सबके दिमाग में अपनी–अपनी पिच्चर चल्लई है… सब साले हीरो बनना चाह रहे हैं अपनी पिच्चर में। इ साला हिंदुस्तान में जब तक सनीमा है… लोग चूतिया बनते रहेंगे।
-रामाधीर सिंह, गैंग्स ऑफ वासेपुर-2, 2012
हिंदुस्तान के लोगों के बारे में क्या यह सिर्फ सस्ता-सा फिल्मी ‘ऑब्जर्वेशन’ है, फिल्म में रामाधीर सिंह बताता है कि वह इसलिए नहीं वासेपुर पर राज कर रहा ‘काहे कि असली बाहुबली है’ बल्कि वह सनीमा नहीं देखता। मतलब सनीमा देखने वाले धोखे में जी रहे हैं। इसी धोखे में आदमी वासेपुर का कबूतर बन जाता है और ‘यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ता है और दूसरे से अपना इज्जत बचाता है।’ सुल्तान कुरैशी की यह बात पकड़ में आ जाए तो गहरी है। नहीं तो सिर के ऊपर से उड़ जाने दीजिए। निर्देशक अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ भले अपराध कथा है, मगर सौ फीसदी भारतीय मिट्टी की कहानी है। यह उस ‘गैंग्स ऑफ बॉलीवुड’ के सिनेमा से बिल्कुल अलग है, जिसके लिए फिल्मों में भारतीयता के मायने अमेरिका-यूरोप-कोरिया के सिनेमा की सस्ती नकल है और हिंदी पट्टी की कहानी का मतलब साउथ की फिल्मों का रीमेक है।
रामाधीर सिंह की बात को दशक भर ही गुजरा है मगर अचानक दिख रहा है कि तस्वीर उलट गई। हिंदी सिनेमा की स्वप्निल दुनिया में खो जाने वालों ने ‘गैंग्स ऑफ बॉलीवुड’ के हाथों ‘बनना’ बंद कर दिया है। आज बॉलीवुड की 95 फीसदी से ज्यादा फिल्में टिकट खिड़की पर दर्शकों के लिए तरस रही हैं। दो साल पहले तक दो सौ, तीन सौ से पांच सौ करोड़ कमाने का खम ठोकने वाले सितारे और निर्माता-निर्देशक चित पड़े हैं। लोग बॉलीवुड के जिस सिनेमा के सपनों में खोए थे, अचकचा कर जैसे जाग गए हैं। सिर्फ जागे नहीं, बल्कि बागी हो गए हैं। ‘बायकॉट बॉलीवुड’ सच है या झूठॽ क्या यह हिंदी सिनेमा का क्रांतिकारी मोड़ हैॽ यह क्या एकाएक कुछ दिनों, कुछ महीनों में हो गयाॽ यह सिर्फ थोड़े समय की बात है और फिर सब पहले जैसा हो जाएगाॽ चलिए, थोड़ा पीछे चलते हैं।
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2014 भारत के फिल्म इतिहास में परिवर्तनकारी साल है। आमिर खान स्टारर पीके 2014 की सबसे कामयाब फिल्म बनी। वह फिल्म जो राजग के दूसरे कार्यकाल तक सोशल मीडिया और वाट्सएप पर ‘हिंदू विरोधी’ सिनेमा की प्रतिनिधि तस्वीर बन गई। जिसमें देवी-देवताओं, परंपराओं, संस्कारों का अपमान दिखा कर हिंदू भावनाओं को आहत किया गया। उस बरस निर्देशक राजू हिरानी की यह फिल्म सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बॉलीवुड फिल्म थी। दुनिया भर में साढ़े आठ सौ करोड़ रुपये का कलेक्शन। उस साल फिल्म को जितना प्यार मिलने की गवाही बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के आंकड़ों में है, आज की तारीख में आमिर खान को इस फिल्म के कारण सबसे ज्यादा नफरत मिल रही है। पीके से लेकर 2022 में रिलीज हुई लाल सिंह चड्ढा का सफर, आमिर खान के लिए चोटी से खाई तक की ढलान है। बीच में 2016 में उनकी दंगल सफल हुई । दंगल की कहानी भी हरियाणा की पृष्ठभूमि पर थी। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ नारे के साथ पूरे देश का जनमानस बेटियों को सशक्त बनाने के लिए तैयार था।
मार्च 2022 में निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स में फिल्म की अकल्पनीय सिनेमाई-राष्ट्रवादी-सफलता में कट्टरता, नफरत और इस्लामोफोबिया चरम पर दिखता है। कई शहरों में फिल्म के प्रदर्शन के दौरान सिनेमाघरों में और बाहर दर्शकों की नारेबाजी, नफरत का शोर, आक्रामक तेवर पूरे माहौल को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाते रहे। यह फिल्म 1990 में आतंकियों द्वारा कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को बंदूक की नोंक पर घाटी से निकालने और उन पर अमानवीय अत्याचारों, बलात्कारों और ‘नरसंहार’ को दिखाती है। लेकिन फिल्म की रिलीज के बाद मैदान में उतरे राजनीतिज्ञों तथा धार्मिक संगठनों ने द कश्मीर फाइल्स को मात्र फिल्म नहीं रहने पर्दे के पीछे की सक्रियता कामयाब रही और मार्च में रिलीज हुई करीब 15 करोड़ के बजट वाली फिल्म ने मई तक दुनिया भर में 350 करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा छू लिया। द कश्मीर फाइल्स हिंदी सिनेमा के इतिहास में अकल्पनीय सफलता दर्ज करते हुए अपनी जगह बना चुकी है।
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द कश्मीर फाइल्स से पहले जिस फिल्म ने लोगों को इसी तरह आंदोलित किया, वह थी 2019 में आई उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक। 18 सितंबर 2016 को झेलम नदी के किनारे बसे उरी में हुए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले पर भारतीय सेना के पलटवार को दिखाने वाली फिल्म उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक के संवाद, ‘हाऊ इज द जोश!’ ने दर्शकों में देशप्रेम का नया उत्साह भर दिया। फिल्म में परेश रावल कहते हैं, ‘ये नया हिंदुस्तान है, ये घर में घुसेगा भी और मारेगा
उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक 11 जनवरी 2019 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। रिलीज के दिन प्रधानमंत्री ने मुंबई में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय का उद्घाटन किया था। इस दौरान बॉलीवुड के कई दिग्गज निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मौजूद थे। इस मौके पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय फिल्में अब पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही हैं और लगे हाथ इंडस्ट्री के लोगों से फिल्मी भाषा में सवाल पूछ लियाः हाऊ इज द जोश!
