यदि मान लें कि आधुनिक युग की शुरुआत उन्नीसवीं सदी में हुई तो फिर यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। उन्नीसवीं सदी से पहले हिन्दी साहित्य शिष्ट और लोकसाहित्य से संवाद करते हुए विकसित होता रहा। किन्तु उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक शासन के दौरान शिष्ट और लोक के अतिरिक्त एक अन्य तत्त्व भी जुड़ गया। इसका सम्बन्ध पश्चिमी आधुनिकता से है। उन्नीसवीं सदी में अँग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत के साथ भारतीय प्रबुद्ध वर्ग पश्चिमी आधुनिकता से परिचित हो गया। पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। अँग्रेज़ शासकों ने भी उसे अपनी ज़रूरत के मुताबिक ढालने और अनुशासित करने की भरपूर कोशिश की। उन्नीसवीं सदी में हिन्दी ही नहीं, भारत की किसी भी भाषा में शायद ही कोई ऐसा उल्लेखनीय रचनाकार मिले, जिसे अँग्रेज़ी न आती हो। इस प्रकार हिन्दी की जातीय परम्परा में उन्नीसवीं सदी के दौरान गुणात्मक परिवर्तन आया। बांग्ला नवजागरण के वजन पर डॉ. रामविलास शर्मा ने इसे हिन्दी नवजागरण की संज्ञा दी। वस्तुतः उन्नीसवीं सदी में अपने यहाँ जैसी आधुनिकता आई, उसे हिन्दी की जातीय परम्परा का स्वभाविक विकास करना उचित नहीं प्रतीत होता। उसे औपनिवेशिक आधुनिकता कहना ज़्यादा संगत लगता है। भारतीय भाषाओं और भारतीय भाषाओं में लिखे गए साहित्य का मॉडल अँग्रेज़ी भाषा और अँग्रेज़ी साहित्य बन गया। अँग्रेज़ी भाषा और अँग्रेज़ी साहित्य की इस भूमिका को स्वीकार करने में और किसी को संकोच हुआ हो तो हुआ हो किन्तु सुमित्रानन्दन पन्त को कोई संकोच नहीं हुआ। ‘पल्लव’ की भूमिका में वे लिखते हैं, ‘हिन्दी में सत्समालोचना का बड़ा अभाव है। रसगंगाधार, काव्यादर्श आदि की वीणा के तार पुराने हो गए; वे स्थायी, संचारी, व्यभिचारी आदि भावों से जो कुछ संचार या व्यभिचार करवाना चाहते थे, करवा चुके। जब तक समालोचना का समयानुकूल रूपान्तर न हो, वह विश्वभारती के आधुनिक, विकसित तथा परिष्कृत स्वरों में न अनुवादित हो जाए, तब तक हिन्दी में सत्साहित्य की सृष्टि नहीं हो सकती। बड़े हर्ष की बात है कि अब हिन्दी युनिवर्सिटी की चिरवंचित उच्चतम कक्षाओं में प्रवेश पा गई; वहाँ उसे अपनी बहन अँग्रेज़ी के साथ वार्तालाप तथा हेल-मेल बढ़ाने का अवसर तो मिलेगा ही, उससे घनिष्ठता भी स्थापित हो जाएगी। आशा है विश्वविद्यालय के उत्साही हिन्दी प्रेमी छात्र…हिन्दी में, अँग्रेजी ढंग की समालोचना का प्रचार कर, उसके पथ में प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे।’ ‘अँग्रेज़ी ढंग की समालोचना’ को रामचन्द्र शुक्ल के ‘अँग्रेज़ी ढंग के नॉवेल’ के साथ जोड़कर देखें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि हिन्दी साहित्य का विकास अँग्रेज़ी साहित्य के वज़न पर किया गया। सुसी थारू ने अपने लेख ‘अरेंजमेंट ऑफ एलायंस’ में अँग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के सम्बन्ध को एलायंस की संज्ञा दी है। उल्लेखनीय है कि ‘फिल्ट्रेशन थियरी’ भी इसी बात की तस्दीक करती है कि अँग्रेज़ी के मॉडल पर भारतीय भाषाओं को ‘विकसित’ करने का सिलसिला उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गया