मेरे मन में एक गीत अपने को गाता और दोहराता रहता है- एक राह तो वो होगी….। मेरे पहले कविता संग्रह में एक कविता है, ” में तारों का एक घर”. इसमें एक कल्पना है जो यथार्थ की तरह पेश की गई है। यहां एक स्त्री खुद को तारों का एक घर समझती है जिसमें कितने ही तारे उतरते हैं, लगभग हर रात। ऐसा होने से बहुत सारा प्रकाश कहीं और चला जाता है, और ढेर सारी ऊष्मा भी। तारे स्त्री की देह में खुद को विलयित करने आते हैं, मनुष्यों की तरह अपनी देह छोड़ने। यहां पर चीज़ों के बदलने की सूक्ष्म प्रक्रिया का पता चलता है। एक यूटोपीया का भी जन्म कुछ इसी तरह मनुष्य की कल्पना में होता है। जब आप जीवन की विषमता से ऊब जाते हैं, जब आपको लगने लगता है कि नया जीवन रचा जाना चाहिए क्योंकि आप रात को, उसकी हवा को अपनी आत्मा में उतरना चाहते हैं, खुशी को महसूस करना चाहते हैं, तो और क्या करेंगे। लोगों ने क्रांतियां की हैं, नया समाज बनाया भी है। बहुतों के लिए समय बदला भी है। लेकिन स्त्रियों का जीवन अपनी दासता में बना ही रहा है। स्त्री इसलिए अभी भी एक उटोपिया गढ़ती है, उसे अपने मन मस्तिष्क में संवारती भी है –अपने लेखन में उसे उतरती है। लिखना उसके लिए मुक्ति के द्वार तक जानें और उसे खोलने जैसा है। उसने रात के दरवाजे को खोज लिया है। वह बाहर निकल भी जाएगी, ऐसा लगता रहता है। आज गेल ओमवेट को पढ़ते हुए कुछ ऐसा ही लगा। एक नए स्वप्न जगत का पता चला। इस टिप्पणी में आज उसकी ही बात करते हैं। मैने हमेशा कहा है कि भारतीय समाज में स्त्री और दलित एक ही खित्ते में ठहराए गए लोग हैं, उनका आपस में एक साम्य है। एक सौहार्द भी इसलिए होना चाहिए उनके बीच।
स्त्रियाँ पितृसत्ता में जीते-जीते थक गई हैं। मैं हमेशा अपने भीतर-बाहर समय से पूछती रहती हूँ—कब वह समय आएगा जब हम सब प्रेम और सहानुभूति के साथ जी सकेंगे। कब पुरुष अपनी पितृसत्तात्मक सोच से बाहर निकलकर ऐसी सत्ता स्त्रियों के साथ बनाएँगे जिसमें सचमुच अमन-चैन हो। इतनी हिंसा, इतना अत्याचार न हो। मुनाफ़ाखोरी तो एकदम न हो। किसी के भी श्रम का शोषण कोई न करे। श्रम हो तो सबके उत्थान के लिए। उत्पादन की एक ऐसी व्यवस्था हो जिससे सबके लिए श्रम करना जरूरी हो और जिसमें सबके लिए आराम-चैन भी हो।
हाल ही में ओम्वेट की किताब ‘सीकिंग बेगमपुरा : द सोशल विजन ऑफ ऐंटी कास्ट इंटेलेक्चुअल्स’ पढ़ रही थी। यह रैदास की एक कविता ‘बेगमपुर’ की यूटोपियन कल्पना पर आधारित किताब है जिसमें ब्राह्मणवादी वर्ण-व्यवस्था के ख़िलाफ़ या बरक्स एक दूसरी समतावादी व्यवस्था की ज़रूरत पर जोर दिया गया है। उस व्यवस्था में सब लोग साथ-साथ बतिया रहे हैं, खा रहे हैं, नृत्य कर रहे हैं—एक ऐसी खुशी का अनुभव कर रहे हैं जो असमान वर्ण-व्यवस्था वाले समाज में सम्भव नहीं हो पाती। जातियों में बँटे लोग प्रसन्नता की जगह दुख पैदा कर रहे हैं एक दूसरे के लिए। यहाँ ईश्वर भी इस व्यथापूर्ण व्यवस्था का जनक दिखाया गया है। जबकि ईश्वर आनन्द का स्रोत होना चाहिए। यह वर्ण व्यवस्था किस तरह आधुनिक भारत में भी कायम रहती आई है इसकी यह एक ऐतिहािसक कथा है। एक तो पूँजीवादी व्यवस्था जो आधुनिकता के साथ आई, वह भी अपने आप में वर्ग विषमता पर आधािरत थी। असमानता इसके शोषण तंत्र की नींव में है—लेकिन भारत में आकर यह वर्ग असमानता जाति और लैंगिक असमानता से मिल गई। इस कारण हमारा स्वतंत्र आधुनिक भारत तीन तरह की स्पष्ट असमानताओं का नया घर बन गया—जाति, वर्ग और लैंगिक असमानता। और अब यह असमानता हमारे भारतीय समाज की जड़ में स्थापित है।
