चाहे भाषागत व सांस्कृतिक विविधिता हो या फिर एकता, भारत को लेकर दोनों ही सबको एक अचम्भे में डाल देती हैं. इतना विशाल देश और इतनी विविधिता पर फिर भी, किसी भी मोड़ पर, कहीं भी सम्प्रेषण टूटता नहीं. आप कन्या कुमारी से कश्मीर या गुजरात से आसाम चले जाइए, आप ट्रेन में हों या किसी धार्मिक मेले में, सम्प्रेषण नहीं रुकता. वास्तव में कहा तो यह जाता है कि हमारी विविधिता ही हमारे सम्प्रेषण का राज़ है. भाषागत विविधिता सम्प्रेषण को सहज बनाती है. इसका एक और राज़ है हमारी सहनशीलता व संवेदनशीलता. हम लोग अपनी भाषाओं को चारदीवारी में बाँध कर नहीं रखते. जो भाषा अन्य भाषाओं से अलग थलग हो जाती है वह फल फूल नहीं सकती; घुटती रहती है. उदाहरण के लिए बहुत समय तक हिन्दी के समर्थकों ने हिन्दी को संस्कृत की ओर ले जाने के लिए हिन्दुस्तानी, उर्दू व अन्य भाषाओं से इस कद्र दूर खींचा कि उसे संवाद की गंभीर भाषा बनने में बहुत समय लग गया. अपने दरवाजे खिड़कियाँ खुले रखने से ही भाषा समृद्ध होती है.
हज़ारों भाषाएँ हैं हमारे देश में. सन् 1961 में हमारी सरकार ने देश में 1652 भाषाएँ गिनी; नहीं मालूम कितनी छूट गईं. किसे भाषा कहें किसे नहीं यह कोई गिनने की बात नहीं; यह तो एक सामजिक व राजनैतिक प्रश्न है. जो भाषाएँ 10000 से कम व्यक्ति बोलते थे उन्हें तो गिनती में ही नहीं रक्खा गया और अगली जनगणना तक 1652 भाषाओं को मिला जुला कर 108 कर दिया गया. हैरानी की बात यह कि अवधि, भोजपुरी, मैथिलि आदि भाषाएँ जो कि हिन्दी की जननी कहलानी चाहिये थी वे हिन्दी की बोलियां कहलाने लगीं. गणेश देवी ने हाल ही में जो जनसमुदाय आधारित गणना करवाई उसमें लगभग 800 भाषा समुदायों का ज़िक्र है और इनमें से 480 तो जनजातीय एवम यायावरी समुदायों की हैं जिनकी तरफ़ यदि जल्द ही हमारा ध्यान नहीँ गया तो वे लगभग लुप्त ही हो जायेगीं. यह सरकार की समवेदनशीलता की निशानी है कि जब 2011 मे जनगणना हुई तो लोगों ने जो भी अपनी मातृभाषा बताई उसे रिकोर्ड किया गया. इस जनगणना में 19569 अलग अलग भाषाओं के नाम लिए गए. आखिर हर परिवार में हर व्यक्ति से पूछना होता है कि उसकी भाषा क्या है? पति कहीं का और और पत्नी कहीं की. माता पिता हो सकता है अलग ही भाषा में बातचीत करते हों; और एक से अधिक. और बच्चे गली कूचे में खेलते और स्कूल में पढ़ते कैसी भाषा का निर्माण करेंगे वह तो वही जाने. सेन्सस के दफ्तर ने 19000 से अधिक भाषाओं को अलग अलग तर्कों के आधार पर 1369 मातृभाषाओं में बदल दिया. खैर, भारत के लगभग 97 % से अधिक लोग तो संविधान की आठवीं सूचि में दर्ज 22 भाषाओँ में से ही किसी एक को अपनी मातृभाषा मानते हैं. साथ ही इनमें कई लोग ऐसे हैं जो दो या दो से अधिक भाषाएँ बोलते हैं. भाषा की वास्तविक प्रकृति तो बहुभाषिता है, हाल ही में मुझे एक संस्था के नाम से एक और उचित नाम मिल गया : अनेकधारा. बहुभाषिता कहने से अक्सर ऐसा आभास होने लगता है जैसे हम भाषा 1, भाषा 2, भाषा 3, आदि की बात कर रहे हों. ऐसा नहीं है. अनेकधारा के रूप में भाषा इंसान होने की पहचान है. यही नहीं कि हिन्दुस्तान में कई भाषाएँ बोली जाती हैं पर यह भी कि जितने भाषा परिवार भारत में हैं शायद ही किसी और देश में हों. अभी तक