लोकतंत्र मनुष्य के सभ्य होते जाने की गाथा है । यह एक बेहद लम्बी और तवील यात्रा है जो भिन्न भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भो मे मानव प्रजाति ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से तय की है। यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस यात्रा मे इतने उतार चढ़ाव आये हैं कि कई बार फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि हम आगे बढ़े हैं या पीछे? आदिम साम्यवाद और कबीलाई यथार्थ या यूटोपिया जैसे काल्पनिक आदर्शों से गुजरती मनुष्यता की यह यात्रा संस्थाबद्ध धर्म, व्यक्तिगत संपत्ति, परिवार और राज्य के निर्माण की साक्षी बनी और ये चारों संस्थायें ही लोकतंत्र या उससे जुड़े मूल्यों की हमारे जीवन मे उपस्थिति या अभाव मे फ़ैसला क़ुन भूमिका निभाते हैं।
लोकतंत्र है क्या ? एक मोटे अनुमान के अनुसार लगभग लाख वर्ष पहले आधुनिक मनुष्य पृथ्वी पर अस्तित्व मे आया और तब से जीवन को सुरक्षित करने और उसे ज़्यादा सुविधा जनक बनाने के लिये वह लगातार नये नये आविष्कार करता रहा है और इनमे से सबसे महत्वपूर्ण ईज़ाद भाषा है। यह भाषा भी लगभग 6 हज़ार वर्ष पूर्व वाचिक से लिखित तब बनी जब लिपि का विकास हुआ। लिपियों से शब्दों का संग्रहण शुरू हुआ और उनके एकाधिक अर्थ संग्रहीत हुये जो अंततोगत्वा शब्दकोशों के निर्माण के कारण बने। इसी प्रक्रिया मे लोकतंत्र शब्द बना और विभिन्न अर्थों से गुज़रते हुये इन अर्थों का मानकीकरण भी हुआ। सारे अर्थ एक ख़ास तरह की सहमति रखते थे और यह सहमति बनती थी सभी नागरिकों के बीच बराबरी की अवधारणा और राज्य के संचालन मे उनकी भागीदारी पर। यह भी दिलचस्प है कि शब्द की मूल आत्मा मे निहित अर्थ को धरातल पर उतरने मे हज़ारों वर्ष लग गये। आज भी हम नही कह सकते कि सही अर्थों मे लोकतंत्र पूरी तरह से हमारे जीवन मे उतर सका है।
इतिहास ने बहुत सारी संस्थायें बनती देखीं जिन्होंने समानता का विरोध किया है। धर्म और व्यक्तिगत संपत्ति उनमे सबसे महत्वपूर्ण हैं। ख़ास तौर से धर्म ने पूरे प्राणपण से लैंगिक समानता का विरोध किया है। यह तो पिछले सौ सालों मे ही संभव हो सका है कि स्त्री पुरुष समानता की सैद्धांतिकी निर्मित हो पायी। इस क्षेत्र मे अभी भी बहुत कुछ होना बाक़ी है पर आज समाज मे औरतों की जो हैसियत है, कुछ दशकों पहले ही उसकी कल्पना करना भी मुश्किल था। जैसे जैसे धर्म की जकड़बंदी ढ़ीली पड़ती जा रही है, पुरुष को मिली दैवी श्रेष्ठता खंडित होती जा रही है। ज़्यादातर धर्मों ने ग़ुलामी प्रथा को भी वैधता प्रदान की थी। यह तो लोकतांत्रिक आंदोलनों से संभव हुआ कि ग़ुलामी समाप्त हो सकी। इस्लामी मुल्कों मे तो 1960 के दशक तक ग़ुलामों की मंडियां सजती थीं और अख़बारों मे उनके विज्ञापन छपते थे । इसी तरह की एक और असमानता की अवधारणा त्वचा के रंग को लेकर थी। रंग भेद का अंतिम गढ़ दक्षिण अफ़्रीका मे बीसवीं शताब्दी मे ढ़ह गया। असमानताओं की फ़ेहरिश्त मे सबसे ज़्यादा घृणित और ठस्स व्यवस्था भारतीय मेधा ने गढ़ी थी और यह थी वर्णव्यवस्था। धर्म से खाद हासिल करने वाली यह एक ऐसी व्यवस्था थी जो अपने बीच के ज़्यादातर मनुष्यों को जानवर से बदतर समझती थी और इस में मुक्ति के दरवाज़े हमेशा बंद रहते थे। एक बार शूद्र या अतिशूद्र योनि मे पैदा होने के बाद जीवन भर उसके साथ जुड़ी ज़्यादतियों से मुक्त होना नामुमकिन था।