उन्हें फिल्म में सैनिकों द्वारा दिया जाने वाला जवाब मिला था, ‘हाई सर।’
उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक से पहले मुस्लिम आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के राजपूताना पर आक्रमण तथा रानी पद्मिनी के जौहर पर बनी फिल्म पद्मावत आई थी। इसी साल जनवरी में महारानी लक्ष्मीबाई की बायोपिक मणिकर्णिका और मार्च में 1897 में 21 जाट-सिख योद्धाओं द्वारा अफगान/इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सरागढ़ी की लड़ाई पर केसरी आई थी। क्या यह फिल्मों के माध्यम से जगाई हिंदू गौरव की भावनाओं का ध्रुवीकरण थाॽ क्या बॉलीवुड का सिनेमा वोटों की राजनीति में एक अहम टूल बनाॽ पूरी दुनिया में कलाकार के बारे आम धारणा है कि वह ‘सत्ता का सहज विपक्ष’ होता है। हमेशा आम आदमी के हक में खड़ा रहता है, चाहे सत्ता किसी की हो। लेकिन बॉलीवुड का एक वर्ग खुलकर ‘सत्ता का सक्रिय पक्ष’ बन के उभरा। इसने न केवल सरकार की हर नीति-रीति का समर्थन किया, बल्कि विरोध में दिखने वाले इंडस्ट्री के साथियों पर खुलकर तीखे हमले किए। यह बॉलीवुड में वैचारिक विभाजन की शुरुआत थी।
फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कभी गर्व से कहा जाता था कि यहां किसी तरह का भेदभाव नहीं है। हिंदू-मुस्लिम का बंटवारा नहीं है। राजनीतिक मतभेद नहीं हैं। परंतु यह गुण-धर्म फिल्मों की कहानियों के साथ बदलने लगा। सोशल मीडिया इन कलाकारों के एक-दूसरे पर हमले का मैदान बन गया। इनके विवाद कई बार नफरत और हिंसक विचारों तक पहुंचे। ऐसा लगा कि जैसे एक से प्यार जताने के लिए दूसरे के खिलाफ जहर उगलना जरूरी शर्त है।
इस राजनीति में बॉलीवुड बंट गया। सिनेमा को बेहिचक, बिना खेमेबाजी के प्यार करने वाले भी धड़ों में विभाजित हो गए। क्या बॉलीवुड प्रोपेगंडा फिल्मों का शिकार हो गयाॽ
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नवराष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और हिंदुओं में धार्मिक जागरूकता का सिनेमा बनाते हुए बॉलीवुड के फिल्मकारों ने इतिहास में प्रवेश किया। इतिहास संवेदनशील मुद्दा रहा है और ‘इतिहास का पुनर्लेखन’ बड़ी बहस का विषय। जिसमें शहरों-संस्थानों के नाम बदलने से लेकर विद्यालयीन और विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में बदलाव समय-समय पर सामने आते रहे। इतिहास को लेकर संवाद-विवाद में न्यूज चैनल भी बड़ी भूमिका निभाते नजर आते हैं, लेकिन सोशल मीडिया और ‘वाट्सएप युनिवर्सिटी’ ने समाज में कई मुद्दों पर बड़ी गफलत पैदा की। जहां तक बॉलीवुड फिल्मों का सवाल है तो बाजीराव मस्तानी (2015), पद्मावत (2018), मणिकर्णिका (2019), केसरी (2019), पानीपत (2019), तान्हाजी (2020) हाल के वर्षों में आया मध्यकालीन इतिहास का बॉलीवुड सिनेमा है। परमाणुः द स्टोरी ऑफ पोरखण (2018), राजी (2018), गोल्ड (2018), मिशन मंगल (2019), गुंजन सक्सेनाः द कारगिल गर्ल (2020), शेरशाह (2021), भुजः द प्राइड ऑफ इंडिया (2021) में खेल के मैदान और विज्ञान के स्वर्णिम पलों के साथ हमारे सैनिकों की जांबाजी को दर्ज किया गया। हमारा समकालीन राजनीतिक इतिहास भी इंदु सरकार (इंदिरा गांधी के निर्देश पर इमरजेंसी, 2017), ठाकरे (2019), पीएम नरेंद्र मोदी (2019), द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर (मनमोहन सिंह, 2019) और द कश्मीर फाइल्स (2022) में सामने आया। यहां मेकर्स के पूर्वाग्रह साफ दिखते हैं। इनमें से कुछ फिल्मों पर विवाद भी हुए। उनके एकतरफा रुझान की आलोचना भी हुई। फिलहाल राष्ट्रवादी और राजनीतिक फिल्मों का यह दौर थमा नहीं है। इनका आना जारी है।
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बीते कुछ वर्षों में अंदरूनी विवादों ने हिंदी सिने-उद्योग को गहरी चोट पहुंचाई। बॉलीवुड अब एक परिवार नहीं, टुकड़ों में बंटा कुनबा है। इस फूट ने फिल्म इंडस्ट्री पर पड़े तमाम पर्दे गिरा दिए। कई राज उजागर किए। राजनीतिक रस्साकशी में एक खेमा, दूसरे को ध्वस्त करने लगा। सोशल मीडिया पर छिड़ी लड़ाई इंडस्ट्री के लिए दो धारी तलवार साबित हुई। फैन्स और फॉलोअरों का इससे सिर्फ मनोरंजन हुआ। यह राजेश खन्ना का जमाना नहीं है कि कोई सितारा बरसों बाद स्क्रीन पर लौट कर दावे से कह सके, ‘बाबू मोशाय, मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता।’ सोशल मीडिया का आभासी दौर सिनेमा की दुनिया से ज्यादा नकली है। यहां किसी सितारे के लाखों फैन्स-फॉलोअर दिखते हैं परंतु जब उसकी फिल्म सिनेमाघर में आती है, तो सौ दर्शक भी नहीं पहुंचते। फिल्म औंधे मुंह गिरती है।
बॉलीवुड के जो खेमे सोशल मीडिया की आड़ में अपनी ‘ट्रोल आर्मी’ बना कर एक-दूसरे की फिल्मों के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे, वे अंततः खुद शिकार बन गए। 2022 में ज्यादातर सितारे और फिल्में इसी दुष्प्रचार का शिकार हुए। पूरी इंडस्ट्री ‘बायकॉट’ की चपेट में आ गई। ‘बायकॉट बॉलीवुड’ दर्शकों के मन में किसी ‘मूल्य’ की तरह चमका। सोशल मीडिया में होने वाले सर्वे और जारी वीडियो में आप लोगों की प्रतिक्रियाएं देखिए। असल में उन्हें समझ आ गया कि जिन्हें वे सितारा समझते है, वे बेहद साधारण हैं। तमाम कमजोरियों से भरे हुए। कभी-कभी तो उनमें उतने मानव मूल्य भी नहीं दिखते, जितने एक आम आदमी में नजर आते हैं।