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि एक तरफ जबकि यह शोषण तेज गति से चलता रहा और बना रहा, तो दूसरी ओर तमाम ऐसी जातियों के लोग जिन्हें दलित कहा गया, और स्त्रियाँ जिन्हें हमेशा हर जाति में पुरुषों के अधीन माना गया, इस नए पूँजीवादी ब्राह्मणवादी आधुनिकता के भीतर से बाहर की एक नई दुनिया बनाने का स्वप्न देखने लगे—एक नई कल्पना को जन्म देने का उपक्रम करने लगे। नामदेव से लेकर जोतिबा फूले जिनके बीच रैदास, जाना बा ई, कबीर और पंडिता रमाबाई, सावित्री बाई फूले आते हैं—सब तुकाराम की तरह एक दूसरा पंढरपूर चाहने लगे। गेल अपनी किताब ‘सीकिंग बेगमपुरा’ में कहती हैं कि संस्कृत भाषा में किसी यूटोपिया की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि उनकी चेतना में वर्णाश्रम व्यवस्था ही कल्पना की अन्तिम सीढ़ी या पड़ाव जान पड़ता है— यहां के सर्वोच्च जाति के लोग ही सबसे पवित्र मनुष्य हैं जो यज्ञ करते हैं, पशुओं की बलि देते हैं, पूजा करते हैं और ईश्वर से वार्तालाप करते हैं। अपने धर्मग्रन्थ में इसी व्यवस्था की स्थापना करते हैं। यानी वर्णाश्रम व्यवस्था की। दूसरी तरफ स्त्रियाँ भी एक कल्पना करती हैं, इस असमान पितृसत्तात्मक व्यवस्था से पार जाने की। उनके पास भी एक कल्पना है, उन्हें भी एक यूटोपिया की दरकार है, इसलिए पंडिता रमाबाई से लेकर सावित्री बाई फुले या फिर बेगम रुकय्या(Begam Rookeya) के मन-मस्तिष्क में एक दूसरी, ज्यादा समान और क्रिएटिव व्यवस्था का स्वप्न बार-बार उभर कर सामने आता है। इसे हम स्त्रीवादी समाज की ऐसी कल्पना मान सकते हैं जो समतावादी-समाजवादी व्यवस्था है। आधुनिकता की यह एक वैकल्पिक कल्पना, जिसमें समानता, स्वतंत्रता एवं न्याय अपने मूल्यों को सही अर्थों में आत्मसात का पाएँगे।
यहाँ बेगम रुकय्या की कहानी ‘सुल्ताना का स्वप्न’ का जिक्र करना चाहती हूँ। सावित्रीबाई फुले की ही तरह, उनकी कल्पना में खूब ठीक से पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ हैं जो सिर्फ शिक्षा की सार्वभौमिकता पर ही जोर नहीं देती, बल्कि सत्ता में भागीदारी को भी अपना विषय बनाती हैं—कैसे स्त्रियों का समाज एक वैज्ञानिक समाज होगा जिसमें उत्पादन की व्यवस्था विज्ञान के उन्नत सिद्धान्तों पर आधारित होगी। यहाँ स्त्रियों की सारी क्षमताओं का सही उपयोग होगा जिस वजह से यह समाज हर तरह से सम्पन्न होगा। पुरुषों के अधीन स्त्रियाँ समाज के विकास में कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं कर पातीं, उन्हें सबसे कम क्रिएटिव कामों में झोंक दिया जाता है, जैसे घरेलू काम। बच्चों का भी सही विकास इसीलिए नहीं हो पाता। पितृसत्ता अपने बच्चों की अधिकाधिक जिम्मेदारी सदा घरेलू कामों में लगी स्त्रियों पर लाद देती है, लालन-पालन के नाम पर। ये स्त्रियाँ उतनी उन्नत नहीं बन पातीं कि अपने बच्चों के भविष्य के बारे में क्रान्तिकारी ढंग से सोच सकें। बेगम रुकइया अपनी कहानी (उपन्यास) में बार-बार आग्रह करती हैं कि बाहर की दुनिया स्त्रियों के लिए भी होनी चाहिए, बल्कि बाहर-भीतर का फर्क भी रखना ही है तो पुरुषों को भीतर रहना चाहिए। वे भी सब काम करें जैसे स्त्रियाँ सारे काम करना चाहती हैं।
