राशिद ख़ान! राशिद ख़ान! – भई क्या आवाज पाई है और क्या अंदाज़ है। जो भी सुने, इन बातों का कायल हुए बिना नही रह सकता। सो चाहने वालों की कमी भी नहीं। वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, कवि, संगीतकार या फिर विद्यार्थी, दुकानदार यहाँ तक कि टैक्सी चालक तक। इंदीपॉप और फिल्मी गानों के इस दौर में शास्त्रीय गायक की ऐसी लोकप्रियता से आश्चर्य? नहीं, राशिद के संगीत की तासीर ही कुछ ऐसी है। आश्चर्य तो इस बात का है कि एक कुमार गन्धर्व पुरस्कार को छोड़ 2006 तक पुरस्कारों की झड़ी क्यों नहीं लगी। शायद कमसिन और उस पर स्वभाव से ही लजीला होना भी अपराध है। बालों की सफेदी को छोड़ें तो भोला चेहरा, मासूमियत भरी शख्सियत, अपनों के बीच हंसी-मसखरी से बाज नहीं आती खूबसूरत काली, निष्पाप आँखें, कभी-कभी छोटी-मोटी बातों पर झगड़ने को आमादा, तेज़ धार जुबान और ज़रा से प्यार पर जान छिड़कने को तैयार इंसान – आखि़र बच्चों के से मन का ही प्रतिबिम्ब हुआ न।
राशिद को, या यूँ कहें-उस्ताद राशिद ख़ान को पिछले कुछ सालों में बहुत सुनने का मौका़ मिला। ख़ुश किस्मती से अलग-अलग समय पर, दिन के प्रहर के अनुसार अलग-अलग रंग के रागों के साथ। रात ढले, भोर की पहली किरण का स्वर-पंखुरियों से स्वागत करती तोड़ी सुनी डोवर लेन संगीत सम्मेलन की अंतिम सभा में। उसी नशे में बाहर निकली तो बड़ी मुश्किल से टैक्सी मिली। चालक और साथ में उसका सहायक। अविश्वास के इस युग में मुझ अकेली को थोड़ा डर तो लगा पर लाचारी ने हिम्मत दी। पर दो चार पल काफी थे यह समझने को कि दोनों ही ठहरे राशिद के फैन! चुपचाप उनकी आपसी बातचीत सुनती रही और यह सोच कर निश्चिन्त, निढाल पड़ी रही कि ऐसे सहृदय लोग मुझे अपने आप घर तक छोड़ देंगे, बिना घुमाये, मीटर दौड़ाए, या भोर की सुनसान सड़कों का नाजायज फायदा उठाये। सुना, राशिद की आवाज़ ही उनको खींचती है। कोलकाता के हर कोने पर। जहाँ भी राशिद गाते हैं – वे भी भरसक कोशिश करते हैं वहीं पहुंचने की। बाकी रागदारी-वारी उनकी पहुँच के बाहर है। हाँ, तानों की स्पीड और तराने बहुत पसन्द हैं, खा़सतौर से।
बड़ा मज़ा आया चुपचाप, नींद का बहाना करके दो संगीत प्रेमियों की बातें सुनकर – खा़सकर जब गायक अपना भी बड़ा प्रिय हो। याद आया राशिद को पहली बार देखा भर था दिल्ली में ग्वालियर घराने के वयोवृद्ध विद्वान गायक पंडित कृष्णराव शंकर पंडित की सौंवी जन्मजयंती पर। उन्हें सम्मानित करेंगे प्रधानमंत्री राजीव गॉंधी। इस अवसर पर स्वरांजलि देंगे पूरे भारतवर्ष के सबसे होनहार संगीत शिक्षार्थी राशिद ख़ान । इसी सिलसिले में संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता की टीम के साथ उनका दिल्ली आना हुआ था।
दुबला-पतला, बस मसें भीगी थीं तब शायद। सचमुच का बच्चा। पर टीन एज में लड़कियॉं जितनी खूबसूरत दिखती हैं, लड़के उतने ही अटपटे और आत्मविश्वास से कोसों दूर नज़र आते हैं। ‘आगे दर्शन धारी, पीछे गुन बिचारी’ की दुहाई देकर बहाने से चली आई थी दूसरा कोई बेतुका काम निपटाने। फिर पहली बार सुना प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद में। आइ.टी.सी. द्वारा आयोजित संगीत सम्मेलन की एक शाम राशिद ने राग चुना था बागेश्री। उस दिन पता नहीं कहॉं से आँखों में इतने आँसू आये। सोचती रही – इस बेतुके दिखते नौजवान की आवाज़ में क्या जादू है। तरतीबवार सिलसिला तो शास्त्रीय गायकी की पहली कसौटी है। उस कसौटी तक पहुँचने में बड़ी दूरी नापनी बाकी है अभी, पर इतनी तासीर? क्या यह ऊपरवाले की खा़स देन नहीं?