मैंने मनुष्य जाति से जुड़ी असमानताओं का ज़िक्र सिर्फ़ इस लिये किया कि हम भाषा मे लोकतंत्र जैसे शब्द की उपस्थिति का संदर्भ समझ सकें। सृष्टि के दूसरे प्राणियों के मुक़ाबले अपने बड़े दिमाग़ का फ़ायदा उठाते हुये मनुष्य ने क्रमिक विकास या इवोल्यूशन के दौरान ऐसी संस्थाएँ तो बनायी ही जिनसे असमानता की जड़े जीवन मे गहरी हुईं, इन असमानताओं के विरुद्ध लड़ने की समझ और ज़िद्द भी पैदा की। इसी कशमकश मे लोकतंत्र की अवधारणा विकसित हुई। इस यात्रा मे एक महत्वपूर्ण मुक़ाम आया लगभग 800 साल पहले मैग्नाकार्टा मे जब एक संधि के ज़रिये इंग्लैंड के राजा ने अपने बहुत से अधिकार जनता के चुने हुये प्रतिनिधियों के लिये छोड़ दिये। यह इस लिये भी महत्वपूर्ण था कि इस से इस विश्वास की चूलें हिल गयीं कि राजा के अधिकार दैवी हैं और वह ईश्वर का प्रतिनिधि है।
मैग्नाकार्टा की संधि के बाद सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव आया दस दिसम्बर 1948 को मनवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के रूप में जब दो बड़ी लड़ाइयों से उबरी विश्वमानवता ने धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या राष्ट्र की सीमाओं को तोड़ते हुये सारे मनुष्यों को समान घोषित कर दिया गया । यह कई अर्थों मे अभूतपूर्व था। इसके इसके पहले किसी भी धर्म या राष्ट्र राज्य ने अपने से जुड़े सदस्यों और अपने से न जुड़े सदस्यों को बराबरी का अधिकार नही दिया था साथ ही यह कोई आसमानी दस्तावेज़ नही था। इसे मनुष्यों ने अपनी मेधा और आम सहमति से तैयार किया गया था। पहली बार इस दस्तावेज़ ने युद्ध बंदियों, बच्चों या मज़दूरों जैसे तबकों के बुनियादी मनवाधिकारों की शिनाख्त की और उन्हे अनुल्लंघनीय माना। यह घोषणा दुनिया भर मे लोकतंत्र के लिये मील का पत्थर बनी। इसके पहले बुनियादी मनवाधिकारों के लिये धर्म ही सबसे बड़ा स्रोत और ज़मानत था पर इस सार्वभौम घोषणा ने धर्म के लिये भी चुनौती पेश कर दी है। इस्लामी मुल्कों के संगठन ओआईसी ने सार्वभौम घोषणा के बरक्स शरिया आधारित मनवाधिकारों की घोषणा की है। पर कोई भी धर्माधारित सूची उतनी विस्तृत, संतुलित और मानवीय नही हो पायी जैसी मनवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा बनी। कारण सिर्फ़ एक है कि हर धर्म ख़ुद को श्रेष्ठतम समझता है और अपने को मानने वालों और न मानने वालों को समान नही समझता। समानता की यही चाह लोकतंत्र की लंबी यात्रा की सबसे बड़ी आकांक्षा रही है और इसी लिये संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अंगीकृत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा लोकतंत्र का सबसे बड़ा क्षण है।
दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका और सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हमारे अध्ययन के लिये बड़े महत्वपूर्ण हैं । दोनो बड़े दिलचस्प अंतर्विरोधों से भरे हुये हैं। अमेरिका जिसने युद्धों के दौरान विनाश के भयंकरतम हथियार इस्तेमाल किये हैं, जिसे सबसे अधिक लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर करने का श्रेय हासिल है और जिसने अपने हित मे अक्सर फ़ौजी तानाशाहों का समर्थन किया पर अपने भीतरी समाज मे उसने अदभुत लोकतंत्र रचा है। यह अमेरिकी समाज मे ही संभव है कि प्रभुवर्ग वियतनाम मे जीवन मरण का युद्ध लड़ रहा था और सड़कों पर जनता समुद्र की लहरों की तरह ठाठें मार रही थीं। एक बेहतर समाज बनाने के बावजूद शीत युद्ध के दौरान सोवियत नागरिकों के बड़े समूह की कामना होती थी कि उसे अमेरिका में शरण मिल जाय। यह अमेरिकी समाज की ताक़त ही कही जायेगी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मेकार्थीवाद के दौर मे भी, जब वामपंथी बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ राज्य खुलेआम उत्पीड़न की कार्यवाहियाँ कर रहा था, दुनिया भर के असंतुष्ट लेखक, कलाकार या ऐक्टिविस्ट वही शरण लेने आ रहे थे। याद रहे कि अपने समय के सबसे बड़े वामपंथी नाटककार ब्रेख़्त को जब जर्मनी छोड़कर भागना हुआ तो उसने भी अमेरिका को चुना जबकि उस समय सोवियत रूस बन चुका था। आज भी विश्व के दो महत्वपूर्ण जीवन दर्शन-मार्क्सवाद और इस्लाम के अनुयायी सबसे अधिक आलोचना अमेरिका की करते हैं पर उनमे से अधिकांश की कामना होती है कि उन्हे या उनके बच्चों को अमेरिकन वीज़ा मिल जाय। वे मौक़ा मिलते ही अमेरिका आना चाहते हैं और अमेरिकन समाज उन्हे स्वीकार भी कर लेता है।
यह समझना दिलचस्प होगा कि एक राष्ट्र राज्य के रूप मे संयुक्त राज्य अमेरिका का इतिहास बहुत स्पृहणीय नही है पर अपनी आंतरिक संरचना मे वह तमाम समाजवादी या धर्माधारित राज्यों के मुक़ाबले ज़्यादा उदार, सहिष्णु, लोकतांत्रिक या रहने लायक़ रहा है। ऐसा क्यूँकर हुआ होगा, यह एक विस्तृत समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है। यह तो पारम्परिक समझ का अंग है कि किसी भी देश की विदेश नीति उसकी घरेलू सोच का प्रतिफलन होती है पर दुनिया भर मे तानाशाहों और लुटेरों का समर्थन करने वाले राष्ट्र राज्य अमेरिका की जनता के मन मे लोकतंत्र को लेकर इतना दुर्निवार आकर्षण क्यों है? ग़ुलामी प्रथा, रंग भेद, लैंगिक असमानता या वियतनाम और ईराक़ / अफगनिस्तान युद्धों के ख़िलाफ़ या हाल मे ब्लैक लाइफ़ मैटर्स जैसे बड़े जनांदोलन इसी चाहत की उपज़ रहे हैं।
इसी तरह का दूसरा दिलचस्प अंतर्विरोध दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत मे दिखता है। हमारी राष्ट्रवादी चिंतन धारा को धक्का लगेगा पर मेरा मानना है कि आंतरिक संरचना मे हम एक लोकतंत्र विरोधी समाज रहे हैं। यह हमे संचालित करने वाली महत्वपूर्ण संस्था वर्ण व्यवस्था के कारण है। इसमे अपने बीच के मनुष्यों मे से अधिकांश को पशु या कई बार तो उनसे भी निकृष्ट योनि का प्राणी मानने की सीख दी जाती रही है। मैंने ऊपर कई तरह की असमानताओं