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2020 के आते-आते कोरोना ने पैर पसार दिए थे और लगभग पूरी दुनिया के घरों में कैद होने जैसा अकल्पनीय दृश्य सबने देखा। इस दौरान 17 मार्च से 14 अक्तूबर तक देश के सिनेमाघरों पर ताला लगा रहा। हवा-पानी-भोजन के साथ मनोरंजन भी बुनियादी जरूरत है, घरों में बंद लोगों ने शिद्दत से यह महसूस किया। तब देश के लोगों का ओटीटी से परिचय गहराया। यह ओवर-द-टॉप मनोरंजन इंटरनेट के माध्यम से टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच रहा था। इसमें फिल्मों और टीवी का कंटेंट शामिल था। यह दर्शक को अपनी मर्जी से, अपनी जगह और समय की सहूलियत से फिल्म, सीरियल, डॉक्युमेंट्री, समाचार वगैरह देखने की सुविधा दे रहा था। इसने दर्शकों को सिनेमाघर तक जाकर कुर्सी पर जमने और महंगे पॉपकॉर्न-समोसे-बोतलबंद पानी की शर्त से आजाद कर दिया। इसमें कंटेंट के भरपूर विकल्प थे। एक साथ सैकड़ों फिल्में। वेबसीरीज नाम की नई चीज। जिसमें उसे हिस्सों में टीवी धारावाहिकों की तरह बंटी कहानी का अगला भाग देखने के लिए अगले दिन या हफ्ते भर तक रुकने की मजबूरी नहीं थी। अच्छा लगने पर वह तुरंत आगे देख सकता था और न लगने पर बीच में छोड़ सकता था। इसका खर्च भी कम था। परिवार के साथ सिनेमाघर जाने में जितने पैसे खर्च होते, उससे कहीं कम में यहां एक ओटीटी प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन साल भर के लिए मिल रहा था।
ओटीटी ने दर्शक को घर बैठे विकल्प दिए कि वह परिवार के साथ भी मनोरंजन कर सकता है और चाहे तो एक कोने में बैठ अकेले भी। दर्शक के लिए यह एक और मुक्ति थी। वह अपने ‘इंटलेक्ट’ के हिसाब से कुछ भी चुनने को स्वतंत्र हो गया। यह बात बॉलीवुड के लिए घातक साबित हुई। ओटीटी ने भाषाओं की दीवार तोड़ दी। इन प्लेटफॉर्मों पर हिंदी से इतर देसी और विदेशी भाषाओं की फिल्म, सीरियल, वेबसीरीज, डॉक्युमेंट्री और तमाम अन्य मनोरंजन या ज्ञानवर्द्धक चीजें उपलब्ध थीं। कहीं वे हिंदी या अन्य भाषाओं में डब होकर थीं तो कहीं सब-टाइटल्स के साथ। आजादी जीवन का सबसे बड़ा ‘मूल्य’ है, हिंदी सिनेमा के दर्शक ने इस एहसास को जीया। उसने कोरोना-काल में ऐसा बहुत सारा अन्य भाषाओं का कंटेंट देखा, जो पहले तभी देख पाता, जब बॉलीवुड हिंदी में रीमेक करता। यह जरूरत खत्म हो गई। साथ ही दर्शक का ओरीजनल से सामना हो गया। तब दर्शकों ने समझा कि कैसे ओरीजनल से रीमेक होकर आई कहानियों की मूल संवेदना और चमक खो जाती है। कैसे बॉलीवुड अपने पीतल पर सोने की चमक का मुलम्मा चढ़ा देता है। कोरोना काल में ओटीटी से रू-ब-रू दर्शक का बॉलीवुड से जो मोहभंग शुरू हुआ, उसने हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को मजबूर किया कि वे कंटेंट पर ध्यान दें।
ओटीटी परिवार की सामूहिकता में विभाजन लेकर आया। एक छत के नीचे एक इंटरनेट कनेक्शन इस्तेमाल करते सदस्य अपने-अपने मोबाइल पर अलग-अलग कंटेंट देख रहे हैं। टीवी में कम से कम एक समय में एक कार्यक्रम, एक चैनल देखने की बाध्यता थी। ओटीटी ने व्यूइंग को पर्सनल बना दिया। क्या यह गुड न्यूज हैॽ तय है कि इसके दूरगामी नतीजे होंगे। सिनेमाघरों का दौर सामूहिक या सामाजिक मनोरंजन का था। टीवी ने समाजिक दायरे को काट कर परिवार में समेट दिया। ओटीटी पर मनोरंजन पूरी तरह से व्यक्तिगत बन गया। इससे दर्शक भले ही फायदे में दिखता हो, लेकिन कंटेंट बनाने वालों के लिए मुश्किल है। समूहों की जगह अब उन्हें व्यक्ति के बारे में सोचना है। व्यक्ति का मूड और पसंद कभी भी बदल सकती है। अब हर समय यह सवाल सामने रहता है, ‘व्हाट इज नेक्स्टॽ’
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सभ्यताओं के इतिहास में भाषा मनुष्य के द्वारा रची, सहेजी और पैतृक-पारंपरिक ढंग से अर्जित की गई सबसे मूल्यवान संपत्ति है। भाषाओं ने हर सीमा-बाधा को पार करते हुए इंसानों को जोड़ा है। हर तरह के विकास में भाषा पर्दे के पीछे रहते हुए महत्वपूर्ण योगदान देती है। भाषा का सौंदर्य उसकी मर्यादा में है। इस काल में भाषा की मर्यादा लगातार सवालों के घेरे में रही। चाहे टीवी हो, सोशल मीडिया हो या सिनेमा और वेब सीरीज। इनमें नेताओं के बयान और भाषण भी जोड़ लीजिए। सबने मर्यादाएं तोड़ी हैं। पर यहां बात सिनेमा की। खास तौर पर ओटीटी पर प्रसारित ‘हिंसक और अश्लील दृश्यों’ तथा ‘हिंसक और अश्लील शब्दों’ ने देखने-सुनने वालों की चेतना पर निरंतर चोट की है। लोगों ने इस पर आपत्तियां और शिकायतें दर्ज कराई। बार-बार मांग उठी कि ओटीटी के कंटेंट को भी थियेटरों में लगने वाले सिनेमा की तरह सेंसर की कैंची के नीचे से गुजरना चाहिए। बात अदालतों तक पहुंची, लेकिन ठोस निष्कर्ष नहीं आया। बहुत-सी बातें अस्पष्ट हैं।