राशिद की वही दुबली-पतली काठी याद रही। करीब पाँच-छः साल बाद कोलकात्ता के संगीत रिसर्च अकादमी में ही फिर सामना हुआ। तो पहचान तक नहीं पाई। भरा बदन, खिला-खिला आत्मविश्वासी सॉंवला सलोना चेहरा। देश-विदेश में अपनी धाक मनवा कर ‘स्टार’ की हैसियत रखने वाला खूबसूरत युवा गायक – बच्चों-सा चुलबुला। पूरी अकादमी के ‘फेवरिट राशिद भाई डाइनिंग हाल में फरमाइशें पूरी कर रहे थे। कभी नाना की गायकी तो कभी दूसरे उस्तादों के स्टाइल की नक़ल! हू-ब-हू हाथ-पांव चलाना भी, मुँह के भाव भी वैसे। गाने के घंटे भर बाद ओडि़सी नृत्य की बारी। पूरा हाल हंसते-हंसते लोट-पोट हो ही रहा था। अब तो जैसे घिग्घी बंधने लगी। पास ही बला की खूबसूरत बीवी सोमा। वह इतनी खुल कर मिलने में झिझकती सी लगी। दो प्यारी बेटियों की माँ के लिए स्वाभाविक ही था – पर बाप?- बाप रे बाप! टैक्सी की ब्रेक ने भी ऐन मौके़ पर यादों की दुनिया से वास्तव के धरातल पर ला खड़ा किया।
फिर कुछ दिनों में ही दीपाली दी (श्रीमती दीपाली नाग) ने अपनी संस्था ‘सप्तसुर की जयंती के उपलक्ष्य में राशिद को गाने के लिए कहा। मेरे ही सामने बात छिड़ी। उन दिनों के बहुत पहले से ही तो राशिद आसमान के चमकते सितारे हैं। बड़ी मुश्किल से लोग उन तक पहुँच पाते हैं। पर दीपाली दी की बात ही कुछ और थी । संगीत रिसर्च अकादमी की एक्सपर्ट कमिटि की सदस्या रूप में संगीतज्ञा दीदी ने राशिद को बहुत बढ़ावा दिया। यही नहीं, लिखने-पढ़ने के साथ पाजामा तक पहनने का सलीका सिखाया। वाकये ही कुछ ऐसे थे। आकाशवाणी के एक ही ऑडीशन में ए ग्रेड पाने वाले बच्चे को फार्म पर दस्तख़त देना था। सो दीदी ने अपने सामने बिठा कर घंटों अभ्यास करवाया दस्तख़त का। फिर, एक कार्यक्रम सैकड़ों संगीतप्रेमियों से भरा। उनके सामने ग्यारह साल का अजूबा यह बच्चा गाने को तैयार। स्टेज पर चढ़ा तो पाजामा उतर गया। दीदी ने झट अपने आँचल में लपेट लिया, गोद में उठाकर पर्दे के पीछे ले आई, नाड़ा बाँधा और स्टेज पर हाजि़र किया। सो दीदी तो माँ के साये से महरूम राशिद के लिए मॉं समान ही हुई न। प्यार के मुरीद राशिद तुरन्त राजी़ हो गये। ‘दीदी बुलाएँ और मैं न गाऊँ यह तो हो ही नहीं सकता।’ लेकिन अपाइंटमेंट देना सोमा का काम। सोमा ने रविवार सुबह का समय दिया। शनिवार को बम्बई में एक प्रोग्राम निबटाकर सुबह सवेरे कोलकाता आकर सीधे दीदी के पास।
बांगला के इस युग के सुविख्यात कवि-लेखक जय गोस्वामी ने एक बार कहा था, ‘राशिद को कभी सुनवाइये।’ – सो उन्हें और युवा कवि सन्दीप चटर्जी को साथ लेकर शरत सदन, बेहाला पहुंची निर्दिष्ट दिन पर। दीपाली दी के ‘सप्तसुर’ का कोरल ग्रुप कार्यक्रम के शुरू में गीत-भजन गा चुका। पंडित शंकर घोष का तालवाद्य -वृन्द भी हो चुका। तब भी राशिद का पता नहीं। कब आयेंगे, कब वॉर्मिंग अप (गला गर्म करने ग्रीन-रूम का गायन पर्व) होगा और कब साज़ मिलाये जाऍंगे। सब चिंतित और समय के मामले में अंग्रेज़ दीदी परेशान। तभी ऐन वक्त पर राशिद पहुंचे। सीधे एयरपोर्ट से स्टेज पर ही साज़ मिलाया- तानपूरे की एक जोड़ी, स्वर मंडल, सुरपेटी और तबला। भरी दोपहर का राग लिया शुद्ध सारंग-पूरी गरिमा के साथ। जैसा स्वर विस्तार, वैसा ही बोल बनाव। तानों की झड़ी ऐसी कि सुनने वाले को पसीना आये। पुकार ऐसी कि ऑंखें नम हो जाऍं। फ़रमाइश पर भैरवी में सुनाया ‘आज-राधा ब्रज को चली’। गोधरा का घाव हरा ही था। ऐसे में एक मुसलमान की आवाज़ की तूलिका से आकाश के कैनवस पर श्रीराधा का चित्रण कुछ ऐसा असर कर गया कि जय गोस्वामी झर-झर रो पड़े। कुछ ही दिनों में, उनकी तब तक अप्रकाशित कविता ‘शान्ति कल्याण’ की कुछ पंक्तियों के पोस्टर गले में लटकाये, गुजरात की आग बुझाने को तत्पर समाज सेवी सड़कों पर उतर आये। वे पंक्तियाँ थीं-
“अविश्वास, अविश्वास जितना भी मारे मुझे
हे विश्वास, अभी उस दिन मैंने अपनी आँखों देखा।
राशिद खा़न सुर छेड़ें तो ब्रज को चलें श्रीराधा
ब्रज को चली, ब्रज को चली, भैरवी की किरण सी।”
(मूल बांग्ला से अनूदित)
