रघुवंश (कालिदास) – चौदहवें सर्ग के कुछ अंश : अनुवाद- राजकुमार

रघुवंश (कालिदास) – चौदहवें सर्ग के कुछ अंश : अनुवाद- राजकुमार

 

रघुवंश महाकाव्य के ‘सीतापरित्याग’ नामक चौदहवें सर्ग के कुछ विख्यात श्लोकों को हिन्दी में लाने का उद्यम है यह । अनुवाद कहना तो ठीक नहीं होगा ; इन्हें पुनर्रचना अवश्य कहा जा सकता है।  उल्लेखनीय है कि सीता का परित्याग राम ने राजा के रूप में किया था। इसलिए सीता का प्रत्युत्तर भी व्यक्ति के रूप में है, पत्नी के रूप में नहीं। इस प्रत्युत्तर में राम की आलोचना भी ह। बाल्मीकि की भूमिका भी कम अहम नहीं : क्रौंच पक्षी के  दुख से दुखी होने वाला व्यक्ति मनुष्य के दुख से कैसे दुखी नहीं होता!

 

पहुँच कर वहाँ

कह देना उस राजा से

अग्नि परीक्षा में जिसे शुद्ध- निष्कलंक पाया था तुमने

त्याग दिया उसे सिर्फ़ लोकापवाद के भय से !

शास्त्रों के अनुरूप था यह आचरण ?

या प्रसिद्ध सूर्यवंश के अनुरूप !

 

2

सबके कल्याण की कामना करते हो आप

किन्तु मनमाना व्यवहार किया मेरे साथ !

नहीं करनी चाहिए शंका ऐसी !

जन्म जन्मान्तर के पातकों का विपाक है यह !

असह्य बज्रपात !!

 

3

सदा के लिए हुआ वियोग आपसे

व्यर्थ तुच्छ हो गया यह जीवन !

उपेक्षा ही कर देती मैं इसकी

अपनी जान लेकर

यदि गर्भ में मौजूद

रक्षणीय तेज तुम्हारा बाधक न होता ।

 

3

कहना है मनु का

रक्षा करना वर्णाश्रम की

धर्म है राजा का ।

निर्वासित कर दिया मुझे सिर्फ़ लोकापवाद के भय से

मैं भी रक्षणीय थी

अन्य तपस्वियों की तरह ।

 

4

लक्ष्मण ने कहा सीता से

ये सभी बातें आपकी

मैं अवश्य कहूँगा राम से ।

लक्ष्मण के ओझल होते ही

दु : खाधिक्य से फूट पड़ा

सीता का रुदन

जैसे फूटा था कुररी का रुदन ।

 

5

सीता का रोना सुनकर

मोरों ने नाचना छोड़ दिया

पेड़ों ने फूल गिरा दिये

घास खा रही हरिणियों ने

अपने मुह की घास गिरा दी

सीतासम दुःख व्याप गया वन में

विलपने लगा वन ।

दुःखाधिक्य से

ऐसा ही रुदन

फूट पड़ा अयोध्या में

 

6

कुश और लकड़ी लेने

आश्रम से निकले

बाल्मीकि

सीता का रुदन सुनकर

लौट आये ।

क्रौंच के दुःख से

दुःखी हुए थे जो इतना

कि शोक श्लोक बन गया था जिनका ।

पक्षी के प्रति करुणा थी जिनमें इतनी

वह भला मनुष्य के रोने को कैसे सह पाते !

 

7

प्रसन्न नहीं मैं राम से

तीनों लोकों के शत्रुओं को उखाड़ फेंकने वाले

अपनी प्रशंसा स्वयं न करने वाले

राम से प्रसन्न नहीं मैं ।

तुम्हारे साथ अकस्मात ऐसा

गर्हित व्यवहार करने वाले

राम से क्रुद्ध हूँ मैं ।

 

8

लक्ष्मण के के मुख से

सीता का सन्देश सुनते ही

भर आयीं राम की आँखें ।

ओस से धूमिल हो जाता पौष मास का चाँद जैसे

राम का मुख हो गया मद

 

 

 

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