हाल ही में कुछ वर्षों से विचारधारा की बात कम की जा रही है। आन्दोलनों को विचारधारा से आवश्यक तौर पर जोड़ा जाता था। मुझे लगता है कि अब विचारधारा में चिन्तन से ज़्यादा जोड़ा जाता है, आन्दोलन से कम। इसका कारण यह कि अब सामाजिक दृश्य पर आन्दोलन कम होते हैं, चिन्तन ज़्यादा होता है। उदाहरण के लिए भारत में ही देखिए तो दलित चिन्तन, स्त्री-चिन्तन तो खूब होता है यानी लिखा-पढ़ा बोला जाता है, किन्तु आन्दोलन कम। अब जुलूस समारोह पहले जैसा बहुत कम होते हैं, पत्रिकाओं में लेख, परिचर्चा आदि जरूर खूब होते हैं। आज देखें तो मालूम पड़ता है कि तीव्र अन्तर्विरोध के बावजूद अम्बेडकर का आन्दोलन स्वाधीनता आन्दोलन का ही एक अंश था, जब नेता के आह्वान पर हजारों की संख्या में लोग नीयत जगह पर भाषण सुनने, लाठी-मार खाने, जेल जाने के लिए इकट्ठा हो जाते थे। हाल ही में किसान आन्दोलन तो हुआ लेकिन उसका विचारधारा का पक्ष उतना उजागर नहीं हुआ।
विचार सकर्मक होते हैं भाव की तीव्रता से। विचार तो आपको बोध कराता है, विचारधारा किसी स्थिति को विचार एवं सन्दर्भ या व्यवस्था में समझ देती है। समझ स्तब्ध होकर नििष्क्रय भी बनी रह सकती है। विचार राह दिखाने या काम कर सकता है भाव की तीव्रता से सकर्मक व्यक्ति या समूह के सक्रिय होने पर। विचार जानकारी देता है, राह को संकेत करता है, वह सन्तुलित करता है, भाव विचलित करके, सक्रिय बना देता है। हिन्दी में एक शब्द आजकल बहुत प्रचलित है—भावबोध। ज़्यादातर इसका प्रयोग अँग्रेज़ी के शब्द ‘सेंसीबिलिटी’ के अर्थ में किया जाता है। वस्तुत: भावबोध दो शब्दों—भाव और बोध का संयोग है। भाव और बोध एक-दूसरे के समानार्थक या पर्याय नहीं। भाव विचलित करता है, बोध जानकारी देता है। जरूरी नहीं कि बोध संघर्ष करने का भी काम करे। वह एकेडेमिक रहकर ही अपना काम पूरा कर सकता है।
मध्यवर्ग विचार और चिन्तन करने में बहुत रुचि लेता है। निम्न वर्ग चिन्तन या वैचारिकी में ज़्यादा रुचि नहीं ले सकता। उसके पास इतना अवकाश नहीं होता। लेकिन उसके पास भाव राशि कम नहीं होती। वह अपनी भावनाओं को दबा कर रखने का अभ्यास करता रहे, यह अलग बात है। मध्य वर्ग का चिन्तन या विचारधारा उसकी भावनाओं को सामूहिक तौर पर तीव्र कर देते हैं। वह आन्दोलन में प्रवृत्त हो सकता है, जाता है। इसीलिए आन्दोलनों में जनसंख्या निम्न वर्ग के लोगों की ज़्यादा होती है, अनुयायी निम्नवर्ग के होते हैं और नेता मध्य वर्ग के।
समाजवाद को मध्यवर्ग भी मान्यता देता है बोध के धरातल पर। वह भी मानता है कि आर्थिक उन्नति के अवसर समान होने चाहिए। यह बात तो उच्च वर्ग के भी अनेक व्यक्ति मान लेते हैं किन्तु इस विचारधारा के प्रति भावात्मक लगाव निम्न वर्ग का कहीं ज़्यादा हाेता है बोध होने पर। क्योंकि उसकी अभावग्रस्त स्थिति, उसकी गरीबी, मोहताजी उसकी स्थिति में वास्तविक परिवर्तन का स्वरूप दिखलाई पड़ता है समाजवादी विचारधारा में। यही बात दलित स्त्री और किन्नर चिन्तन और विचारधारा में भी लागू होती है। दलित के लिए दलित विचारधारा जमीनी हक़ीक़त है केवल दिमागी खैर नहीं, स्त्री के लिए स्त्री चिन्तन या आन्दोलन उसके जीवन में मुक्ति का सन्देश है केवल विचार या बोध नहीं। और िफर विचारधारा और भाव के क्षेत्र में बनी िस्थति या प्रभाव भी अपनी-अपनी वर्गीय स्थिति के अनुसार पड़ता है। स्त्री मुक्ति का आन्दोलन मध्यवर्ग, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग की स्थितियों के लिए समाज प्रेरणा नहीं देता।