तो केवल चार ही मुख्य भाषा परिवारों की बात होती थी यानी: आर्य (संस्कृत, हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, बँगला, मराठी, कश्मीरी आदि ), द्रविड़ (तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ आदि ), आस्ट्रो-एशियाटिक या मुंडा (मुंडारी, संथाली, हो, कोरकू, सौरा, आदि) और तिबतोबर्मन (मणिपुरी, अंगामी, तानकुल नागा, मिज़ो, आदि ). आज इनके साथ दो और भाषा परिवारों को भी जोड़ना होगा: ग्रेट अंडेमानीज़ व ताई-कड़ाई. इसके साथ ही भारतीय साइन लेंग्वेज तथा उसके अनेक रूप. निहाली जैसी भाषा का भी ध्यान रखना होगा जिसका अभी तक किसी भी भाषा परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं है. यह आम बात है कि एक ही व्यक्ति अलग अलग भाषा परिवारों की कई भाषाएँ बोलता हो. हैदराबाद में बड़ी होती एक लड़की को जानता हूँ. उसकी माँ बंगाली है और पित़ा पंजाबी. वह घर में जल्दी ही बँगला, पंजाबी व हिन्दी बोलने लगी. घर में काफी बातचीत अंग्रेज़ी में भी होती थी और वह छोटी उम्र में ही अंग्रेजी स्कूल में जाने लगी. गली मोहल्ले में बातचीत दक्खिनी व तेलुगु में होती. और जो यह सब भाषाएँ एक दुसरे में मिलजुल जाती सो अलग. हर भाषा अपने आप में भी अनेकधारा.
भारत में छह भाषा परिवार हैं और हज़ारों भाषाएँ. फिर भी संरचना की दृष्टि से कई ऎसी बातें हैं जिन के कारण भारत को एक भाषाई क्षेत्र कहा जाता है. यह तभी संभव हो पाता है जब भाषा को हम अनेकधारा के रूप में समझें और इस बात की कल्पना करें कि भाषाओं को एक दूसरे के साथ मिलने के लिए पासपोर्ट व वीजा की आवश्यकता नहीं होती. यह द्रविड़ भाषाओं का ही प्रभाव है कि आज लगभग सभी आर्य भाषाओं में ‘टवर्ग’ यानी ‘ट, ठ, ड, ढ’ की ध्वनियाँ पाई जातीं हैं. इसी तरह यह आर्य भाषाओं का ही प्रभाव है कि दक्षिण की सभी मुक्य भाषाओं में संस्कृत के शब्द पाए जाते है. भारत की सभी भाषाओं में चाहे वे किसी भी भाषा परिवार से हों यह सम्भव है कि कई शब्दों को दोहरा कर नए शब्द बना सकते हैं. ‘घर-घर’ या ‘जल्दी-जल्दी’ जैसे शब्द हिन्दुस्तान की सभी भाषाओं में संभव हैं. इससे या तो ‘हर घर’ आदि जैसे अर्थ का बोध होता है या शब्द में और गहराई की झलक आती है. ईको शब्द (प्रतिध्वनि शब्द) जैसे कि ‘जल्दी-वल्दी’, ‘घर-वर’ भी सभी भाषाओं में देखने को मिलते हैं. इनसे ‘आदि’ अर्थ का बोध होता है. यह भी देखने योग्य बात है कि हिन्दुस्तान की सभी भाषाएँ (शिलोंग की खासी को छोड़कर) क्रियांत है. इतने भाषा परिवार पर सभी भाषाएँ क्रियांत. कितना लंबा और गहरा लेन देन रहा होगा और है. क्रियांत भाषाओं की एक और विशेषता है कि उनमें परसर्ग होते हैं: ‘ऑन द टेबल’ (‘ऑन’ टेबल से पहले) न कहकर हम ‘टेबल पर’ (‘पर’ टेबल के बाद) कहते हैं. तुलनात्मक वाक्यों की संरचना भी एक सी लेकिंन अंग्रेजी या क्रिया मध्य में आनेवाली भाषओं से बिलकुल अलग. अंग्रेज़ी में कहेंगे:
- मोहन इज़ टॉलर दैन सोहन. (‘दैन’ सोहन से पहले)
पर हिन्दी में :
- मोहन सोहन से लंबा है. (‘से’ सोहन के बाद)
जब तक हम भाषा की परिकल्पना बहुभाषिकता/ अनेकधारा की तरह नहीं करते तब तक यह सब संभव नहीं. भारतीय भाषाओं में इसी तरह की कई और समानताएँ हैं (देखें सुब्बाराव २०००).