था। बीसवीं सदी में यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी। इसलिए विचारणीय प्रश्न यह है कि आधुनिक हिन्दी साहित्य को ‘अँग्रेज़ी ढंग का साहित्य’ कहना उचित है या नहीं। क्या आधुनिक हिन्दी साहित्य अँग्रेज़ी से ‘डिराइव्ड’ है? या शुरुआत में ‘डिराइव्ड’ है किन्तु आगे बढ़ने पर इसकी ढब बदल गई। जो भी हो, इतना तो तय है कि हिन्दी की जातीय परम्परा का यह स्वभाविक विकास नहीं है। यह गुणात्मक परिवर्तन है, पैराडाइम शिफ्ट है। स्वयं भारतेन्दु के साहित्य में पूर्व और पश्चिम को एक तरह की रस्साकशी दिखाई पड़ती है। उनके गद्य पर पश्चिमी चिन्तन का गहरा प्रभाव है किन्तु उनके पद्य का हिन्दी की पूर्व औपनिवेशिक परम्परा से सम्बन्ध अभी भी प्रगाढ़ है। पूर्व-पश्चिम का यह द्वंद्व उनके लेखन की भाषा में भी दिखाई पड़ता है। इसीलिए गद्य वह खड़ी बोली में और पद्य ब्रजभाषा में लिखते हैं। एक तरह से भारतेन्दु का व्यक्तित्व विभाजित व्यक्तित्व है जो पूर्व और पश्चिम दोनों ओर खिंचता है; किन्तु झुकता किसी ओर नहीं। विभाजित व्यक्तित्व का यह दोचित्तापन समूचे हिन्दी नवजागरण की विशेषता है। पश्चिमी आधुनिकता की ओर वह आकृष्ट होता है किन्तु भारतीय सांस्कृतिक परम्परा से विमुख नहीं होना चाहता।
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भारत के सांस्कृतिक इतिहास में सम्भवतः पहली बार साहित्य का सचेत रूप से इस्तेमाल कुछ सामाजिक उद्देश्य हासिल करने के लिए किया गया। भक्तिकाल के दौरान अवश्य साहित्य और धर्म को मिलाने की कोशिश की गई थी। वैसे तो भक्तिकालीन कवि साहित्य और धर्म के भेद को समझते थे, इसलिए उन्होंने साहित्य में धार्मिकता को उतना ही मिलाया, जिससे साहित्य की साहित्यिकता क्षरित न हो। जहाँ इस संयम का निर्वाह नहीं हो पाया, वहाँ साम्प्रदायिक साहित्य तो बन गया किन्तु उसे साहित्य कह पाना मुश्किल है। असल में, भारत में धर्म से स्वतंत्र काव्य की सत्ता का विवेक प्रारम्भ से रहा है। इसीलिए यहाँ काव्यशास्त्र की इतनी सुदीर्घ और समृद्ध परम्परा रही है। काव्यशास्त्र में जिस प्रश्न पर लगातार विचार किया गया है, वह यह है कि साहित्य शास्त्र से कैसे भिन्न है। शास्त्र में धर्मशास्त्र भी शामिल है। काव्यशास्त्र के जितने भी सम्प्रदाय हैं, सभी इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं। वस्तुतः शास्त्र से साहित्य के अन्तर को रेखांकित करने के लिए भारत ने रस की अवधारणा बहुत पहले विकसित कर ली थी। कालान्तर में इस विषय पर और भी गम्भीर चिन्तन किया गया।
वस्तुतः भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने ‘जातीय संगीत’ नामक लेख में साहित्य का कुछ सामाजिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की पेशकश की थी। साहित्य के नैमित्तिक; (Instrumental) इस्तेमाल का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक चल रहा है। ध्यातव्य है कि साहित्य का इस्तेमाल सामाजिक-राजनीतिक मकसद के लिए किया गया और साहित्य की सार्थकता/प्रासंगिकता भी इन्हीं सामाजिक-राजनीतिक उद्देश्यों के आधार पर तय की गई। एक तरह से साहित्य की भूमिका सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराओं के सहायक के रूप में निर्धारित कर दी गई। इसी के साथ एक बात और हुई। बीसवीं सदी में जब बाज़ार का बहुत विस्तार हो गया तो उसने साहित्य को भी एक उपभोग की वस्तु में रूपान्तरित कर दिया। यह सही है कि आधुनिकतावादी रचनाकारों ने साहित्य को किसी भी प्रकार के नैमित्तिक प्रयोग से अलग रखने की कोशिश की। उन्होंने ऐसी तरकीबें निकालीं जो साहित्य को उपभोग की वस्तु में रूपान्तरित करने की प्रक्रिया को अवरुद्ध करती सी लगती थी। किन्तु यह प्रयास भी विफल रहा। साहित्य का लोकवृत्त अवश्य सिमट गया। साहित्य की नैमित्तिक भूमिका को साहित्य की सामाजिकता के रूप में स्वीकार कर चलने वाली प्रवृत्ति जब और बढ़ गई तो समाजविज्ञान/विचारधारा और साहित्य का भेद मिटने लगा। समाजवैज्ञानिक या विचारधारात्मक सत्य की कसौटी पर साहित्य की प्रासंगिकता तय की जाने लगी। साहित्य की विचारधारात्मक परिणति से साहित्य की अस्मिता ही सन्दिग्ध हो गई। प्रश्न यह है कि साहित्य की इस विचारधारात्मक परिणति की शुरुआत कब हुई। जैसा कि पहले कहा गया, शुरुआत भारतेन्दु से हुई और यह सिलसिला तब से आज तक किसी न किसी रूप में चलता रहा है।
साहित्य को समाज-निर्माण की परियोजना से जोड़ दिया गया तो यह ज़रूरी हो गया कि उसे इस नई भूमिका के अनुरूप झाड़-पोंछ कर तैयार किया जाय। अब वह ‘काव्यशास्त्रविनोद’ की चीज़ नहीं रहा, ‘ज्ञानराशि का संचित कोष’ बन गया। व्यक्तिगत जीवन में भले ही कुछ बातें बहुत आकर्षक लगती हों, किन्तु सार्वजनिक रूप उन्हें नहीं कहा जाता। साहित्य की सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा बढ़ गई तो जो चीजें पहले धड़ल्ले से साहित्य में आ जाती थीं, साहित्य के दरवाजे अब उनके लिए बन्द हो गए। साहित्य के इस ‘मर्यादित’ आचरण में प्रेम या शृंगार के लिए ज़्यादा जगह नहीं बची। हिन्दी साहित्य के इतिहास में ही नहीं, लोकसाहित्य में भी जहाँ-जहाँ शृंगार दिखाई पड़ा, उसे हिन्दी के इस नए लोकवृत्त से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इस ‘शुद्धीकरण’ के बावजूद, साहित्य का स्वभाव ऐसा है कि उसमें ऐसी बातें आ ही गईं जिन्हें निजी जीवन के दायरे में क़ैद करने की कोशिश की गई थी।
पहले उल्लेख किया गया कि सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘अँग्रेज़ी ढंग की समालोचना के प्रचार पर बल दिया था और काव्यशास्त्र की भारतीय परम्परा को त्याज्य घोषित किया था। अँग्रेज़ी ढंग के ‘नावेल’ का अनुमोदन रामचन्द्र शुक्ल कर ही चुके थे। इस तरह छायावाद तक आते-आते ‘अँग्रेज़ी ढंग’ के साहित्य की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। यह अवश्य है कि ‘अँग्रेज़ी ढंग’ का यह साहित्य पूरी तरह ‘अँग्रेज़ी ढंग’ का साहित्य नहीं बना। उसमें कुछ भारतीय विशेषताएँ भी उभर आईं। तुलसीदास ने लिखा है—
भूमि परत भा डाबर पानी।
जनु जीवहिं माया लिपटानी॥
लब्बोलुआब यह कि ‘अँग्रेज़ी ढंग’ के इस साहित्य में भारतीय देशकाल की माया लिपट गई। क़िस्सा तो था यह कि हिन्दी में जिस ढब की आलोचना का विकास बीसवीं सदी में हुआ उसे साहित्यशास्त्र की भारतीय परम्परा का विकास तो नहीं कहा जा सकता। आलोचना की पश्चिमी परम्परा का भारतीयकरण, चाहे तो कह सकते हैं। पहले यह देख लें कि पश्चिमी परम्परा में आलोचना से क्या आशय है। पश्चिमी परम्परा में आलोचना के चार विभाग हैं। चारों के मिलने से आलोचना बनती है। आइए देखें कि ये चार विभाग क्या हैं और इनकी भूमिका क्या है।