अमेजन प्राइम पर आई वेब सीरीज तांडव के विरुद्ध कथित तौर पर हिंदू देवी-देवताओं के अपमानजनक चित्रण के मामले की सुनवाई करते हुए, मार्च 2021 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ओटीटी प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने के लिए एक तंत्र बनाने की जरूरत है। पीठ ने सरकार से पूछा, ‘हमारा सवाल यही है कि किसी स्क्रीनिंग की जरूरत है या नहीं, क्योंकि सिनेमाहॉल की तरह घर में बैठकर आप सब कुछ देखते हैं।’ पीठ ने आगे कहा, ‘फिल्म देखने का पारंपरिक तरीका धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो रहा है, लोग अब टॉकिज या मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने के बजाय घर में फिल्म देखना ज्यादा पसंद करते हैं। बाहर जाकर देखी जाने वाली फिल्मों के लिए हमारे पास सेंसर बोर्ड है लेकिन ओटीटी कंटेट पर लगाम लगाने के लिए सेंसर बोर्ड नहीं है।’ इसके बरक्स डेढ़ साल बाद अक्तूबर 2022 में नेटफ्लिक्स की चर्चित वेबसीरीज मिर्जापुर पर रोक लगाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य जताया, ‘सीधे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली वेबसीरीज, सिनेमा या अन्य कार्यक्रमों के लिए कोई ‘प्री-स्क्रीनिंग’ समिति कैसे हो सकती हैॽ’ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और बेला एम. त्रिवेदी के सम्मुख मिर्जापुर में रहने वाले सुजीत कुमार सिंह की ओर से दायर याचिका आई थी, जिसमें डायरेक्ट ओटीटी पर रिलीज होने वाले कंटेंट के लिए ‘प्री-स्क्रीनिंग’ समिति बनाए जाने का अनुरोध था। कोर्ट ने कहा, ‘वेबसीरीज के लिए कोई प्री-स्क्रीनिंग समिति कैसे हो सकती है? यह एक विशेष कानून है, जब तक आप नहीं कहते कि ओटीटी भी इस कानून का हिस्सा है। आपको कहना होगा कि मौजूदा कानून ओटीटी पर भी लागू हो। इसके बाद कई सवाल उठेंगे क्योंकि इनका प्रसारण दूसरे देशों से भी होता है।’ कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने का निर्देश देते हुए, मिर्जापुर के तीसरे सीजन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। साफ है कि ओटीटी पर प्रसारण सामग्री से संबंधित सिर्फ नैतिक और व्यावहारिक ही नहीं, बहुत से तकनीकी और कानूनी पेच भी हैं।
ओटीटी पर क्या दिखाना और क्या नहीं दिखाना चाहिए, यह लगातार बहस का मुद्दा है। यहां निजता और व्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर अभिव्यक्ति की आजादी तक के सवाल उठते हैं और सब गड्डमड्ड हो जाता है। यह जल्दी खत्म होने वाली बहस नहीं है। लेकिन बहस, विचार-विमर्श या बातचीत में भाषा का अमर्यादित होना बड़ी चिंता का विषय है। मंत्री से संतरी तक, मीडिया से सोशल मीडिया तक, मनोरंजन के लिए बने कंटेंट से लेकर बच्चों द्वारा मोबाइल पर इस्तेमाल किए जा रहे स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्मों पर भाषा देख लीजिए। भाषा तार-तार हो रही है। इसका सीधा असर आपसी मानवीय व्यवहार पर पड़ रहा है। भाषा में अब सिर्फ खुशामद स्वीकार्य है। सत्ता और सिनेमा ही नहीं, समाज के प्रत्येक वर्ग में साधारण आलोचना तक बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है।
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आलोचना पत्रकारिता का महत्पूर्ण अंग है। आलोचना सुधार की दिशा में संकेत करती है। सुधार की जरूरत की व्याख्या भी करती है। उसके अपने विचार-विश्लेषण होते हैं और कई बार विशिष्ट आग्रह भी। बीते कुछ साल पत्रकारिता के लिए शर्मनाक संबोधनों से भरे रहे हैं। ‘प्रेस्टीट्यूट’, ‘बिकाऊ मीडिया’, ‘गोदी मीडिया’, ‘उड़कचुल्लू एंकर-एंकराएं’ या फिर हर प्रिंट-टीवी-डिजिटल में मौजूद एडिटर के लिए ‘पेडिटर’ का इस्तेमाल। पतित पत्रकारिता अब नग्न रूप में सामने है। इसमें हिंदी की सिने-पत्रकारिता भी शामिल है। फिल्मों या सितारों की आलोचना को झूठ बता कर, सब कुछ ‘मैनेज’ करने की कोशिशें यहां खूब हैं। शीर्ष सत्ता से लेकर सिनेमा के बड़े-छोटे सितारों का एक ही लक्ष्य है, ‘छवि’ हर हाल में चमकती दिखनी चाहिए। गांधीजी को लगातार धूमिल करने के प्रयासों के बीच, उनके चित्र-छपे नोटों से आजकल चेहरे पुंछवाए जा रहे हैं।
हिंदी सिनेमा देश का मुख्य सिनेमा है। बरसों से वही सबसे ज्यादा फिल्में बनाता और सबसे ज्यादा कमाता रहा है। सबसे बड़ा दर्शक वर्ग हिंदी का है। दशकों से हिंदी की फिल्में ‘नेशनल’ हैं, देश की धड़कन हैं, लेकिन मजेदार बात यह कि सिनेमा के पीआरओ हिंदी मीडिया को ‘रीजनल’ कहते हैं। फिल्मवालों के लिए अंग्रेजी मुख्य भाषा है। हिंदी का दर्जा दोयम है। इसे सहज स्वीकार भी कर लिया गया है। अतः हिंदी के सौ में से 99 पत्रकारों की आत्मा पर पीआरओ द्वारा ‘रीजनल’ कहे जाने पर कोई चोट नहीं पहुंचाती। एक्टर-डायरेक्टर-प्रोड्यूसर भी हिंदी मीडिया से सौतेला बर्ताव करते हैं। जबकि उन्हें पहुंचना है हिंदी के दर्शक-पाठक तक। हिंदी मीडिया सिनेमा की दुनिया के आगे घुटने टेके नजर आता है। वजह है, दुधारू गाय की लात का लिहाज। फिल्मों की रिलीज से पहले और बाद में मीडिया में विज्ञापन जारी होते हैं। साथ ही, मीडिया हाउसों को अपने सालाना जलसे या क्षेत्रीय कार्यक्रमों में एक्टरों को बुलाने का मोह रहता है। फिल्मी सितारों के आने से प्रायोजक और भीड़ जुटाना आसान हो जाता है।