का ज़िक्र किया है उनमे सबसे विकट लड़ाई वर्ण व्यवस्था से मुक्ति की ही है। इसके पीछे के कारण की शिनाख्त बहुत मुश्किल नही है । इसकी वैधता के पीछे मज़बूती से धर्म खड़ा है । इसमे कोई शक नही कि ग़ुलामी या लैंगिक असमानता को भी धर्मों से खाद मिलती रही है पर हिंदू धर्म का वर्ण व्यवस्था से रिश्ता कुछ इतना विशिष्ट है कि एक बार झल्लाकर डाक्टर आम्बेडकर को कहना पड़ा था कि बिना एक के दूसरे की कल्पना भी नही की जा सकती । इस संस्था को सबसे पहली और बड़ी चुनौती मिली भारत मे औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन मे जब अंग्रेज शासकों ने 1860 के दशक मे ऐसे फ़ौजदारी क़ानून बनाये जिनमे सभी बराबर थे यानी एक जैसे अपराध करने पर ब्राह्मण और शूद्र को एक जैसे दंड का प्राविधान किया गया था । अदालत मे दोनो की गवाही भी बराबर के महत्व की थी । इसी तरह पहली बार यह किया गया कि सैनिक और असैनिक सेवाओं मे नियुक्ति के लिये जाति से परे दूसरी अर्हताएँ निर्णायक हो गयीं । यह सब भारतीय समाज के लिये अकल्पनीय था । इसी तरह समाज मे ऐसी शिक्षा की व्यवस्था की गयी जिसमे जातियों से परे सभी के लिये शिक्षा के द्वार खुल रहे थे । यह कहना अनुचित न होगा कि हम विश्व के सबसे बड़े शिक्षा विरोधी समाज थे । किसी भी दूसरे समाज ने अपने बीच के तीन चौथाई से अधिक लोगों को शिक्षा हासिल करने से इतनी निर्ममता से नही रोका था जिस तरह से हिंदू समाज ने रोका था । एक पूरी सैद्धान्तिकी निर्मित की गयी जिसने शूद्रों , अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया था । इस लिये कल्पना ही की जा सकती है कि शिक्षा और सेवा के अवसरों मे बराबरी ने तत्कालीन भारतीय समाज मे कितनी उथल पुथल मचा दी होगी पर इसने भारतीय समाज को लोकतांत्रिक बनाने मे सबसे फ़ैसलाकुन भूमिका ज़रूर निभाई है ।
1947 मे एक लंबी ग़ुलामी से मुक्त हो कर भारत ने लोकतंत्र की यात्रा सही अर्थों मे शुरू की । इस पर तमाम लोगों को आश्चर्य होना चाहिये कि लोकतंत्र के बुनियादी मूल्य समानता का निषेध करने वाले समाज ने कैसे इतना ख़ूबसूरत संविधान बना लिया जो धर्म , जाति , लिंग , नस्ल या व्यक्तिगत सम्पत्ति के परे सब को बराबरी अधिकार देता है । इस दस्तावेज़ से लोकतंत्र की निर्णायक लड़ाई शुरू होती है । लड़ाई मै इस लिये कह रहा हूँ कि एक ऐसा समाज जो जन्माधारित असमानताओं को ईश्वर रचित मानता था और जो अभी भी अंदर से गहरे रूप से आस्तिक है , उसके लिये लोकतंत्र के लिये अनिवार्य समानता को आसानी से स्वीकार करना इतना आसान भी नही है । यह संघर्ष निरंतर चल रहा है और इसके दिलचस्प परिणाम दिखने भी लगे हैं । हाल मे हिंदुओं के सबसे बड़े और सबसे संगठित समूह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया ने भी वर्ण व्यवस्था की निरर्थकता पर बल दिया है और उससे छुटकारा पाने का आह्वान किया है । यह एक मील का पत्थर साबित हो सकता है ।