- टेक्सचुअल क्रिटिसिज़्म (Textual Criticism) : इसे हिन्दी में पाठालोचन कहते हैं। पुरानी पांडुलिपियों का सन्धान कर एक प्रामाणिक पाठ तैयार करना पाठालोचन का बुनियादी कार्य है। प्रामाणिक पाठ तैयार हो जाने पर उसके अर्थ का सम्यक् निरूपण भी पाठालोचन में किया जाता है।
- शोध (Research) : पुरानी पांडुलिपियों और पुराने साहित्य की खोज और अध्ययन शोध का मुख्य कार्य है। नए साहित्य को लेकर भी शोध की सम्भावना रहती है, किन्तु शोध की दृष्टि से अज्ञात या अल्पज्ञात क्षेत्र ज़्यादा उर्वर होते हैं।
- एनोटेशन (Annotation) : इसे टीका के समतुल्य माना जा सकता है। प्रकाशित रचना का अर्थ-निष्पादन और विभिन्न विद्वानों द्वारा किए गए अर्थ-वैभिन्य का बोध ‘एनोटेशन’ के दौरान करा दिया जाता है।
- इंटरप्रेटेशन (Interpretation) : रचना की व्याख्या। विभिन्न आलोचकों द्वारा की गई व्याख्याओं का उल्लेख करते हुए अपनी व्याख्या प्रस्तुत करना।
आलोचना के इन चारों विभागों में बलाघात का फ़र्क तो है, किन्तु ये पूरी तरह एक दूसरे से अलग नहीं हैं। आलोचना के लिए अँग्रेज़ी में आवश्यकतानुसार कई शब्दों का प्रयोग हुआ है। अलग-अलग कालावधि में आलोचना का स्वरूप और उसकी भूमिका बदलती रही है। आइए देखें कि आलोचना के लिए अँग्रेज़ी में किन-किन शब्दों का प्रयोग हुआ है—
बुक रिव्यू (Book Review) इसे हिन्दी में पुस्तक-समीक्षा कहा गया।
- लिटरेरी क्रिटिसिज़्म (Literary Criticism) : हिन्दी में इसे साहित्यिक आलोचना या सिर्फ़ आलोचना कहा गया। अँग्रेज़ी में भी प्रायः Criticism शब्द का ही प्रयोग होता है।
- लिटरेरी थ्योरी (Literary Theory) : हिन्दी में इसका अनुवाद ‘साहित्य सिद्धान्त के रूप में किया गया। उल्लेखनीय है कि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में साहित्य-सिद्धान्तों का बोलबाला रहा है। इन सिद्धान्तों के अनुरूप साहित्य आलोचना के अनेक सम्प्रदायों का विकास हुआ।
- व्यावहारिक और सैद्धान्तिक आलोचना (Practical and theoretical Criticsm) :
- सांस्कृतिक अध्ययन (Cultural Studies) : औद्योगिक लोकप्रिय संस्कृति के अध्ययन हेतु इसका विकास हुआ।
- लोकविद्या (Folklore) : हिन्दी में प्रायः इसके लिए लोकसाहित्य शब्द का प्रयोग होता है। किन्तु लोकसाहित्य से folklore की व्याप्ति का सम्यक् बोध नहीं होता।
आलोचना के व्यावहारिक और सैद्धान्तिक पक्ष होते हैं, ये भेद भी आत्यन्तिक नहीं हैं, फिर भी बलाघात के फ़र्क़ से आलोचना के ये दो रूप बन जाते हैं। इस प्रकार आलोचना के ये विभाग मिलकर साहित्य का अध्ययन करते हैं। इन सभी विभागों का अपना महत्त्व है। इनमें से किसी का भी महत्त्व किसी से कमतर या बढ़कर नहीं है। भारतीय परम्परा में इस समग्रता का बोध कराने के लिए क्रिटिसिज़्म से ज़्यादा बेहतर शब्द साहित्यशास्त्र है। ऐसा शास्त्र जो साहित्य का अध्ययन करता है। अतः मैं साहित्य के अध्ययन की समग्रता का बोध कराने की दृष्टि से ज़्यादा उपयुक्त शब्द ‘साहित्यशास्त्र’ के प्रयोग का प्रस्ताव करता हँू।