इन्हीं दिनों की जलती आग में उस्ताद फै़याज़ ख़ॉं की भूली बिसरी समाधि भी बड़ौदा में जला डाली गई। जिस दिन यह खबर कोलकाता की चेतना को सुन्न कर गई इत्तिफ़ाक से उसी दिन श्रीठाकुर सत्यानन्द की जन्मशतवार्षिकी का विराट सांगीतिक आयोजन था नेताजी इनडोर स्टेडियम में। रात्रिव्यापी अनुष्ठान। सोनू निगम के भजन गायन से शुरू होकर शास्त्रीय संगीत के चमकते ग्रह-नक्षत्रों से जड़ी रात का आयोजन। प्रेम के ठाकुर सत्यानन्द। शास्त्रीय संगीत के प्रथम गायक राशिद। स्वभाव से ही प्रेमी। संगीत से प्रेम किया तो संगीत ने भी उतने प्रेम से गले लगाया। बस यही प्रेम का रिश्ता ही रंग लाया। कभी भी रियाज़ पर ज़ोर नहीं दे सके। फितरत ही नहीं रही ऐसी। उस्ताद के मार-धाड़ के डर से भी नहीं। आखिर नाना ही तो उस्ताद थे। कितना मारते ! पर देखने वालों के दिल आज भी दहल जाते हैं उन दिनों को याद करके। नाना की उँगली थामे बदायूँ से आये इस होनहार बच्चे से पूरी अकादमी के गुरुओं को प्यार हो गया था। पंडित ए. कानन, सुनील बोस, विदुषी मालविका कानन, गिरिजा देवी-सभी प्यार से सुनाते, समझाते। जहाँ से जो सुनता गले में उतार लेने वाले इस बच्चे से पूछो क्यूँ, कैसे तो जवाब में भोली सी हॅंसी मिलती। पर गाने को कहो तो लाजवाब पेशकश! कोई सख़्ती करें तो कैसे! नतीजा यह कि राशिद भी शैतानी से बाज़ नहीं आते और नाना उस्ताद निसार हुसैन ख़ॉं भी अपनी जि़द से टस से मस नहीं होते। नौबत जूतों की पिटाई से लेकर घर से बाहर निकाले जाने पर अकादमी के पेड़ों की छाँह में भूखे पेट आँसू बहाने तक पहुँच जाती। अकादमी के निर्देशक विजय किचलू एक बार इसे समझाएँ तो एक बार उन्हें मनाएँ। कभी प्यार से तो कभी ऊँचे ओहदे की गर्मी दिखा कर। फिर कुछ दिनों तक शान्ति। फिर वही गड़बड़। यही सिलसिला चलता रहा जब तक उस्ताद जीते रहे। उन दोनों की आख़री लड़ाई शायद राशिद की जीवनसंगिनी के चुनाव को लेकर हुई-संगीत नहीं। क्योंकि तब तक वही बेतुका बच्चा देखते-देखते अपना एक ख़ास मकाम बना चुका था। पर ‘ कैसे’, पूछें अगर, तो जवाब मिलेगा, “क्या मालूम। सब गुरु और ऊपरवाले की मेहरबानी है। बातों में क्या रखा है। बात करनी आती नहीं। सिर्फ गा सकता हूँ। ख़ुदा गवाता है, मैं गाता हूँ ।”
सो उस रात राशिद ने प्रिय राग जोग सुनाया। एक तो आवाज़ का जादू, ऊपर से दोनों गन्धार और मध्यम से इस राग का जो एक रूप बनता है वह भी कम नहीं दिल की गहराई तक उतरने में। सोनू निगम के उछलते-कूदते फैन भी इस जादू की कै़द में धीरे-धीरे आ गये – शान्त, समाहित! छोटे-बड़े सब चुपचाप। होश जब आया तब तक राशिद उठ कर खड़े हो चुके थे। फरमाइशों की झड़ी को हाथ जोड़ कर टालते हुए बोले, “बहुत रात बीत गई है, और भी बड़े-बड़े कलाकार हैं, अप्पाजी (गिरिजा देवी) हैं। माफ करें,” और मुड़ कर चले गये। बड़ौदा में सोये आफताब-ए-मुसीकी की याद के अपमान का प्यार भरा उत्तर दिया गुरुजनों के लिये सम्मान दिखाकर ।
कुछ दिनों बाद राशिद एक नया प्रयोग करते पाये गये। सितार के साथ जुगलबन्दी। वैसे तो जुगलबन्दी की परम्परा नयी नहीं। दो गायक, दो वादक या युगल नर्तक मंच पर एक साथ अपनी कला के माध्यम से साझेदारी, अपनत्व या आपसी समझ का प्रदर्शन करते रहे हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध जुगलबन्दी रही है पंडित रविशंकर और उस्ताद अली अकबर खा़न की-सितार और सरोद पर। गायक और वादक की जुगलबन्दी एक साहसपूर्ण नया क़दम है जिसकी शुरुआत की थी मरहूम उस्ताद मुनव्वर अली खा़न ने उस्ताद इमरत खा़न के सितार के साथ। मुनव्वर साहब की अकालमृत्यु ने इस पर रोक सी लगा दी। उस्ताद इमरत ख़ान के सुपुत्र निशात खा़न के साथ राशिद ने फिर यह प्रयोग किया। बड़ा सफल रहा इन दोनों की साझेदारी में निखरा राग यमन और बिहाग। सी.सी.एफ. सी. का विशाल प्रांगण हर क्षेत्र के सितारों से जगमगा उठा था उस शाम।
इसके कुछ ही दिन बाद प्राचीन कला केन्द्र द्वारा आयोजित संगीत सभा में राशिद गा रहे थे पूरिया और हंसध्वनि। हंसध्वनि में उस्ताद अमीर खाँ की बड़ी प्रिय बन्दिश है ‘लागी लगन’। राशिद की आवाज़ में यह बन्दिश सुनते-सुनते मरहूम उस्ताद की एक बात याद आई जो उन्होंने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ के विषय में कही थी। वह यह कि “अगर आवाज़ पर नम्बर दिये जाऐं तो बड़े ख़ाँ बैठते ही सौ में सत्तर ले जाते हैं जबकि बाकी़ लोगों को बड़ी मुश्किल से तीस या चालीस मिलते हैं। गायकी के दम पर कोई कितना जीते।” यह उस ज़माने की बात थी जब अमीर खाँ और बड़े खाँ के चाहने वाले यह तय नहीं कर पाते थे कि कौन ज़्यादा बड़ा कलाकार है। इस दौर में भी कई गायक लोकप्रियता के शिखर पर हैं लेकिन राशिद की आवाज़ के लिए, आज के परिप्रेक्ष्य में, शायद बहुतों को अमीर खाँ साहब की वह बात जॅंचेगी। लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत के स्वर्ण युग के इन दो महान उस्तादों को सुन चुके संगीतज्ञों का मानना है कि राशिद को अपने नाना के बाद किसी उस्ताद से और तालीम लेनी चाहिए थी। राशिद की आवाज़ के दीवाने कुछ श्रोता, जो उन्हें कई सालों से सुनते आये हैं, यह कहते मिलते हैं कि अब वे रिकार्ड सरीखे सुनाई देते है और उनकी यह प्रेडिक्टेबिलिटी आकर्षण के ज्वार को भाटे की ओर ले जा रही है।