मुंबई स्थित फिल्म पत्रकारों से हिंदी के मीडिया हाउस बिजनेस मैनेजर होने की मांग करते हैं। पत्रकार फिल्म की खबरों के साथ फिल्म का विज्ञापन भी लाए। हालांकि अब यह उम्मीद हिंदी में किसी भी बीट पर काम करने वाले पत्रकार-रिपोर्टर से की जाती है कि वह अपने संपर्कों का इस्तेमाल सीधे-सीधे संस्थान के लिए विज्ञापन लाने, उसके लिए दलाली करने या उसे किसी न किसी रूप में फायदा पहुंचाने के लिए करे। ऐसा कुछ न करे, जो पत्रकारिता के लिए ‘आदर्श’ है। संस्थानों की बेशर्मी और पत्रकारिता की शर्मिंदगी का यह नया दौर है। इसने हिंदी के पत्रकारों को कहीं का नहीं रखा।
फिल्म पत्रकार सदा मांगने वाले की मुद्रा में रहते हैं। किसी एक्टर या डायरेक्टर से इंटरव्यू करना उनके काम का हिस्सा है और सिने-संसार तथा पत्रकारिता के परस्पर संबंधों में उसका हक है। मगर यह इंटरव्यू भी पत्रकारों को ‘मांगना’ पड़ता है। पीआरओ से चिरौरी करनी पड़ती है कि एक्टर-डायरेक्टर का इंटरव्यू करा दे। जिस पीआरओ को फिल्मी दुनिया और फिल्म मीडिया के बीच पुल बनना चाहिए, वह आज सबसे बड़ी दीवार है। इस दीवार के पीछे एक्टर-डायरेक्टर खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि ज्यादातर के पास सामान्य सवालों के जवाब नहीं होते और असुविधाजनक प्रश्न उनकी कल्पना से बाहर हैं।
इक्का-दुक्का फिल्म में सौभाग्य से सफल होते ही एक्टर और हिंदी फिल्म पत्रकार के बीच सीधे ‘संवाद’ की स्थिति खत्म हो जाती है। कोई पत्रकार इस सद्य सफल दो-टकिया एक्टर को सीधे फोन लगा कर इंटरव्यू का समय मांगे, तो वह कहेगा पहले मेरे पीआरओ से बात कीजिए। वह अरेंज करेगा। ज्यादातर एक्टर अकेले इंटरव्यू नहीं देते। वह बगल में अपने मैनेजर या पीआरओ को बैठा कर रखते हैं कि अगर इंटरव्यू करने वाला कोई असहज सवाल करे तो उसे टोक दें। रोक दें। कई बार सीधी धमकी दी जाती है कि आगे से बात नहीं की जाएगी। आपका फोन नहीं उठाया जाएगा।
बीते दो दशक में आई पीढ़ी के बॉलीवुड एक्टर जैसे-जैसे सफल हुए, खुद को उन्होंने एक निजी कोठरी में बंद किया है। जहां सिर्फ उनकी रोशनी होती है, उनका अंधेरा होता है। इसी में वे अपने कला-कौशल को नित्यकर्म की तरह निपटाते हैं। नतीजा यह कि ये एक्टर जीवन के अनुभव खो रहे हैं और उनके अभिनय में विविधता नहीं दिखती। वे हर माहौल, हर किरदार में एक जैसे होते हैं। अनुभव के मामले में यही स्थिति निर्देशकों की है। कारपोरेट के साथ आई धन की बाढ़ ने हिंदी ‘फिल्म’ को ‘प्रोजेक्ट’ बना दिया है। ऐसे में अभूतपूर्व धन की उपलब्धता के बावजूद हिंदी सिनेमा गरीब बन गया है। नई सदी के साथ आए हिंदी सिनेमा में आए कारपोरेट-काल को देखें, तो महसूस होगा कि यह ‘सिनेमा का शून्यकाल’ है। ज्यादातर सस्ते और हल्के सिनेमा का समय। जो लगभग निरर्थक और मूल्यहीन है। जिसमें उल्लेखनीय कुछ खास नहीं। इस दौरान अधिकतर कच्चे और नकली एक्टर-डायरेक्टर आए। जिनकी आंखें पैसों की चमक से चौंधियाई हुई हैं। जिनकी फिल्में समाज से संवाद नहीं बनातीं। जिनकी कला ने जनता या समाज की कोई बड़ी बात नहीं की। ये सितारे किसी फिल्म-कलाकृति से ज्यादा विज्ञापन फिल्मों और सोशल मीडिया की पेड-पोस्ट में दिखने को आतुर रहते हैं। ये लोगों को अपने विज्ञापित उत्पादों को बेचने में अधिक इच्छुक हैं। फिर चाहे वह तेल, साबुन, कोल्ड ड्रिंक, कोल्ड क्रीम, सन क्रीम या किसी बैंक अथवा इंश्योरेंस कंपनी की कोई पॉलिसी हो।
दो दशक से अधिक के इस लंबे कारपोरेट कालखंड में दो ही ऐसी फिल्में निकल कर आती हैं, जिन्होंने अपने बड़े फलक से विशाल जन-मानस के हृदय में जगह बनाई और उनके कथ्य पर लोग आंदोलित हुए। जिन फिल्मों ने लोगों के विचारों में पैठ की। संयोग यह कि दोनों फिल्में साल 2006 में आईं। निर्देशक राकेश ओम प्रकाश की रंग दे बसंती (आमिर खान, सिद्धार्थ, आर.माधवन, शरमन जोशी, अतुल कुलकर्णी, एलिस पैटेन और सोहा अली खान) और निर्देशक राजू हिरानी की लगे रहो मुन्नाभाई (संजय दत्त, अरशद वारसी और विद्या बालन)। रोचक तथ्य है कि इन दोनों फिल्मों की जड़े भारत के इतिहास में हैं। ये फिल्में इतिहास में जाकर भविष्य की राह ढूंढने की सकारात्मक कोशिश करती हैं। इनमें अपने समस्याग्रस्त वर्तमान के लिए कोई किसी ऐतिहासिक नायक पर अंगुली नहीं उठाता, दूसरे को दोष या गाली नहीं देता। एक फिल्म चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के दिखाए रास्ते से परिवर्तन की बात करती है तो दूसरी आज भी महात्मा गांधी की प्रासंगिकता को प्रमाणित करती है। दोनों फिल्में स्वतःस्फूर्त हैं, इनमें कहीं आपको एजेंडे या प्रोपेगंडे की बू नहीं आती। ये किसी तरह की विज्ञापन फिल्में नहीं हैं। हिंदी का दर्शक इन दोनों फिल्मों को बड़े पैमाने पर स्वीकारता और कामयाब बनाता है। हिंदी सिनेमा में यह खुशबू फिलहाल गायब है और प्लास्टिक के फूलों पर कृत्रिम फ्रेगरेंस से मंडप को चमकदार-सुगंधित बताने का भ्रम पैदा किया जा रहा है।