बीसवीं सदी के प्रायः सभी रचनाकारों पर अँग्रेज़ी साहित्य का प्रभाव किसी न किसी रूप में अवश्य है। किसी में कम तो किसी में ज़्यादा। लेकिन पश्चिमी प्रभाव से अछूता कोई नहीं बचा। यह बात आलोचकों पर भी लागू होती है। किन्तु जिन दो आलोचकों ने पश्चिम से प्रभाव ग्रहण करने के बावजूद भारतीय परम्परा से अपना सम्बन्ध बनाए रखा, वे हैं रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी। विस्तार में तो चर्चा सम्भव नहीं, किन्तु नमूने के तौर पर मैं दो-एक बातों का उल्लेख कर देता हँू। पहले रामचन्द्र शुक्ल। रामचन्द्र शुक्ल का प्रसिद्ध कथन है कि ‘जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।’ उल्लेखनीय है कि रामचन्द्र शुक्ल ने रस-दशा को ज्ञान-दशा के बराबर मान दिया है। जबकि पश्चिमी परम्परा में ज्ञानोदय के समय से साहित्य और कलाओं को समाजविज्ञान का अनुचर माना गया। साधनावस्था वाले साहित्य को श्रेष्ठ मानने के बावजूद रामचन्द्र शुक्ल ‘रसदशा’ को ‘ज्ञानदशा’ के समतुल्य मानते हैं। यह वह बिन्दु है जहाँ रामचन्द्र शुक्ल आधुनिकता-प्रदत्त साहित्य-विवेक को स्वीकार नहीं करते। यहाँ रहकर विचार करना चाहिए कि ‘रसदशा’ से वस्तुतः रामचन्द्र शुक्ल का आशय क्या है? यदि आप भारतीय दर्शन-परम्परा में पारंगत हैं, तभी इसकी सम्यक् व्याख्या कर पाएँगे। वस्तुतः ‘रसदशा’ की अनुभूति उसी को हो सकती है जो ‘सहृदय’ हो। ‘सहृदय’ की अभिनवगुप्त ने जिस प्रकार व्याख्या की, उसका किंचित उल्लेख समीचीन होगा। अभिनवगुप्त लिखते हैं :
निर्मल मुकुले यद्वद भान्ति भूमिजलादयः।
अभित्रयास्तद्वदेकस्ंिमश्चिनाथे विश्ववृत्तयः॥
नामवर सिंह उपर्युक्त पंक्ति की व्याख्या इस प्रकार करते हैं : ‘काव्य के अनुशीलन से मन का दर्पण स्वच्छ हो गया है। दुःख के कुहासे से मुक्त। सुख के राग से मुक्त। त्रिगुण का सन्तुलन।…काव्य पढ़ते समय अपने का बोध न हो—अपनेपन का बोध न हो, पर का बोध न हो, तटस्थता का बोध न हो। उसका हृदय विशद होना चाहिए। विशद यानि विमल। निर्मल होना चाहिए। राजस-तामस विकारों से मुक्त।’
‘सहृदय’ की अवधारणा भारतीय दार्शनिक परम्परा के अनुरूप है। इसकी प्रतीति भरत को रसचर्चा में ही हो जाती है। भरत लिखते हैं :
भावाः विकाराः रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः।
विकारः प्रकृतेर्जातः पुनस्तत्रैव लीयते॥
आइए एक बार फिर देखें नामवर सिंह उपर्युक्त पंक्ति की व्याख्या कैसे करते हैं : “शृंगार आदि अन्य सब रसों के रत्यादि स्थायीभाव विकाररूप हैं और शान्तरस उन सबका प्रकृतरूप है। विकार अर्थात् शृंगार आदि अन्य सब रस प्रकृति अर्थात् शान्त रस से उत्पन्न होते हैं और अन्त में उसी में लीन हो जाते हैं।