बावजूद इसके इस हर दिल अज़ीज़ गायक को 2002 में कुमार गन्धर्व पुरस्कार मिला। एक अति लोकप्रिय गायक की स्मृति में युवा गायकों को, जिनकी उम्र चालीस वर्ष से कम हो, दिया जाने वाला यह सम्मान मीरा के उस कथन को चरितार्थ करता है, “जौहर की गत जौहरी जाने।” इस जौहर के अन्दर छिपा संवेदनशील मन अपने आप में एक और जौहर है जो गुरुस्थानीय हर संगीतज्ञ की सेवा में कुछ कर गुज़रने को तत्पर रहता है। पंडित वी.जी. जोग की चिकित्सा के लिए हो या पंडित सुनील बोस की’ सहायता के लिए, विदुषी मालविका कानन के सम्मान में हो या पंडित ए. कानन के बिगड़ते स्वास्थ्य की देखभाल के दायित्व की बात हो-हर मौके पर राशिद बड़ी श्रद्धा से संगीतांजलि देते पाये गये है और बिना किसी दिखावे के यथासम्भव गुरुदक्षिणा भी। आखिरकार इन सभी महान संगीतज्ञों से राशिद ने संगीत शिक्षा से भी बढ़ कर जो पाया, वह है प्यार। प्यार के मुरीद राशिद ने अपनी माँ की स्मृति में 1999 में एक ट्रस्ट बनाया ‘शाखरी बेग़म मेमोरियल ट्रस्ट’ जिसके माध्यम से वयोवृद्ध संगीतसेवियों की सेवा के साथ नयी प्रतिभा के विकास का बीड़ा उठाया।
इसके लिये अपनी अति व्यस्तता के बावजूद संगीत के शिक्षार्थियों को सिखाना शुरू किया। फिर क्या था! उन जैसे आइकान के सान्निध्य में आने की ललक से शिक्षार्थी उमड़ पड़े! यहाँ तक कि हरियाली से नहाये अपने सुंदर निवास के प्रिय बागीचे के एक बड़े हिस्से पर ट्रस्ट के अन्तर्गत राशिद ख़ाँ ने संगीत अकादमी के भवन का निर्माण किया और बड़ी श्रद्धा से कई गुणी –कलाकारों को गुरू का आसन देकर शिक्षार्थियों की प्राथमिक शिक्षा का दायित्व उनके सुपुर्द कर दिया और ख़ास तालीम लेने वालों की जिम्मेदारी ख़ुद सम्हाली। सोमा की अथक निगरानी ने एक दशक में ही इस संगीत प्रतिष्ठान को एक डिजिटल संगीत अकादमी का रूप दिया जो फिफ्थ नोट ग्लोबल सेंटर फार एक्सेलेंस नाम से प्रसिद्ध है। इस सेंटर के अपने प्रेक्षागृह में हर शुक्रवार दरबार सजता है नए नए युवा कलाकारों के प्रदर्शन को मंचस्थ करने के लिये। सेंटर के चल निकलने के बाद अगले ही साल – वर्ष 2010 में, राशिद-सोमा की जोड़ी ने अगरतला में संगीत ग्राम स्थापना करके अपने उस सपने को साकार किया जो उत्तर पूर्वी भारत में सोमा के सुर-ऋद्ध मायके असम में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का गढ़ बनाना चाहता था। वे किस हद तक सफल हुये हैं यह तो वो अधिक जानते हैं जो राशिद के पदचिन्हों पर चलते हुये देश के इस अलग थलग लेकिन सुरीली संस्कृति संपन्न सात प्रदेशों (जिन्हें सेवेन सिस्टर्स कहा जाता है) तक पहुँच गये हैं शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देने की चाह में।
इसी एक दशक, यानी 2000-2010, ने राशिद को सफलता के शिखर तक लगातार बढ़ते देखा और अपनी आवाज़ को शास्त्रीय संगीत के बाहर अन्य विधाओं में भी परखते देखा। उनके श्रोताओं में हर तबक़े के लोग हैं, हर उम्र के, हर धर्म के, सम्प्रदाय के। फ्यूज़न के इस दौर में सभी जब दौड़ रहे थे तब संगीत की किसी दूसरी विधा की ओर उनका पहला कदम बढ़ा प्रिय मित्र प्रख्यात सरोद वादक एवं संगीत निर्देशक तेजेन्द्र नारायण मजूमदार के आमंत्रण को सम्मान देने की मंशा से। यह प्रयोग ‘नैना पिया से ‘ के नाम से रेकार्ड हुआ। इसमें नातिया क़व्वाली, ग़ज़ल आदि की खुशबू राशिद की मदमाती आवाज़ की शास्त्रीयता में घुल मिल गयी जो श्रोताओं को बहुत पसंद आयी। कुछ ऐसा ही हुआ 2004 में इस्माइल दरबार के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किसना- द वारियर पोएट’ के उन दो गानों के साथ जो राशिद ने गाये। फिर आया जब वी मेट (2007) फिल्म के लिये संदेश शांडिल्य द्वारा सूरारोपित वह हर मनभावन सुपर हिट गाना – ‘आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे।’ गाना तो गाना – इसका नशा इतना सर चढ़ कर बोला कि इसके इंटरल्यूड को भी लाखों लोगों ने बड़े चाव से अपने फ़ोन का कालर ट्यून बना लिया। सुप्रसिद्ध युवा गायिका कौशिकी चक्रवर्ती तक ने!
