं। यानी भाव इस भौतिक जगत के प्रति व्यक्ति की, या किसी भी प्राणी की, सबसे पहली, प्रामाणिक और प्राकृतिक प्रतिक्रिया है जो अभी अभी निकले अंडे की तरह उष्ण, तरल और अनाकार होता है जो जल्दी ही अपना निश्चित आकार प्राप्त कर लेता है। कवि उस भाव की बिल्कुल आरंभिक अवस्था को जानता है। एक अकेले भाव को और भावों के गुच्छ या भाव-शबलता को भी। जब अनेक भाव एक साथ उत्पन्न होते हैं तो कविता में जटिलता आती है। लोक गीतों में भाव प्राय: इकहरे होते हैं जबकि लिखित काव्य में और बड़े कवियों में शबल या संश्लिष्ट।ऑथेलो में प्रेम, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा ये सारे भाव एक साथ आते हैं। वाल्मीकि रामायण में जब राम भरत को वापस अयोध्या लौटने को कहते हुए बोलते हैं कि तुम लौट जाओ, मैं भी घने वन की ओर चलता हूँ, मेरी रातें अब और भी लम्बी होंगी, तो यहाँ अनेक भाव एक साथ प्रगट होते हैं—प्रेम, हताशा, क्षोभ, विराग सब एक साथ-साथ पंक्ति में। यह भाव-शबलता श्रेष्ठ काव्य का और जीवन की जटिलता का द्योतक है। इसे किसी भी विचार-घट में अँट नहीं सकता।कविता मनुष्य के आंतरिक जगत का उत्खनन करती है जिसमें कई बार स्वप्न लोक भी शामिल होता है।स्वयं रामायण में अनेक स्वप्न वृत्तांत हैं और शुभ संकेतों या अपशकुनों की दृश्यावलियाँ जो भावों का ही संकेत या अवलंबन हैं।प्रगीत या मुक्तकों में प्राय: एक भाव की केन्द्रीयता होती है।निराल की ‘मैं अकेला आ रही मेरे दिवस की सांध्य वेला ‘ को देखा जा सकता है।हाँलाकि यहाँ भी जैसे जैसे कविता बढ़ती है कई अन्य भाव भी गोचर होने लगते हैं—अब नहीं आते यहाँ पिक या शिखी,या ‘मैं हूँ पंक्ति वह लिखी’ में।कोई भी भाव बिल्कुल अकेला या इकहरा नहीं होता क्यसभ्यता ने हमारे भाव-जगत को भी जटिल बना दिया है।भावों को व्यक्त करने का एक ही साधन है।वो है भाषा।और शब्द।और ध्वनियाँ।और अंतराल या शब्दों का रोमहास।यही कवि का कर्म है,कवि का शिल्प जहाँ,जैसा कि मलार्मे ने कहा,कोई विचार काम नहीं देता,केवल शब्द ही साथ देते हैं।भाव के बराबर की ध्वनियों की खोज ही कवि की साधना है जो सबसे कठिन है।पुरुरवा पुरस्तं परेहि दुरापना वात इवाहस्मि—यह अंश हवा के हल्केपन और पकड में न आने के स्वभाव को शब्दों और ध्वनियों के विशिष्ट संयोग से व्यक्त करती है।उर्वशी उसी हवा की तरह है।यह अंश उर्वशी और पुरुरवा के अनेक संबंधों और संबंधों से जनित भावों को छिपाए हुए है।यही कविता की भूमि है।
जब हम विचार की कठोरता कहते हैं तो आशय शायद यह होता है कि विचार का चौखटा भावों के प्रसार को रोकता है।यह उस तख़्ते की तरह होता है जिस पर लिटा कर पहले क़ैदी को सजा दी जाती थी,जो भी हिस्सा बाहर होता उसे काट दिया जाता।विचार भी शायद उस तख्ते की तरह होते हैं जो भावों की तरलता को जमा देते हैं।एक दूसरी तरह से भी ये काम कर सकते हैं।भावों को संकीर्ण बनाकर।विचारों की संकीर्णता भावों को बढ़ने से रोकती है।शायद यही कारण है कि संकीर्णता और कट्टरता ने कभी भी महान कविता के लिए मुफ़ीद नहीं रही।और हर बार इसके बरक्स एक प्रतिरोधी विचार-शक्ति आयी जिसने कविता के लिए नयी ज़मीन तैयार की।भक्ति आंदोलन और सूफी आंदोलन इसके प्रमाण हैं।इससे यह भी लगता है कि कुछ विचार-प्रणालियाँ कविता के लिए और कविता में भावों के प्रकाशन के लिए ज़्यादा मुफ़ीद या सहयोगी होती हैं।रामचंद्र शुक्ल की उक्ति का अर्थ यहाँ खुलता है।विचार-प्यार में ही भाव-प्रसार भी होता है।कुछ विचार हमें अधिक संवेदनशील,सहानुभूति संपन्न और कारुणिक बनाते हैं जैसे स्वयं बौद्ध दर्शन।जैसे जाति-व्यवस्था विरोधी विचार।जैसे ही हम जानते हैं कि हमारे दुख किसी भगवान या भाग्य या पूर्व जन्म के फल नहीं हैं वैसे ही हमारा भाव-जगत बदल जाता है।