…नृत्य-संगीत में विलम्बित द्रुत होता है, पर अन्त शम पर। शम अर्थात शान्त। अतएव शान्त कोई स्वतंत्र रस नहीं है। नवम रस के रूप में संगति बैठाने के क्रम में अभिनवगुप्त ने माना कि रसों का चरम आस्वाद तो विषयों से उपरति है। इस तरह शान्त सबका आधार है और सभी रसों का आस्वाद प्रायः शान्त के रूप में ही होता है।” कहने की आवश्यकता नहीं कि रामचन्द्र शुक्ल जिस ‘रसदशा’ की चर्चा करते हैं, उसका वास्तविक सन्दर्भ यही है। ‘रसदशा’ की प्रतीति तब तक सम्भव नहीं, जब तक व्यक्ति जागतिक अस्मिताओं से बँधा हुआ है। जाति, धर्म, पद, सत्ता और लिंग आयु की पहचान से ऊपर उठकर रसदशा तक पहँुचा जा सकता है। यह भी एक प्रकार की साधना है जिसके परिणामस्वरूप ‘मनमुकर’ निर्मल हो जाता है। स्पष्ट है कि साहित्य-साधना के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। संसार में तो है किन्तु साधना के दौरान भी यदि भेद-बुद्धि बची रह गई तो ‘रसदशा’ की प्राप्ति नहीं होगी। संन्यासी की तरह साहित्य का साधक वह है जिसे ‘स्व का बोध न हो, पर का बोध न हो, तटस्थता का बोध न हो। ‘ उल्लेखनीय है कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत हमारी संवेदना को उस धरातल पर स्पर्श करता है, जहाँ जाति, धर्म, राष्ट्र, विचारधारा, लिंग, काल और आयु की ऊपरी परत की कोई भूमिका नहीं बचती। ‘रसदशा’ की अवस्थिति भी कुछ ऐसी है, दर्द के हद से गुज़र जाने जैसी।
‘रसदशा’ की चर्चा एक नमूने के तौर पर की गई। रामचन्द्र शुक्ल के यहाँ ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनकी सम्यक् व्याख्या अपेक्षित है। रामचन्द्र शुक्ल के अतिरिक्त बीसवीं सदी के दूसरे आलोचक हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। द्विवेदी जी पर आलोचक की छवि कुछ फबती नहीं, उन्हें भारतीय संस्कृति का अध्येता कहना ज़्यादा उचित लगता है। साहित्य के अतिरिक्त, वे संस्कृति के अनेक आयामों का अध्ययन करते हैं। इसलिए उन्हें संस्कृति का अध्येता या संस्कृति का आलोचक कहना सही होगा। पश्चिम में ‘सांस्कृतिक अध्ययन’ का विकास लोकप्रिय औद्योगिक संस्कृति के अध्ययन के लिए हुआ। द्विवेदी जी ने संस्कृति के उन आयामों का ज़्यादा अध्ययन किया जिनका भारत के पूर्व औपनिवेशिक अतीत से सम्बन्ध है। इस क्षेत्र में इंडोलोजिस्टों ने बहुत कार्य किया। (उनके द्वारा किए गए अध्ययन की अनेक सीमाएँ हैं और उनके कार्य में अन्तर्विरोध भी कुछ कम नहीं, किन्तु वह एक अलग विषय है और उसकी चर्चा का अवसर नहीं)। हिन्दी में लिखने वाले दो प्रमुख आचार्य हैं, जिनके कार्य का इस दृष्टि से सम्यक् मूल्यांकन अभी होना है। हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के अतिरिक्त, मेरी दृष्टि में ऐसे दूसरे प्रमुख आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल हैं। किन्तु यहाँ हम हजारीप्रसाद द्विवेदी के लेखन के सिर्फ़ एक सूत्र का उल्लेख कर अपनी बात पूरी कर देंगे।
ध्यातव्य है कि द्विवेदी जी लालित्यशास्त्र पर एक पूरी पुस्तक लिखना चाहते थे। चार निबन्ध उन्होंने लिख भी लिए, किन्तु पुस्तक पूरी नहीं कर पाए। इन निबन्धों से पहले वे ‘कालिदास की लालित्य योजना’ पुस्तक लिख चुके थे। सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics) की िवज़न पर उन्होंने ‘लालित्यशास्त्र’ की प्रस्तावना की थी। लालित्यशास्त्र की अवधारणा के निरूपण से भारतीय साहित्य और कला के कुछ विशिष्ट आयामों को समझने की दृष्टि मिल जाती है। किन्तु यह स्वतंत्र अध्ययन का विषय है और उस पर लिखना शुरू करूँगा तो अच्छा खासा एक नया लेख तैयार हो जाएगा। इसलिए उसकी चर्चा भविष्य में किसी नए निबन्ध में करूँगा।