फिर क्या था गानों की फरमाइश ले कर हिन्दी फिल्मों की तरह बांग्ला फिल्में भी क़तार में लग गईं।
इसी तरह राष्ट्रीय पुरस्कारों में भी जैसे होड़ लगी कि कौन राशिद के पास पहले पहुँचे! 2004 तक जिस गायक को केवल मध्य प्रदेश की सरकार ने कुमार गंधर्व सम्मान से भूषित किया था – उसी को भारत सरकार ने 2006 में एक नहीं – दो दो गौरवशाली सम्मान से विभूषित किया – पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड! राशिद की उम्र उस समय कुल जमा 38 साल।
ऊपर वाले ने चौथा सदस्य भेज कर एक और अरमान पूरा किया। परिवार के चौथे सदस्य की बात चल निकली तो याद आया – संगीत रिसर्च अकादमी के अत्यंत गुणी गुरू और स्वनामधन्य विद्वान गायक पंडित उल्हास कशालकर की पत्नी संजीवनी कशालकर उन दिनों कोलकाता रेडियो में ऊंचे पद पर कार्यरत थीं। वे भारतीय राग संगीत के समय चक्र के आठों प्रहर के रागों की विशेषताओं को दर्शाते गायन वादन और शास्त्रीय व्याख्या पर आधारित आठ एपिसोड बना रहीं थीं! इस की शास्त्रीय व्याख्या संगीत के प्रकांड विद्वान पंडित कुमार प्रसाद मुखर्जी ने लिखी थी। अंगेज़ी में। और मैं ने हिंदी में। इसी बहाने मुझे रेकार्डिंग के समय उपस्थित रहने का मौक़ा मिला। इसमें भाग लेने के लिये कोलकाता के ध्रुपद विद्वान फाल्गुनी मित्रा, शहनाई नवाज उस्ताद अली अहमद ख़ाँ, ठुमरी सम्राज्ञी विदुषी गिरिजा देवी, उल्हास जी सरीखे लगभग सभी बड़े कलाकारों को आमंत्रित किया गया था। कशालकर दम्पति के चहेते राशिद तो इसके स्टार कलाकार थे ही!
रेकार्डिंग के पहले कुशल वार्ता के समय पूछा – ‘घर में सब ठीक तो हैं राशिद भाई? सोमा, सूहा-शाओना?’ तानपूरा मिलाते मिलाते जवाब में लाज भरी मुस्कान के साथ राशिद बोले – ‘अब तो सूहा शाओना का एक भैया भी आया है!’ मैं ने उनकी उस झेंपती सूरत की अनदेखी करके पुरजोश बधाई देकर बेटे का नाम पूछा तो पता चला कि बड़े अरमान से जो चाहा था वो ख़ुदा के करम से मिला तो इसलिए सब उसे अरमान कह कर ही पुकारते हैं।
इसके कुछेक साल बाद कई दफ़ा नन्हे से अरमान को अपने साथ लेकर राशिद मंच पर आते थे; खासतौर से स्वामी विवेकानन्द की जन्म जयंती पर आयोजित शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में अपनी संगीतांजलि देते वक़्त। धीरे धीरे, बिना किसी ज़ोर जबरदस्ती के अपने बेटे को घराने की ख़ासियत दिखाने और समझाने लगे। अरमान की सुरीली आवाज़ ने अब सोमा और राशिद के दिलों में उसे ख्याल गायक के रूप में देखने के अरमान जगाये और यह स्वाभाविक ही है! घराने का कोई तो प्रतिनिधि बने। सूहा भी बड़ी सुरीली है मगर क्लासिकल ख्याल की ओर उसकी रुझान ही नहीं! वो सूफी संगीत की क़ायल निकली। बच्चों के पिता से अधिक उनके दोस्त राशिद ने उनके ज़ाती पसंद में कभी अपनी राय नहीं थोपी; बल्कि बढ़ावा दिया।
मुझे पूरा विश्वास है कि राशिद की यही सहृदयता उनके संगीत में झलकती है तासीर के रूप में। वर्ष 2010 में संगीत रिसर्च अकादमी के प्रतिष्ठाता व निदेशक पंडित विजय किचलू की 80वीं सालगिरह को इंडो आक्सीडेंटल सिम्बायोसिस के कर्णधार शौभिक दासगुप्ता ने राजकीय रूप में मनाया कोलकाता के खकाखच भरे रवींद्र सदन में। इस महा समारोह में पंडित शिवकुमार शर्मा जैसे देश के कई महान कलाकारों ने भाग लिया। उनमें राशिद भी थे। उम्रदराज़ कलाकारों में सबसे छोटे लेकिन सभी के चहेते। शायद इसी वजह से शाम की महफ़िल शुरू