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सम्पादकीय : कविता के क्षितिज –  कृष्ण किशोर

लिखी जाने से पहले, पढ़ी जाने से पहले, अपनी अनंतता में बहती हुई कविता हमेशा से थी, वातावरण में ही थी। उस वातावरण में जिस ने भी प्रवेश किया, वह भीतर ही भीतर कवितामय हो गया। न भाषा, न विषय, न वस्तु। बस एक वातावरण और एक लय। भाषा, शब्द इत्यादि सब बाद की बनावटे हैं। केवल अर्थ- जो गूंजता है भीतर, सुनाई देता है सिर्फ स्वयं को।

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विचारधारा मुक्त विचार की शक्ति – मृदुला गर्ग

मनुष्य एक विचारशील जीव है। पशु और मनुष्य में यही अंतर है कि पशु सब काम अंत:प्रज्ञा से करते हैं। जबकि मनुष्य हर प्रश्न को भावात्मक और वैचारिक दोनो नज़रियों से देख परख कर  निर्णय लेने की सामर्थ्य रखता है। यही उसे पशु से अलग जीव बनाता है। ऐसा नहीं है की वह अंत: प्रज्ञा से काम करता ही नहीं। करता है। सतत विचार करने के अभ्यास से ही यह सहज प्रवृत्ति विकसित हो जाती है और कई काम हम इतनी सहज वृत्ति से करते हैं कि अनायास होते जाते हैं

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अनेकधारा* : भाषागत विविधिता – रमाकान्त अग्निहोत्री

चाहे भाषागत व सांस्कृतिक विविधिता हो या फिर एकता, भारत को लेकर दोनों ही सबको  एक अचम्भे में डाल देती हैं. इतना विशाल देश और इतनी विविधिता पर फिर भी, किसी भी मोड़ पर, कहीं भी सम्प्रेषण टूटता नहीं. आप कन्या कुमारी से कश्मीर या गुजरात से आसाम चले जाइए, आप ट्रेन में हों या किसी धार्मिक मेले में, सम्प्रेषण नहीं रुकता. वास्तव में कहा तो यह जाता है कि हमारी विविधिता ही हमारे सम्प्रेषण का राज़ है.

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रघुवंश (कालिदास) – चौदहवें सर्ग के कुछ अंश : अनुवाद- राजकुमार

सीता का रोना सुनकर 
मोरों ने नाचना छोड़ दिया
पेड़ों ने फूल गिरा दिये
घास खा रही हरिणियों ने
अपने मुह की घास गिरा दी
सीतासम दुःख व्याप गया वन में
विलपने लगा वन ।

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विचारधारा, एकअपर्याप्त टिप्पणी – विश्वनाथ त्रिपाठी

हाल ही में कुछ वर्षों से विचारधारा की बात कम की जा रही है। आन्दोलनों को विचारधारा से आवश्यक तौर पर जोड़ा जाता था। मुझे लगता है कि अब विचारधारा में चिन्तन से ज़्यादा जोड़ा जाता है, आन्दोलन से कम। इसका कारण यह कि अब सामाजिक दृश्य पर आन्दोलन कम होते हैं, चिन्तन ज़्यादा होता है। उदाहरण के लिए भारत में ही देखिए तो दलित चिन्तन, स्त्री-चिन्तन तो खूब होता है यानी लिखा-पढ़ा बोला जाता है, किन्तु आन्दोलन कम। अब जुलूस समारोह पहले जैसा बहुत कम होते हैं, पत्रिकाओं में लेख, परिचर्चा आदि जरूर खूब होते हैं।

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स्वायत्तता या मूल्य हीनता से आगे का रास्ता – सुखजोत

विश्व युद्ध के दौरान बच्चों से भरा एक विमान प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरते हुए एक निर्जन और बीहड़ द्वीप पर दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। छह से बारह वर्ष की उम्र के सब बच्चे, किसी भी तरह की  रोकटोक से मुक्त, नाते रिश्तों से मुक्त, किसी भी तरह के नियम, व्यवस्था या क़ानून से मुक्त, केवल अपनी इच्छा से कुछ भी, कभी भी करने को स्वतंत्र हो जाते हैं। एक अकल्पनीय, पूर्ण आज़ादी - जो किसी भी जीव की एकमात्र चाह है। एक स्वायत् शासन - कोई नियम-मर्यादा नहीं। जहां किसी को किसी का कोई डर नहीं। जहां कोई बड़ा-छोटा नहीं।

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पंडित जी – एक संस्मरण – विभूति नारायण राय

दीपावली कहना हमेशा मुश्किल सा लगता है । दीवाली ज़्यादा सहज स्वाभाविक ढंग से बोलचाल मे निकलता है । इस दीवाली पर न जाने क्यों इंटरमीडिएट के अपने संस्कृत अध्यापक पंडित जयानन्द मिश्रा याद आ रहें हैं । उम्र के इस पड़ाव पर स्मृतियों का क्या ? आगे पीछे दौड़तीं हैं । पिछली दीवाली की चीजें धुँधली हैं पर अचानक पचास वर्ष पूर्व कालिदास के रघुवंशम को रस ले कर पढ़ाते हुये अपने अध्यापक का चेहरा पानी मे आधा डूबता आधा उतराता सा दीखता है ।

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संसार मे प्रजातंत्र : अपेक्षायें और उपेक्षायें – विभूति नारायण राय

लोकतंत्र मनुष्य के सभ्य होते जाने की गाथा है। यह एक बेहद लम्बी और तवील यात्रा है जो भिन्न भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भो मे मानव प्रजाति ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से तय की है। यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस यात्रा मे इतने उतार चढ़ाव आये हैं कि कई बार फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि हम आगे बढ़े हैं या पीछे? आदिम साम्यवाद और कबीलाई यथार्थ या यूटोपिया जैसे काल्पनिक आदर्शों से गुजरती मनुष्यता की यह यात्रा संस्थाबद्ध धर्म, व्यक्तिगत संपत्ति, परिवार और राज्य के निर्माण की साक्षी बनी।

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