शंबूक वाल्मीकि में है,भवभूति में है,पर बाद में नहीं है।इसका कारण कवियों के विचार जगत में होने वाल बदलाव है।पश्चिम में शेक्सपियर पहले कवि हैं जहाँ भाग्य या धर्म की कोई भूमिका नहीं है और इस कारण एक नयी कविता,नया भाव जगत और नये चरित्र आते हैं जो पहले संभव नहीं थे।और दॉस्तोव्स्की अपने धार्मिक विश्वासों के बावजूद पूछ पाते हैं ,इतना नन्हा बच्चा क्यों मरा,क्या यह पूर्व जन्म का फल है?और हिन्दी में प्रेमचंद पहले लेखक हैं जो धर्म के विचारों और बेड़ियों से मुक्त हैं और इस से एक नये भाव-संसार का जन्म हुआ।साथ ही,यह विचार कि समाज और सभ्यता के केन्द्र में राजे महाराजे नहीं बल्कि साधारण लोग हैं ,इसने भी होरी,घिसूँ और धनिया जैसे पात्र दिए।अगर हम पश्चिम के साहित्य पर नज़र डालें तो पाते हैं कि बर्गसाँ , फ्रायड के विचारों ने कथा की नयी दृष्टि और शैली को जन्म दिया , जिनके बग़ैर प्रूस्त या ज्वायस संभव नहीं होते।एनलाइटेन्मेन्ट से असहमति और तर्क के परे किसी सत्य की संभावना में विश्वास ने जादुई यथार्थवाद की नींव रखी।किन्तु इतना कहते हुए भी यह जोड़ना जरूरी है कि साहित्य के निर्माण में विचारों की भूमिका परोक्ष होती है।वास्तविक शक्ति स्वयं लेखक का जीवनानुभव होता है।मार्खेज कहते हैं,यथार्थ का स्थानापन्न कुछ भी नहीं।यह यथार्थ ही नये भावों,कथाओं और चरित्रों का निर्माण करता है।विचार भी जीवन के अनुभवों से ही बनते हैं।नये अनुभव और जीवन में हो रहे नये बदलाव नये विचारों को जन्म देते हैं जो फिर नये भाव-जगत को बनाने में सहायक होते हैं।भाव और विचार का यह द्वन्द्वात्मक संबंध है।विचारों का ठोस हिम जीवन के ताप से पिघल कर भाव का जल बन जाता है।
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भाव और विचार के संबंधों पर सोचते हुए मुझे हमेशा लगता है,और मैंने बार बार लिखा भी है,कि एक कवि के लिए विचारधारा से बड़ा है दर्शन और दर्शन से भी बड़ी है जीवन-दृष्टि जो हर कवि को स्वयं आयत्त करनी पड़ती है।कविता न तो विचार से बनती है न विचारधारा या दर्शन से।ये कविता के बाहरी उपस्कर हैं।एक समय में मार्क्सवाद के कुछ अनुयायियों ने विचारधारा यानी मार्क्सवादी सूत्रों को और उनके अनुसार रचित साहित्य को विशेष महत्व दिया।लेकिन मार्क्सवादियों में भी अनेक मत रहे।लुकाच और ब्रेख़्त का विवाद मशहूर है।बेन्यामिन और फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल की धारणा भी अलग थी।अर्न्स्ट फ़िशर की किताब आर्ट अगेन्स्ट आइडियालॉजि आज भी प्रासंगिक है।बाद के सिद्धांतकारों ने जिन्होंने मार्क्सवाद से संबंध जोड़ा,उनके विचार भी रूढ़िविरोधी रहे।स्वयं मार्क्स कविता की स्वायत्तता के हामी थे।फिर भी शीत युद्ध के दरम्यान विचाधारा पर अतिशय बल दिया गया।एक बात और दबा दी गयी कि पूँजीवाद की भी एक विचारधारा है,गाँधीवाद की भी,धर्म और जाति और नस्ल की भी।श्रेष्ठ कविता इन सभी संकीर्णताओं का अतिक्रमण करके अपने को सीधे जीवन से जोड़ती है।जीवन की घटना महत्वपूर्ण है,घटना को नियंत्रित करने वाले नियम नहीं।हमारे लिए घड़ी द्वारा दर्शाया गया समय महत्वपूर्ण है,कील और चक्के या क्वार्ट्ज या बैटरी नहीं ,हाँलाकि वे होंगे ही।दिलचस्प यह है कि दुनिया में अब तक ऐसी कोई श्रेष्ठ रचना नहीं बनी जिसकी जड़ संकीर्ण विचारधारा में हो।कविता हमेशा उदात्त की अभिव्यक्ति है।न तो भारत में न अमेरिका में कोई लेखक धुर दक्षिणपंथ का समर्थक है,न हिंसा या नफ़रत का।समस्त विश्व की कविता का उत्स करुणा और प्रेम में है, आदिकवि वाल्मीकि के क्रन्दन और व्याधे को शाप में।हर कविता बधित क्रौंच पक्षी के पक्ष में ब्याधे को शाप है।जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं।

 

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