ही हुई उनके गायन से। राग मधुवंती। जाने पहचाने बहुल प्रचलित इस गोधूलि वेला के राग में तीव्र मध्यम से लिपटा कोमल गंधार जब शुद्ध ऋषभ पर थोड़ा ठहर कर षडज पहुचता है तब साधारणतया ऐसा लगता है कि वेदना को उपशमित करने आत्मविश्वासी ऋषभ की सहायता ली गई है षडज सरीखे घर में वापसी के पहले! लेकिन इसी रागवाचक स्वर समूह को राशिद ने कुछ इस अंदाज से छुआ, परखा और परोसा कि राग का अंतर्निहित करुण रस का प्रभाव कम नहीं हुआ। ऋषभ के आत्मविश्वास से परिपूर्ण गोद में आकर बैठने के बाद भी नहीं! अवाक सोचती रही कि मधुवंती में इतनी मीठी कसक पहले कभी नहीं देखी! राशिद जैसे दिलवाले कलाकारों की दिव्य दृष्टि ने देखा होगा तभी इस राग का इतना मीठा नामकरण हुआ – मधुवंती! यानी जो मधु से भरपूर है। अचानक मेरी सोच का सिलसिला टूटा जब श्रोता-दर्शकों की फरमाइशें कानों में बसे सुरीले संसार को झकझोरने लगीं। हाल के एक छोर से कुछ दर्शक ज़ोर ज़ोर से आवाज़ दे रहे थे – ‘राशिद भाई! ‘आओगे जब तुम! आओगे जब तुम!!’ पहले तो राशिद अनसुनी करते हुये तानपूरे को मिलाते रहे अपनी अगली प्रस्तुति के लिये। लेकिन आवाजें थमने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। आख़िरकार राशिद ने हाथ जोड़ दिए। शैतानी पकड़े जाने पर शैतान बच्चे की सी दबी मुस्कान के साथ कनखियों से आस पास का हवाला लेते हुये बोले – ‘मरवाओगे क्या! यहाँ (विजय किचलू) अंकलजी हैं, शिवजी हैं; और भी काफ़ी बुजुर्ग क्लासिकल सुनने आये है! ऐसी जगह पे फिल्मी गीत? हमसे नहीं होगा।” उनकी इस सीधी सच्ची बात का भला कोई क्या बुरा मनाता!
ऐसी ही सादगी झलकती है उनके उन वीडिओज में जिसमें उन्होंनें जुगलबंदी की है पंडित भीमसेन जोशी सरीखे महान सुरसिद्ध अनुभवी गायक के साथ! यह ख़बर आते ही कुछ समालोचक कहते मिले – राशिद को ये क्या सूझी अपने पैर आप कुल्हाड़ी मारने की! अच्छा भला नाम और पैसा कमा रहे , इस कटु सत्य का सामना करने का साहस जुटा रही थी कि एक विडिओ हाथ लग गया। देखा तो मुग्ध हों गई। बार बार देखा लेकिन अपनी मुग्धता का कारण यही समझा कि दोनों मेरे बड़े ही प्रिय गायक हैं। कई साल बाद पूरब अंग गायकी को पुनरुज्जीवित करने के प्राजेक्ट के अन्तर्गत इस गायकी की किंवदंती संगीतज्ञा गिरिजा देवी की पट्टशिष्या एवं साहित्य और संगीत की प्रकांड पंडिता मंजु सुन्दरम जी से साक्षात्कार करने का सौभाग्य मिला गुड़गांव के प्रख्यात संगीत रसिक-‘वी एस के’ बैठक के आयोजक और पूरब अंग गायकी के एकनिष्ठ संरक्षक विनोद कपूर जी की व्यवस्थापना में। आजकल कहीं संगीत की चर्चा हो और राशिद की बात ना हो ऐसा नामुमकिन है। सो चर्चा हुई – दिल -दिमाग़ को रौशन करने वाली, सकारात्मक, स्नेह और श्रद्धा की चाशनी में डूबी हुई। जब राशिद और जोशीजी के इस जुगलबंदी की बात निकली तो मंजु दीदी बोलीं ‘इसे तो हरेक को देखना चाहिए मैं तो यही देखती रही कि अपने से बड़े कलाकार के साथ बैठ कर कितनी श्रद्धा और विनम्रता से उनको सुनना और अपनी बात सुनानी चाहिए इसकी एक मिसाल रखी है राशिद ने । साधारणतया इस उम्र के कलाकार तैयारी का बढ़ चढ़ कर प्रदर्शन करते हैं लेकिन यहाँ राशिद ने अपनी युवा शक्ति को प्रशमित करते हुये जोशीजी को उच्चासन पर बिठाया। जोशीजी ने भी बड़े स्नेह से अपने अनुभवों का ख़ज़ाना राशिद पर न्यौछावर किया! यह अपने आप में कितनी सुंदर और सीखने वाली बात है, ज़रा सोचो तो!”