आमतौर पर लोग भाषा को केवल एक सम्प्रेषण का माध्यम भर ही मानते हैं. यदि आप भाषा वैज्ञानिकों से बात करो तो वे अक्सर यह कहेंगे कि भाषा एक नियमबद्ध व्यवस्था है जिसमें वाक्य संरचना के नियमों के अनुसार शब्द-पदों को एक विशेष क्रम में रक्खा जाता है. संरचनात्मक भाषा विज्ञान में दो तरह की मुख्य मान्यताएं हैं: एक तो यह कि हर भाषा अपने आप में अलग है, यानी एक समुदाय है उसकी अपनी एक भाषा है जिसका किसी और भाषा से कोई लेना देना नहीं; दूसरी मान्यता यह है कि सभी भाषाएँ मूल रूप से एक ही होती हैं और उनकी संरचना सार्वभौमिक व्याकरण से होती है. पहली मान्यता के अनुसार बच्चे भाषा और उसकी संरचना समाज से अनुकरण व अभ्यास करते हुए सीखते हैं. दूसरी मान्यता के अनुसार आपमें जन्मजात नैसर्गिक भाषा ग्रहण करने की क्षमता होती है; इस मान्यता के अनुसार भाषा आ जाती है, सीखी-सिखाई नहीं जाती. आस पास का पर्यावरण उस क्षमता को केवल चिंगारी भर देता है. दूसरी मान्यता में कुछ तो सच्चाई निश्चित है क्योंकि हर बच्ची चार वर्ष की आयु तक भाषा की संरचना के दृष्टिकोण से व्यस्क हो जाती है. और यह भी काफी हद तक सही है कि संसार की सभी भाषाओं में कई संरचनात्मक बातें ऎसी हैं जो लगभग सभी भाषाओं में मिलती हैं. आप किसी भी मत को मानें किसी भी समाज के मुहावरे, लोकोक्तियां, लोकगीत, साहित्य आदि पकड़ने के लिए तो आप को उस समाज का हिस्सा होना ही पड़ेगा.
लेकिन यह मानना कि भारत जैसा और कोई देश नहीं सही नहीं. वास्तव में सच तो यह है कि सभी देश, सभी सामजिक समूह भारत जैसे ही हैं. यह तो कुछ सत्ताधारियों की राजनैतिक मजबूरियां हैं जो इस तरह की छवि बनाती हैं कि अमेरिका, इंग्लैण्ड या फ्रांस जैसे देश एकभाषी हैं. अमेरिका में अनेक भाषाएँ हैं जिन्हें सांस लेने की बहुत जगह नहीं पर फिर भी वह ज़िंदा हैं अपनी बहुभाषिता एवं अपनी अस्मिता बनाए हुए. सरकारी गिनती के अनुसार जर्मनी में 25, फ्रांस में 24, स्पेन में 16 व इंग्लैण्ड में 13 भाषाएँ बोलीं जातीं हैं. पापुआ न्यू गिन्नी जैसे छोटे से देश में 800 से अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं. और यह सब एक दूसरे से सदा अलग थलग नहीं रहती हैं. हमारे यहाँ तो मणि प्रवाल में लिखने की बहुत पुरानी परम्परा है जिसमें तमिल व संस्कृत में मिलाकर लिखा जाता था. आज की दुनिया में आप एक नई तरह का मणि प्रवाल अपने चारों तरफ देख सकते हैं. बहुभाषिकता जिसे मैं अब अनेकधारा कहता हूँ मनुष्य होने की पहचान है. यही नहीं अनेकधारा से ही हमारी मानवता परिभाषित होती है. शिक्षा व समाज के लिए भाषा की यह परिकल्पना कितनी आवश्यक है इसकी चर्चा फिर कभी.
*बहुभाषिता के स्थान पर यह शब्द अधिक सार्थक है. साभार ‘अनेकधारा’ संस्था से.

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