लोकतंत्र के नज़रिए से अमेरिकी और भारतीय समाजों की आंतरिक संरचनाओं का अध्ययन बड़ा दिलचस्प होगा । मैंने ऊपर निवेदन किया है कि अमेरिकन प्रभुवर्गो द्वारा संचालित विदेश नीति और आम जन की परस्पर व्यवहार नीति मे ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है । एक राष्ट्र राज्य के रूप मे भारत की अंतरराष्ट्रीय हैसियत कभी भी अमेरिका जैसी नही रही है इस लिये उसकी विदेशनीति का अन्य राष्ट्रों पर पड़ने वाले प्रभाव का अमेरिका से तुलना करना उचित नही होगा पर जनता की प्रतिक्रियाओं से उसके लोकतांत्रिक मिज़ाज की पड़ताल की जा सकती है । ब्लैक लाइफ़ मैटर्स जैसे आंदोलन , जिनमे पीड़ित कालों के साथ बड़ी संख्या मे वे गोरे शरीक होते हैं जिनके हाथों उत्पीड़न होते थे , की कल्पना भारत मे मुश्किल है । इन से मिलता जुलता आंदोलन तो वही हो सकता है जिसमें शूद्रों पर होने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ सड़क पर बड़े पैमाने पर ब्राह्मण निकल कर आयें ऐसा दृश्य आम तौर से नही दिखाई पड़ता । इसी तरह से वियतनाम , ईराक़ , सीरिया या अफगानिस्तान मे सैन्य हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ जैसे अमरीक़ी जनता सड़कों पर उतरती है वैसे कभी भी भारतीय राज्य द्वारा अपने अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किये जाने वाले अन्याय के ख़िलाफ़ देश का बहुसंख्यक समुदाय शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से प्रतिरोध मे उतरा हो ।
लोकतंत्र की एक कसौटी अपने बीच मे मौजूद कमज़ोर वर्गों के लिये छोड़ा जाने वाला स्थान है । स्थानाभाव के कारण मै सिर्फ़ एक उदाहरण दूँगा जिससे दोनो समाजों मे सड़क पर पैदल चलने वालों के साथ होने वाला व्यवहार है । यह तो सभी स्वीकार करेंगे कि सड़क पर पैदल चलने वाला सबसे असुरक्षित होता है और उसके साथ होने वाला व्यवहार भी लोकतंत्र का एक पैमाना हो सकता है । भारतीय सड़कों पर पैदल चलने वाला सबसे दयनीय होता है । वाहन अपनी क़ीमत और ताक़त के क्रम मे सम्मान पाते हैं । अमेरिकन सड़कों की तरह अगर कोई पैदल चलने वाला यह कामना करे कि उसे सड़क पार कराने के लिये सारे वाहन रुक जायेंगे तो पूरी संभावना है कि उसे घोर निराशा ही हाथ लगेगी । यह भी संभवतः वर्ण व्यवस्था के चलते ही हुआ है कि किसी कमज़ोर के लिये हमारे मन मे अमूमन सहानुभूति पैदा नही होती । शायद इसी कारण मुख्य धारा की हमारी सारी संस्थाएँ , चाहे वे न्यायपालिका हों , पत्ररकारिता हो या विश्वविद्यालय हों , आम तौर से स्त्रियों , दलितों , आदिवासियों या अल्पसंख्यकों के विरुद्ध खड़ी दिखतीं हैं ।
लोकतंत्र के सबसे पुराने और सबसे बड़े समाजों की तुलना से यह तो स्पष्ट हो गया है कि लोकतंत्र मे सबसे अनिवार्य उपस्थिति समानता के लिये लगातार लड़ाई चलती रही है और आज़ भी चल रही है । कम से कम भारत मे यह स्पष्ट दिखाई दे रही है । वर्ण के विरोध मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख का बयान इसी का द्योतक है । लैंगिक असमानता की सैद्धांतिकी कमज़ोर पड़ रही है । लिव इन रिलेशनशिप को मान्यता या अपने शरीर पर औरत के हक़ की शिनाख्त इसी दिशा मे बढ़ते कदम हैं । लड़ाई लंबी है पर लोकतंत्र के लिये इसे जीतना ज़रूरी है ।