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बीते कुछ वर्षों के फिल्मी कार्यक्रमों में यह आम दृश्य रहा है कि शाहरुख खान, अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम जैसा सितारा किसी पत्रकार से ‘तू-तड़ाक’ से बात करे। फिल्मी मूड में बोलें तो मीडिया का जब सम्मान ही नहीं रहा तो अपमान कैसा! हिंदी फिल्म पत्रकारिता के लिए मान लिया जाता है कि किसी तैयारी की जरूरत नहीं। फिल्म समीक्षाओं के लिए भी किसी तरह की पढ़ाई-लिखाई-ज्ञान जरूरी नहीं लगता और यही वजह है कि मीडिया तथा सोशल मीडिया में ‘क्रिटिक्स’ की बाढ़ है। हर दौर में यह होता रहा है कि पत्रम-पुष्मम से कुछ ‘अच्छी’ समीक्षाएं भी लिखवाई जाती हैं। लेकिन इधर यह चलन बढ़ गया है। रिलीज के बाद फिल्म का नए सिरे से पोस्टर तैयार होता है, जिसमें बताया जाता है कि किस रिव्यूअर या मीडिया हाउस ने कितने स्टार दिए हैं या कोई बढ़िया वन लाइनर। इससे पहले फिल्म के साथ उसके पोस्टर-ट्रेलर पर अच्छे कमेंट ट्वीट करने, फेसबुक पोस्ट लिखने और पॉजिटिव यू-ट्यूब वीडियो के लिए भी ‘इनफ्लूएंसर’ को पारितोषक दिया जाता है। कारपोरेट निर्माताओं को तो इस खर्च से कोई आर्थिक दबाव महसूस नहीं होता परंतु स्वतंत्र निर्माता और छोटे फिल्मकार इसमें पिस गए हैं। मीडिया इनकी फिल्मों पर कुछ लिखने-दिखाने की जहमत नहीं उठाता।
सच यही है कि सिनेमा-कारपोरेट्स ने अपने उदय के बाद से अभी तक कोई सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभाई है। जिन दर्शकों की जेब से वे पैसा खींचते हैं, उनके लिए सोचना दूर, जिस सिनेमा में इनकी जड़े हैं उसके भविष्य या बेहतरी के लिए भी इन्होंने कोई निवेश नहीं किया। सिनेमा से हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये की कमाई करने वाले किसी कारपोरेट ने ऐसा कोई फंड अलग से नहीं रखा या अपने यहां कोई ऐसा विभाग नहीं बनाया, जो छोटे बजट की फिल्मों को संरक्षण दे। नए लोगों द्वारा बनाए कंटेंट सिनेमा को किसी तरह की आर्थिक सहायता या अन्य तकनीकी-मार्केटिंग सहयोग दे। उन्होंने सिनेमा के विकास के लिए नहीं सोचा। इस दौर में सत्ता ने जैसे अपनों के बड़े-बड़े कर्ज माफ किए, वैसे ही सिनेमा के कारपोरेट घरानों ने अपने-अपनों को ही रेवड़ियां बांटी। आस-पास सिर्फ वाहवाही करने वाले रखे। उन्होंने समाज से सिर्फ लिया, बदले में कुछ नहीं दिया।
इस दौर के बड़े मेकर्स और एक्टरों को आलोचना पसंद नहीं है। वे खुद को कला का भगवान समझते हैं। सच कहने-लिखने वालों से उन्हें नफरत होती है। यह नफरत इस कदर बढ़ चुकी है कि पिछले दिनों निर्देशक आर.बाल्कि ने फिल्म बनाई, चुपः रिवेंज ऑफ द आर्टिस्ट। उन्हें कहानी की प्रेरणा इस बात से मिली कि उनकी एक फिल्म की किसी समीक्षक ने बुराई की थी। चुपः रिवेंज ऑफ द आर्टिस्ट ऐसे सीरियल किलर की कहानी है, जो फिल्म समीक्षकों की हत्याएं कर रहा है क्योंकि उसे लगता है इनकी समीक्षाओं से फिल्में और फिल्मकार तबाह हो जाते हैं। बाल्कि ने अपनी कहानी के लिए गुरुदत्त (1925-1964) जैसे महान फिल्मकार की आड़ ली। 1959 में कागज के फूल बनाने के बाद गुरुदत्त ने फिल्म निर्देशन से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि यह फिल्म उस समय टिकट खिड़की पर फ्लॉप हो गई। बाल्कि ने यह बताने की कोशिश की कि उस फिल्म के फ्लॉप होने की वजह फिल्म समीक्षक थे। यह हास्यास्पद है कि फिल्म समीक्षाओं से कोई फिल्म सिनेमाघरों में चलती या पिटती है। निश्चित ही इन समीक्षाओं का आंशिक या तात्कालिक असर दिखता है, परंतु वह निर्णायक नहीं होता। ऐसे सैकड़ों उदाहरण सिनेमा के इतिहास में हैं, जब समीक्षाओं के रुझान के विपरीत फिल्म का अंतिम नतीजा आया। बाल्कि की फिल्म बॉलीवुड के बड़े मेकर्स की उस खीझ को बताती है, जो सच्ची समीक्षाओं से उनके मन में पैदा होती है। वे बदले की भावना से भर कर समीक्षक को कत्ल कर देना चाहते हैं। आश्चर्य कि ये कत्ल ‘रचनात्मकता को बचाने के लिए’ हैं! मूल बात है वैचारिक असहमति का कत्ल।
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यह ‘नेशन फर्स्ट’ का समय है। जनता सीन से गायब है। देश की तस्वीर दिखाने वाले मीडिया के बड़े हिस्से में आम आदमी लापता हैं। रोटी-कपड़ा-मकान-नौकरी-शिक्षा-स्वास्थ्य की बातें आंकड़ों में लिपटी हैं। आंकड़ों पर बहस आंकड़ों की तरह अंतहीन है। जोधपुर में रहने वाले वरिष्ठ शायर हबीब कैफी के इस शेर में आंकड़ों के आगे जनता की बेबसी रोती हैः आंकड़े हैं आपके सच्चे मगर/रोटियों के हमको लाले पड़ गए। आंकड़ों से जनता का पेट नहीं भरता। जरूरतें पूरी नहीं होती। राहत नहीं मिलती। मगर ‘नेशन फर्स्ट’ के इस समय में नेता सिर्फ जनता की तरक्की और बेहतरी के आंकड़े उगलते हैं। साथ ही वे अपने भाषणों में ऐसी दहकती बातें करते हैं कि लोग आपस में लड़-मरें। कोई किसी पर विश्वास न करे। हाथों में हाथ लेकर साथ न बढ़े।
असहमतियों वाले विचारों को ठिकाने लगाते-लगाते अब नक्सलवाद की बातें, अर्बन नक्सल से होते हुए ‘कलम वाले नक्सलियों’ तक आ गई है। अक्तूबर 2022 में राज्यों के गृहमंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि बंदूक वाले नक्सलियों के साथ-साथ कलम वाले नक्सलियों पर भी कार्रवाई की जरूरत है। कलम वाले नक्सली युवाओं को भ्रमित करते हैं। बात-बात पर पंचायतें सजाने वाले चैनलों-अखबारों में इस बयान पर कोई ‘बहस’ नहीं हुई। इनकी कलम-कैमरे-माइक सिर्फ ‘उनकी जय’ बोल रहे हैं। पढ़ने-लिखने और तर्कशक्ति से इनके संबंध खत्म हो गए हैं। पीएम के इस बयान पर सन्नाटा इसी बात पर मुहर लगाता है। हो सकता है कि प्रेमचंद की तरह अब कोई खुद को ‘कलम का सिपाही’ बताए तो नक्सली करार दिया जाए!