गुरुजनों का ऐसा स्नेह राशिद को हमेशा ही मिला। इस बात को वे बड़ी कृतज्ञता से याद करते हैं और उन सकारात्मक यादों को ही सबके साथ साझा करते मिलते हैं। अभी हाल ही में जब उनको पद्मभूषण से सम्मानित किया गया तब एक प्रतिष्ठित पत्रिका के अनुरोध पर उनसे साक्षात्कार के लिये समय माँगा तो बोले, ‘दीदी, आप तो सब कुछ जानतीं हैं; नया क्या सुनाऊँ!’ लेकिन आश्वस्त हुये तो अपने ग्लोबल सेंटर के आफिस में काफ़ी खुल कर बातचीत की। पुरानी यादों को टटोलते बोले, ‘बदायूँ में मैं तो खेल के मैदानों में ही पाया जाता था। जब संगीत रिसर्च अकादमी बनी, उसके साल भर पहले ही विजय किचलू अंकल नाना (सहसवान घराने के किंवदंती गायक उस्ताद निसार हुसैन ख़ाँ) से कलकत्ता आने की गुजारिश कर गये थे। ना जाने क्या सोच कर नाना अपने साथ मुझे भी यहाँ ले आये। उन दिनों अकादमी न्यू अलीपुर के एक मकान में था। गुरुओं में सबसे पहले आने वालों में थे उस्ताद लताफत हुसैन ख़ाँ साहब, अप्पाजी (गिरिजा देवी )और नाना। उस समय मेरी उम्र का कोई वहाँ नहीं था इसलिये बेहद अकेलापन महसूस करता था। कभी अप्पाजी के पास जाकर बैठा रहता उनका सिखाना देखता, उनके हाथ का बना चूड़ामटर मज़े लेकर खाता; तो कभी खाला के साथ रसोई में खाना बनाने के काम में उनका हाथ बटाता। इस तरह कुछ ठुमरी के मुखड़े याद हो गये और थोड़ा बहुत खाना बनाना भी सीख गया। गाने की तालीम और रियाज़ से पहले भी जी चुराता था, और न्यू अलीपुर आकर ऐसा लगा कि जैसे जेलखाने में क़ैद हूँ।’
मैं ने याद दिलाने की मंशा से कहा – आपके नाना के कड़क मिजाज़ से संगीत जगत परिचित ही है! तो मुस्कुरा कर हामी भरी और हँसते हुये बोले, ‘नाना सभी से अकड़ कर ही मिलते थे। ग्रुप फोटो में भी सबसे अलग दिखेंगे! मैं बेहद शैतान था, रियाज़ नहीं करता था – मार तो पड़नी ही थी। मेरे उस्ताद की जूती मेरे सर आँखों पर – आज जो भी हूँ , जैसा भी गाता बजाता हूँ – सब कुछ उन्हीं की तालीम की वजह से ही है! और हाँ ये भी मानना पड़ेगा कि कलकत्ते में आने के एक साल बाद जब हम टालीगंज के आज वाले ठिकाने पर पहुँचे, वहाँ की हरियाली, खुले मैदान, खेलने की खुली छूट, हमउम्र दोस्त, गाने बजाने का माहौल- इन सब की वजह से मुझमें बदलाव आया। सब से ज़्यादा असर तो सबसे मिले प्यार का पड़ा। मैं ने खाया नहीं है जान पाते ही सुनील (बोस) काका ने कितने दिन अपने हाथों निवाले तोड़ कर मुझे खिलाया। किचलू अंकल पिटाई से मुझे बचाने मेरी कितनी बदमाशियाँ नाना से छुपा गये। इन सारी बातों के अलावा जब दूसरों को रियाज़ करते देखता था तो मैं भी वहीं बैठ कर सुनता सुनाता था। अजय (चक्रवर्ती )दा, अरुण (भादुड़ी )दा को घंटों रियाज़ करते सुना। क्लासिकल के ऐसे माहौल में मैं अगर फिल्मी गाना गाता तो भी सब मेरी तारीफ ही करते । ऐसा प्यार भरा माहौल न मिलता तो पता नहीं आज क्या करता।’
राशिद की इस स्वीकारोक्ति में मुझे किचलू जी की उन विवरणों की प्रतिध्वनि मिली जो उन्होंने मुझे उनके जीवन चरित (रोली बुक्स दिल्ली द्वारा प्रकाशित विजय किचलू – ए स्कल्प्टर आफ़ टैलेंट) पर काम करते समय दीं। राशिद की ईश्वर दत्त प्रतिभा के असर को लेकर कई वाकये भी सुनाये जिनमें एक तो उस समय की बात है जब राशिद ने बस सीखने में थोड़ी दिलचस्पी दिखाई भर थी और ग्रेडेशन टेस्ट देने की बात पर उनके नाना यानी उस्ताद ने ना नुकुर तक नहीं किया था। अकादमी के स्कालरों की यह परीक्षा लेने कुछ विद्वान संगीतज्ञों को ‘एस आर ए एक्सपर्ट कमिटी मेंबर्स’ में शामिल करके सादर आमंत्रित किया जाता था। इनमें रवीन्द्र भारती यूनिवर्सिटी के संगीत विभाग के उस समय के वरिष्ठ संगीताचार्य पंडित अमिय रंजन बनर्जी भी थे। इन परीक्षकों को हर परीक्षार्थी के लाग बुक में उसके गायन की निरपेक्ष समीक्षा लिखनी पड़ती थी जिससे उसके विकास में सहायता मिल सके। हर बार की तरह उस दिन भी अमिय बाबू ने बड़ी निष्ठा से सब के लाग बुक में अपने बहुमूल्य सुझाव दिए। अब राशिद की बारी आई। बचपन से कैशोर्य की ओर बढ़ते उस दुबले पतले लड़के से उन्हें कुछ ख़ास प्रत्याशा नहीं थी। लेकिन जब राशिद गा चुके और स्टेज से उठ भी गये, तब भी अमियबाबू मंत्रमुग्ध से चुपचाप बैठे रहे। जब किचलू साहब ने उनसे अपनी राय देने का अनुरोध किया तो उन्होने हाथ जोड़ कर कहा – ईश्वर के बनाये इस अजूबे पर क्या राय दूँ ! पर इतना जानता हूँ कि एक दिन यह विश्व विख्यात गायक बनेगा।
अमिय बाबू की भविष्यवाणी जल्दी ही रंग लायेगी इतना पारखी दिमाग़ तो किचलू साहब रखते ही थे; और इसीलिए राशिद पर उनकी पैनी नज़र रहती थी। लेकिन उन दिनों तो राशिद पर फिल्मी गीतों का जादू चढ़ा हुआ1 था। इस तथ्य की पुष्टि के लिए मैं ने आखिरकार पूछ ही लिया – “आप फिल्मी गाना, ख़ासकर रफ़ी साहब के गाने बहुत उम्दा गाते थे ऐसा सुना है। निसार हुसैन ख़ाँ साहब इस बात पर ख़फ़ा नहीं होते थे?” ‘अरे नहीं नहीं! बल्कि नाना तो खुश हुआ करते थे।’ चहकते हुए राशिद बोले। ‘शायद इसीलिए अप्पाजी की ठुमरी दादरा के भाव को थोड़ा बहुत अपना सका। मुझे अप्पाजी कितनी बार पकड़ लेतीं और कहतीं ‘सिर्फ़ स्थायी गाने से चलेगा? अरे अंतरा तो सही तरह से सीख ले!’