सोवियत संघ का विघटन होने के बाद मार्क्सवाद का जनान्दोलन रूप ढीला पड़ गया है। साेवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता कम्युनिस्ट विचारधारा और आन्दोलन का साक्षात् रूप था। उसके ढह जाने का प्रभाव विचारधारा की दृढ़ता पर भी पड़ा लेकिन बहुत गहरा प्रभाव जनान्दोलन पर पड़ा। विचारधारा की अचूकता और अपराजेयता पर पड़ा। समाजवादी सत्ता की निरंकुशता, भ्रष्टाचार, व्यक्ति पूजा की बात पहले भी होती थी किन्तु इन सभी आरोपों का उत्तर था पूँजीवादी सत्ता के प्रतीक अमरीका की प्रतियोगिता में। मार्क्सवादी विचारधारा की शक्ति सत्ता का प्रतीक सोवियत संघ। कहने को हम कहते रहे कि सत्ता जाने से विचार नहीं समाप्त होता। विचार समाप्त नहीं होता। किन्तु शक्ति उसकी भी चली जाती है। आखिरकार सोवियत संघ मार्क्सवादी विचारधारा का प्रथम वास्तविक दिखलाई पड़नेवाला निर्माण था।
विचारधारा—विचार-व्यवस्था है लेकिन उसका प्रचार-प्रसार या आन्दोलनात्मक रूप ऐतिहासिक स्थितियों से जुड़ा होता है। अस्तित्ववाद का वैचारिक प्रवर्तन तो किर्मेगई ने ही कर दिया था किन्तु बहुवैचािरक कुछ लोगों के अनुसार दार्शनिक आन्दोलन भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बना। उसके प्रचार-प्रसार का गहरा सम्बन्ध फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों की गहरी निराशा से है—हिटलर की निरंकुश बमबारी को देखकर सार्त्र कहते थे कि हमें यह जानकर राहत मिलती है कि हम सब मरणधर्मा हैं। ऐसा विश्वास भारत में नहीं हुआ इसलिए अस्तित्ववाद भारत में बुद्धिजीवियों और कलाकारों के बीच ही वह भी आंशिक रूप से बहुत कुछ फैशन के रूप में दिखलाई पड़ा। हिन्दी साहित्य में अस्तित्ववाद की विसंगति, अनिश्चय अभावग्रस्त जीवन में ज़्यादा प्रभावी ढंग से दिखाई पड़ती है। वह कबीर, तुलसी, गालिब, निराला, मुक्तिबोध के यहाँ अपने रूपों में दिखाई पड़ती है। हिन्दी साहित्य का अस्तित्ववादी उपयोग तो प्रतिरोधात्मक और व्यंग्यात्मक होकर प्रगतिशील आन्दोलन का ही एक आयाम है और अज्ञेय के ‘अपने-अपने अजनबी’ से ज़्यादा प्रभावशाली है।
सोवियत संघ के विघटन ने कम-से-कम भारत में समाजवादी आन्दोलन को नुकसान पहुँचाया। राजनीतिक, वैचारिक सहायता के साथ-साथ प्रेरणा का स्रोत भी जैसे क्षीण हो गया। उत्तर आधुनिकता प्रचार-प्रसार बढ़ने का बहुत बड़ा कारण समाजवादी आन्दोलन का ढीला पड़ना है जिसका मुख्य कारण मेरे विचार से सोवियत संघ का विघटन है। चीन और सोवियत संघ के परस्पर विरोध ने इस क्षीणता को क्षीणतर किया है।