मजे की बात है कि हिंदी फिल्म उद्योग में काम करने वाले ज्यादातर एक्टर-डायरेक्टर हिंदी के नए-पुराने लेखकों को नहीं पढ़ते। परंतु इतना जरूर है कि उन्हें प्रेमचंद पता हैं। किसी से पूछिए कि आपने हिंदी के किस लेखक को पढ़ा है तो कम से कम एक नाम जरूर बताता है, प्रेमचंद! कोई प्यार से ‘प्रेमचंद्र’ भी बोल देता है!! खैर, हिंदी फिल्मों में किसी को प्रेमचंद की आवश्यकता नहीं है। यहां ‘ओरीजनल’ लिखने वाले आखिरी जरूरत होते हैं। नए विचारों से सिर्फ निजाम परेशान नहीं होते, फिल्मवालों को भी इसमें बड़ा ‘रिस्क’ मालूम पड़ता है। कोई विदेशी या रीजनल फिल्म देखकर उसका सीन-दर-सीन रीमेक बनाना या आइडिया चुरा लेना उन्हें अधिक सुरक्षित लगता है। यद्यपि कंटेंट की बातों के बीच जरूर कभी ‘अच्छे राइटरों की जरूरत’ का थोड़ा-बहुत शोर उठता है। लेकिन प्रोडक्शन हाउसों में जो लोग राइटरों के आइडियों पर बात करने बैठते हैं, उनकी योग्यता क्या है! ज्यादातर का साहित्य से छोड़िए, कहानी की दुनिया से भी ढंग का वास्ता नहीं होता। कोई कहानी, कोई किताब उन्होंने कभी लिखी नहीं होती।
फिल्में बनाने वाली कंपनियों में एमबीए के बाद नया चलन आईआईटियंस की भर्ती का है। ये कहानी का हिसाब-किताब परखते हैं। मगर उनका हिंदी भाषी समाज, उसकी भाषा और उनकी कहानियों से संबंध नहीं होता। वे फार्मूलों में फिल्म मार्केट का गणित बैठाते हैं। फिल्म को प्रोजेक्ट की तरह देखते हैं। प्रोजेक्ट में समाज नहीं होता। उसके सुख-दुख नहीं होते। उसके मूल्यों की तस्वीर नहीं होती। प्रोजेक्ट में लगाने-कमाने के आंकड़े होते हैं। नई सदी के इन शुरुआती दो दशकों के फिल्म प्रोजेक्ट्स में विशाल मध्यमवर्ग लगभग गायब है। गरीब तो दूर-दूर तक नहीं दिखते। टाइम्स ऑफ इंडिया की नवंबर 2022 की एक रिपोर्ट बताती है कि देश में आय, बचत और खर्च करने वाला सबसे बड़ा तबका आज मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग का है। पांच लाख से 30 लाख रुपये वार्षिक आय वाला मध्यमवर्ग 31 फीसदी है। सवा लाख से पांच लाख रुपये वार्षिक आय वाले निम्न मध्यमवर्ग तथा गरीबी रेखा के नजदीक रहने वाली आबादी 52 फीसदी है। दोनों मिलाकर हैं, 83 फीसदी। ये लोग मिलकर देश की 75 फीसदी आय अर्जित करते हैं, यानी श्रम करते हैं। देश के आबादी में मात्र चार फीसदी अमीर हैं और ये 23 फीसदी आय अर्जित करते हैं। जबकि बेहद गरीब आबादी 13 फीसदी है, जो मात्र दो फीसदी आय अर्जित करती है। यह आंकड़े 2020-21 के हैं।
आप देखिए कि मध्यम और निम्न-मध्यम आबादी का जो सबसे बड़ा वर्ग (83 फीसदी) है, उसकी कहानियां, उसका जीवन, उसकी हकीकत, उसके सपने, उसके सुख-दुख, उसके उत्सव, उसकी हताशा, उसके हौसले हिंदी के सिनेमा में कहां हैंॽ आज इतनी बड़ी आबादी के लिए सिनेमा नहीं बन रहा तो किसके लिए बन रहा हैॽ हिंदी सिनेमा की कहानियों में बॉलीवुड सितारे सौ में से 99 बार उस चार फीसदी आबादी के वर्ग से आते हैं, जो अमीर है। कैसे बाकी दर्शक उनसे खुद को जोड़ पाएंगेॽ कैसे हिंदी का सिनेमा अपने समय और अपने समाज की बात करेगाॽ पर्दे पर दिखने वाले हमारे नायक के जड़ों से कटे होने की वजह यह भी है कि बॉलीवुड में ज्यादातर बड़ी फिल्म कंपनियां पैतृक हैं। उनके वारिस या वहां बड़े अथवा निर्णायक पदों पर बैठने वाले अंग्रेजीदां हैं। उनके पैर तो इस जमीन पर हैं नहीं, उन्हें सपने भी यूरोप-अमेरिका के आते हैं।
वास्तव में शाहरुख खान के साथ आए एनआरआई सिनेमा के बाद से हिंदी फिल्मों में भारत का समाज धीरे-धीरे हाशिये पर खिसकता चला गया। फिर करीब दो दशक पहले विदेशी कॉरपोरेट स्टूडियोज आने के बाद वह फिल्मों से पूरी तरह गायब हो गया। यद्यपि गलत और जमीन से उखड़ी संवेदनहीन कहानियों के चयन की वजह से ज्यादातर स्टूडियोज पर जल्द ही ताला लग गया और उन्हें बोरिया-बिस्तर समेट कर वापस जाना पड़ा। परंतु उन्होंने सितारा-कलाकारों के मन में सैकड़ों करोड़ रुपये में अनुबंधित किए जाने का जो लालच जगाया, उसने बॉलीवुड में स्वतंत्र निर्माताओं को खत्म कर दिया। ये वही निर्माता थे, जो समाज के अंदर से आते थे। जिन्होंने हिंदी सिनेमा के नायक को गली-मोहल्लों-नुक्कड़ों में जिंदा रखा था। हालांकि इन स्वतंत्र निर्माताओं के साथ बड़े जोखिम और जानलेवा खतरे भी थे। इन्हीं के भेस में आए अंडरवर्ल्ड अपराधियों की छाया से बॉलीवुड को मुक्त होने में लंबा समय लगा। 1970 से 1990 के दशक में बॉलीवुड पर अंडरवर्ल्ड का अच्छा खासा दबदबा था। 1998 में इंडिया टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इंडस्ट्री में करीब 25 फीसदी फिल्में ब्याज पर पैसा देने वालों द्वारा फाइनेंस की जाती हैं। जिनमें ब्याज की वार्षिक दर 36 से 40 फीसदी तक ऊंची होती है। इनके अलावा बाकी 70 फीसदी फिल्मों के निर्माता बिजनेसमैन होते हैं, जिनमें बिल्डर, ज्वैलर, व्यापारी होते हैं। वहीं पांच फीसदी फिल्मों का निर्माण अंडरवर्ल्ड के धन से होता है।