आजकल तो राशिद ग़ज़ल भी गाते हैं। नाइन इलेवेन के हादसे के बाद जब हवाई अड्डे के अमेरिकन सिक्योरिटी के व्यवहार से राशिद नेस्तनाबूद हुये तब से अमेरिका की ओर रुख़ नहीं लेने की कसम खाई है। अब मिडल ईस्ट के देशों ने बार बार बुलाना शुरू किया और शास्त्रीय संगीत के साथ साथ ग़ज़ल की भी फरमाइश रखी। जनरंजन और अपनी अकादमी की बढ़ोत्तरी के लिये पैसे का जुगाड़ करने को ग़ज़ल गाना कुछ बुरा तो नहीं। जैसा देश वैसा भेष वाली कहावत तो यही सिखाती है।
सिखाना कितना पसंद है और किस तरीक़े से सिखाते हैं? मेरे इस प्रश्न के जवाब में बोले, ‘अब हमारा ज़माना तो अपने साथ अदब क़ायदे भी ले गया। आज के सीखने वालों को नाना के स्टाइल में सिखाना नामुमकिन है। और सच पूछें तो ज़रूरत भी नहीं क्योंकि आज के बच्चे बड़े जहीन हैं। हममें से बहुतों ने स्कूल देखा ही नहीं। सिर्फ़ और सिर्फ़ गाना सीखा। मेरे कई शागिर्द हैं जो पढ़ाई मैं भी अव्वल हैं, गाने में भी आगे हैं। आज कोई भी अनपढ़ रह कर गाना नहीं सीखता। ऐसे बच्चों को काफ़ी ढील देनी पड़ती है। मेरा बेटा अरमान तो पढ़ाई भी करता है और ख़ुदा के करम से मुझसे सीखता है, गाता भी है।’
अरमान का एकल गायन अभी नवंबर 2022 के दूसरे हफ़्ते ही सुना पंडित समर साहा द्वारा आयोजित संगीत पियासी के प्रसिद्ध मंच पर से। काफ़ी सुरीला और तैयारी के साथ राग यमन गाया। फिर उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ साहब की गाई अमर, सदाबहार याद पिया की आये को अपने नए अंदाज में इलेक्ट्रिक गिटार बजाते हुये गाया। इन नए प्रयोग से राशिद को कोई शिक़ायत नहीं क्योंकि इस ज़माने का यही दस्तूर है । उन्हें खुशी इस बात की है कि गाने की नींव तो सही है!
राशिद को कहते सुना- ‘आप मेरे सिखाने के तरीक़े के बारे में जानना चाह रहीं थीं तो उसमें नया कुछ करने की नहीं सोची। वो सब तो पुश्त दर पुश्त चला आ रहा है।’ कुछ बात है हम में कि हस्ती मिटती नहीं हमारी! कुछ ऐसा ही अंदाज था पद्मभूषण उपाधि से अलंकृत इस युग के हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के जादूगर गायक उस्ताद राशिद ख़ाँ का जिन्होंने कोविद महामारी के चलते किसी भीषण बीमारी को पछाड़ दिया और फिर से अपनी दिलकश आवाज़ से दुनिया को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं, स्टाईलिश सोमा के बनवाये कपड़ों में बन संवर कर और नये हेयर स्टाईल को अपना कर एक नयी इमेज बना रहे हैं , भविष्य के लिये अच्छे गायक तैयार कर रहे हैं, उनको मंचस्थ कर के प्रोत्साहित करने के लिये कार्यक्रम करवा रहे हैं, वयोवृद्ध या बीमार कलाकारों की सहायता कर रहे हैं . .
आजकल तो राशिद ग़ज़ल भी गाते हैं। नाइन इलेवेन के हादसे के बाद जब हवाई अड्डे के अमेरिकन सिक्योरिटी के व्यवहार से राशिद नेस्तनाबूद हुये तब से अमेरिका की ओर रुख़ नहीं लेने की कसम खाई है। अब मिडल ईस्ट के देशों ने बार बार बुलाना शुरू किया और शास्त्रीय संगीत के साथ साथ ग़ज़ल की भी फरमाइश रखी। जनरंजन और अपनी अकादमी की बढ़ोत्तरी के लिये पैसे का जुगाड़ करने को ग़ज़ल गाना कुछ बुरा तो नहीं। जैसा देश वैसा भेष वाली कहावत तो यही सिखाती है।