इस यूटोपिया में जो एक बात बहुत महत्त्वपूर्ण है वह है समाज और उत्पादन व्यवस्था का प्रकृति के साथ सम्बन्ध। स्त्रियों के इस शहर या देश में बहुत ही सुन्दर बाग-बागवान होंगे। प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में मनुष्य के जीवन में शामिल होगी। उसका सौन्दर्य किसी भी तरह से नष्ट नहीं किया जाएगा। स्त्रीवाद की पर्यावरणवादी दृष्टि को यह यूटोपिया पुष्ट करता है। एक तरह से यह कहानी स्त्री और प्रकृति के बीच जो एक अटूट, अभिन्न सम्बन्ध है, जिसे पितृसत्तात्मक पूँजीवादी व्यवस्था ने तहस-नहस कर दिया, उसका भी एक स्वीकार है। स्त्री प्रकृति के बिना अकेली हो जाती है, उसका अकेलापन, उसकी स्वाधीनता की तस्वीर को धुँधला कर देती है। स्त्री का प्रकृति के साथ संगिनी का जो रिश्ता है उसे भग्न करके ही पुरुष उसे अपनी संगिनी बनाता है लेकिन उसे अपने अधीन करने के बाद। कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री के लिए प्रकृति का अक्षुण्ण रहना उतना ही आवश्यक है जितना उसका अपना जीवित रहना। ‘सुल्ताना का स्वप्न’ स्त्री जाति का एक ऐसा ही यूटोपिया है जिसे अब सब सराहते हैं, यानी प्रकृति के स्वराज्य को। इसे शोषणमुक्त करने से न सिर्फ र्पूँजीवाद ध्वस्त होगा, स्त्रियाँ भी स्वतंत्र होंगी और नए समाज को बनाने में हस्तक्षेप कर सकेंगी।
अन्तिम बात जो मैं यहाँ कहना चाहती हूँ कि जब यह यूटोपिया यथार्थ में बदलने की स्थिति में आ जाएगा, या कि आ गया है, तब कौन सी चीज़ है जो अब भी हमें भ्रमित किए हुए है—सत्ता और सम्पति या धन के प्रति पुरुषों के भीतर बसी महत्त्वाकांक्षा या लालच। शायद हमे अब लालच से ही लड़ना है—इसके लिए भी एक कल्पना चाहिए—बिना लालच के मनुष्य अपना जीवन कैसे जिए। थॉमस मोर ने ऐसी ही एक यूटोपिया का खाका सोलहवीं शताब्दी में तैयार किया था अपनी प्रसिद्ध किताब ,” द बेस्ट स्टेट ऑफ ए कॉमनवेल्थ एंड द न्यू आइलैंड ऑफ यूटोपियाई में। इसी संदर्भ में क्रिटिकल सिद्धांतवादी, हरबर्ट मार्क्यूज का भी नाम लेना चाहिए—उन्होंने इस नए यूटोपिया को ‘कंक्रीट यूटोपिया’ कहा है—यानी ऐसी कल्पना जो सम्भव हुए बिना नहीं रह सकती और यह कल्पना सुदूर किसी भविष्य में नहीं, बल्कि हमारे जीवन में सम्भव हो सकेगी। मनुष्य अपने वैसे गुणों को अब साक्षात जीना चाहता है जिसे वे ‘इरोटिक ड्राइव’ कहते हैं—यह एक ऐसा उद्वेलन है मनुष्य के भीतर जो उसे प्रेम करने के साथ-साथ जीवित बचे रहने के लिए भी जरूरी सजगता की तरफ़ हमारा ध्यान खींचता हैं और आगाह भी करता है कि पृथ्वी नष्ट होने को है—यह एक डिस्टोपिया है यानी वह यथार्थ जो हमारा होगा यदि हमने जीवन के सौन्दर्य को नहीं सराहा। इसी सूत्र के सहारे यदि हम अपने नजदिकी भविष्य के बारे में सोचें तो हम कह सकते हैं कि हमारे भीतर का ‘इरोटिक’ संसार जाग रहा है, हम विकल्प की तरफ बढ़ रहे हैं। और यह विकल्प, मारक्यूज भी मानते हैं, अपनें आग्रह और स्वरूप में स्त्रीवादी है। आने वाला समय और समाज स्त्रीवादी समाजवाद होगा। यही यथार्थनुमा यूटोपिया स्त्री-लेखन के केन्द्र में आज है, यही हमारे लेखन की प्राण शक्ति है। यह लेखन यूटोपिया की रचना में लगा हुआ है और इसके यथार्थ में परिणत होने की लालसा से ओत-प्रोत है।