फिल्मों में तमाम अनियमितताएं खत्म करने के लिए सिनेमा को उद्योग का दर्जा देने की मांग लंबे समय से हो रही थी। 1998 में फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) तथा फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के एक कार्यक्रम में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि वह जल्द ही सिनेमा को उद्योग का दर्जा देने का प्रस्ताव संसद में रखने जा रही हैं। उनसे पहले तमाम सरकारों ने यह खोखला वादा किया था। इस घोषणा के बाद तस्वीर बदली और कारपोरेट तथा विदेशी स्टूडियो मुंबई के फिल्म मैदान में उतरने लगे। सरकार फिल्मों को उद्योग का दर्जा देगी, तो कई सुविधाओं के दरवाजे खुलेंगे। कारपोरेट खूब बेहतर जानते हैं कि सरकारी सुविधाओं का लाभ कैसे उठाना चाहिए। बावजूद इसके कारपोरेट और स्टूडियो की बॉलीवुड में एंट्री अच्छी खबर थी।
रिलायंस, महिंदा एंड महिंद्रा, इरॉस इंटरनेशनल, यूटीवी मोशन पिक्चर्स, फॉक्स, डिज्नी, वार्नर ब्रदर्स, सोनी, स्टार नेटवर्क, जी नेटवर्क, बालाजी टेलीफिल्म्स, वायकॉम 18 एक-एक कर आए। इनमें विदेशी और भारतीय टाई-अप भी हुए। इन कंपनियों ने फिल्म मेकिंग का मॉडल बदला। स्क्रिप्ट पर जोर दिया। नगद धन के लेन-देन को चैक में बदला। यह अंदरूनी व्यवस्थागत परिवर्तन थे। लेकिन दूसरी तरफ कुछ और अप्रत्याशित बदलाव हुए। जिनका असर बाहर दिखा। सितारों की फीस आसमान पर पहुंच गई, इनमें से आगे चलकर कई तो फिल्म के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा फीस के रूप में लेने लगे और अंततः स्टार से होते हुए ब्रांड में बदल गए। उधर, सिनेमाहॉल मल्टीप्लेक्सों में बदले। फिल्म देखने के टिकट महंगे हो गए। सिनेमा जाना सिर्फ फिल्म देखना नहीं रहा बल्कि पॉपकॉर्न-समोसे-पैक्ड वाटरबॉटल और कोल्ड ड्रिंक के साथ मिनी पिकनिक में बदल गया। बॉक्स ऑफिस पर पैसा बरसने लगा। स्टूडियो के उभार के दौर में फिल्मों ने कमाई का 100 करोड़ का आंकड़ा छुआ। फिर यह 200 करोड़, 300 करोड़ से होता हुआ 500 करोड़ को पार कर गया। 1000 करोड़ की तरफ बढ़ गया। बॉलीवुड सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गया, जिसे जल्दी से डकारने के चक्कर में कारपोरेट और सितारों ने मिलकर अपने-अपने हिसाब से उसे जिबह करना शुरू कर दिया। बिना सोचे-समझे ‘प्रोजेक्ट’ बनाए। एक-दूसरे के ‘व्यक्तिगत हितों’ का विशेष ध्यान रखा। इन बातों से हुआ यह कि दर्शकों का, उनकी कहानियों का, उनकी दुनिया और उनकी संवेदनाओं का किसी को ध्यान नहीं रहा। मीडिया में विज्ञापन देकर फिल्मों का हौवा खड़ा किया गया, उनकी कमाई को सैकड़ों करोड़ की कमाई की रेस में बदल दिया गया। लेकिन इन सबके बीच कामयाब फिल्मों की संख्या गिरने लगी क्योंकि दर्शकों को ‘प्रोजेक्ट’ और ‘ब्रांड’ की जरूरत नहीं थी। उन्हें चाहिए थी ऐसी फिल्म जो उनका ‘एंटरटेनमेंट’ करे। उनके सुख-दुख-सपनों की बात करे। मगर कहानी, संगीत और संवेदनाएं हिंदी के रुपहले पर्दे से गायब चुकी थी। बेहिसाब धन खर्च करके बनाई फिल्में निष्प्राण थीं। वे किसी भी तरह से टिकट खिड़की पर पैर नहीं जमा पा रही थीं। धीरे-धीरे पैसे का उबाल और चमक-दमक ठंडी पड़ रही था और स्टूडियो कल्चर निरंतर कमजोर हो रहा था, तभी कोरोना आ गया। जो उफान कुछ वक्त लेकर बैठता, कोरोना के दौर में आए ओटीटी की वजह से साल, डेढ़ साल में एक झटके में फुसफुसे झाग के जैसा बैठ गया।
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अब दर्शक बॉलीवुड से अपनी कहानी मांग रहे हैं। ऐसी कहानी जो उनकी जिंदगी से निकली हो। उनके सुख-दुख-सपनों और संघर्ष को दिखाती हो। जो उनके आस-पास का सच उजागर करती हो। उन्हें ऐसा हीरो चाहिए, जो सचमुच उनके बीच का हो या कम से कम नजर तो आए। जो हीरो-हीरोइन सोशल मीडिया में फैन्स को अपना फॉलोअर बता कर, एक-एक पोस्ट डालने के कंपनियों से लाखों रुपये वसूल के अपनी ईएमआई भर रहे थे, वे इस बदलाव से सकते में हैं। सितारों पर धन उड़ाने वाले हिंदी के बड़े हाउसों को चक्कर आ रहे हैं। लेकिन ये फिलहाल मानने को तैयार नहीं दिखते कि सिनेमा की दुनिया एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। जहां अब दर्शक की बादशाहत है। ताज वही रहता है। बस, उसे पहनने वाले सिर बदल जाते हैं।