उत्तर आधुनिकता प्रारम्भिक और आंशिक रूप से मोहभंग की विचारधारा ही सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि उत्तर आधुनिकता पूरी तरह नकारात्मक विचारधारा नहीं, उसके अनेक संकल्प सकारात्मक हैं। विचारधाराएँ स्वप्निल संकल्प लेकर आती हैं। वे मनुष्य के संकटों, अभावों से मुक्त करने की प्रतिज्ञा करती है। कुछ समय तक लगता है कि वे ऐसा कर भी रही हैं लेकिन अन्ततोगत्वा वे खुद अपनी व्यवस्था और अपनी नियमावली का ही शिकार हो जाती हैं। उदार-से-उदार निस्स्वार्थ-से-निस्स्वार्थ व्यक्ति की भाँति विचारधाराएँ भी लागू होने पर प्रतिबिम्ब बन जाती हैं। उनकी शक्ति और सत्ता उनकी प्रतिज्ञाओं को अोझल कर देती है। सत्ता और शक्ति के संघर्ष में न्याय और आदर्श की अनदेखी हो जाती है। न्याय और अन्याय का भेद मिट जाता है। जिन विचारधाराओं के लिए लोग शहीद होते हैं िफर उन्हीं के विरुद्ध न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अतएव विचारधाराओं के संकल्पों और प्रतिज्ञाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हमें सदैव सतर्क और प्रतिज्ञाओं पर संशय करते रहना चाहिए।
उत्तर आधुनिकता चूँकि विचारधाराओं पर अविश्वास करता है इसलिए वह पुरुषवादी प्रतिज्ञाओं, पूँजीवादी प्रतिष्ठानों पर भी अविश्वास करता है। वह समलैंगिक, किन्नर की मुक्ति—उत्कर्ष और सम्मान देने की प्रेरणा देता है। जिन लोगों की आवाज़ अब तक नहीं सुनी गई है उत्तर आधुनिकता उनके साथ खड़ी होती है।
हमारे समय में दलित, स्त्री, समलैंगिक समाजवादी आदि अनेक विचारधारात्मक आन्दोलन हैं। उन सबका पक्ष ही, उनके सरोकार हैं।
इन्हें सकर्मक जनान्दोलन के रूप में एकत्र होकर क्या ऐतिहासिक बदलाव के रूप में काम करने की जरूरत या सम्भावना है। यथास्थिति को बदल न पाने की स्थिति में ये केवल विचार वैचारिक या एकेडमिक बनकर रह जाएगी। तब ये यथास्थितिवादी बनकर रह जाएगी। केवल अस्मिताओं के रूप बनकर जाएँगी। इसलिए जरूरत अन्तस्सम्बन्धता या उस इंटर कनेक्टिवीटी की है जो इनका संयोजन करके इतिहास की सामरिक शक्ति बने। विभिन्न अस्मिताओं का आग्रह स्वतंत्र मानसिकता का आग्रह है। किन्तु अस्मिताओं को एक दूसरे की पहचान और उनका समादर जरूरी है। वे एक दूसरे का विरोध ही न करें और एक दूसरे को समझें ओर समन्वय भी करें।
हमारे समय के तथाकथित ‘विकास’ का साधन तकनीक है। तकनीक खुद विज्ञान नहीं, वह जानकारियों का उपयोग या दुरुपयोग है। दिक्कत यह है कि ज्ञान का तकनीकी उपयोग बाजार के जरिए शोषण का बहुत बड़ा साधन बन रहा है। ऐसी स्थिति में ज्ञान-विज्ञान-मानवता विरोधी भी हो जाता है और आज सबसे बड़ा खतरा पर्यावरण को हो गया है। अगर ज्ञान खुद बाजार बनकर हमारे पंच महाग्रहों—आकाश,, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी के लिए संकट बन गया है तो हमें इस विकास के बारे में सोचना चाहिए। कबीरदास ने कहा था हमें ऐसा व्यापार नहीं करना चाहिए जिसमें ब्याज बढ़ता जाए और मूलधन घटना जाए।
ऐसे बनिज सो कौन काम
जेहि घेरे मूल नित बढ़े ब्याज।
पर्यावरण का संकट प्राणियों के अस्तित्व के संकट का मुद्दा है। विचारधाराओं में सहमति-असहमति होती है, होनी चाहिए। जीवन के रहने या न रहने पर सहमति ही होगी तभी हम विचारधाराओं पर भी बात करने के लिए बचे रहेंगे।
