कविताएं – अरुण कमल

कविताएं – अरुण कमल

जो देश मुझे इतना प्यारा था

जो देश मुझे इतना प्यारा था

वहाँ इतनी धूल है पत्तों पर मानों बरसों से बारिश नहीं हुई
और रात में भी रोशनी और हलचल से भरी सड़कें इतनी स्याह सुनसान जैसे बरसों से कोई कभी रहा नहीं
कभी कभी लगता है मेरी आँख कमजोर हो रही है
एक जाला मुझे घेरता जा रहा है
लेकिन जब अचानक कोई नज़र आता है पुराना
और उसे नाम से पुकारता हूँ वह चला जाता है बिना ताके
जैसे कि बदल गया हो उसका नाम

टूट चुके हैं पुराने शिवाले अश्वत्थ और देवीस्थान
एक विशाल गुम्बद है चौंध और शोरों से गूँजता
वहीं बस गया है देवों का नया नगर
कहाँ होगी शिवमणि जिसने देह के पहले स्पर्श पर कहा था वह संन्यासिन बनेगी
उसे जब भी देखता भीतर से छोटा महसूस करता उँगलियाँ अँगूठियों से कसे
घूमता फिर रहा हूँ गलियों तिराहों से
अब कहीं भी न तो टमटम हैं न बैलगाड़ियाँ न धूल के रास्ते
फिर भी इतनी धूल है चारों तरफ
आखिरी बस सात बजे जाती है
मुझे अभी अपना पहला स्कूल देखना है
बाज़ार के पीछे आम के बगीचे के किनारे
लेकिन अब वहाँ कुछ नये बने उदास कमरे हैं और मेरे बचपन के टूटे धँसे खपरैल छप्पर
मेरे सब साथी चुपचाप गुजर गये या बदल ली जगह
कोई अब वहा् नहीं मरता जहा् जन्मा
एक हरि रह गया था पुश्तैनी दुकान सँभालता
मैं गया वहाँ और उसे देखकर खुद अपनी देह पर पश्चाताप हुआ
मैंने तै किया जिसे तुम नया नया देख चुके हो उसे कभी बाद में मत देखना
नये दृश्य पुराने चित्रों को पोत देते हैं

तो अब लौटें और पकड़ लें अंतिम बस
वही पुरानी बस उसी पुराने वक्त पर नये मुसाफ़िरो से भरी
पक्की सड़क पर

दुविधा

अब जब मुहूर्त आ गया है क्यों मेरा मन हिचक रहा है
क्यों यह जानने के बाद—
क्यों लग रहा है वो सब गलत था शुरू से
मैं कितना निश्चिंत था उसके साथ और वह भी
खोल के अंदर हरे दाने सा कितना आर्द्र आशान्वित
सृष्टि के सारे उपमान मैंने याद किए उसके साथ
और धुनता फिरा हवा हवा को
लगा हम परे हैं देश के काल के
हम ओस थे हम भोर थे हम सृष्टि के पहले जल

लेकिन अब यह दुविधा क्यों
क्यों यह जानने के बाद कि उसका परिवार भी शरीक था
उस हत्याकांड में?
क्यों बस इतना जानने से ऐंठने लगे हैं मन के बुरादे
दिशाओं को बदलते और उठती हुई देह ढह रही है बार बार
और लगता है सब कुछ ख़त्म हो जाएगा
मैं अपनी कोठरी में घुसूँगा,लोहे की छड़ों वाला दरवाज़ा लगेगा,चाभी घूमेगी और सब खत्म?

बाहर

निकलो बाहर,उसने धकेलते हुए कहा और
दरवाजा भिड़ा लिया
रात थी ठंढ और शीत से भारी, सड़कें खाली, दरवाजे बंद
कहाँ जाऊँगा अनजान शहर में इस रात
खड़ा रहा कुछ देर देखता वह दरवाज़ा जो अभी तक
मेरी ओट था अँधेरे ठंढे अनजान शहर में;
मैं एक तरफ़ मुड़ा, नहीं मालूम किधर
ऐसी रात और ठंढ में भी मिल जाते हैं कुछ कुत्ते बीच सड़क पर खेलते
कुछ भिखारी कुछ खानाबदोश कुछ मनमौजी लड़के एकाध औरतें बिजली खंभों की ओट में
रात के नागरिक
मैं वहीं बैठ गया जहाँ ईंट के चूल्हे में लकड़ी की आँच थी
आग से कितनी नजदीकी है देह की
अचानक मैं सड़क पर आ गया था
अचानक आराम और गरमाहट से बाहर
अचानक मेरे लिए कोई जगह नहीं इस संसार में
कूड़े के लिए भी होती है जगह पर मैं गिर गया हूँ पृथ्वी से छूट कर असीम हिम अंधकार में
मेरा जीना मेरा मरना सब दूसरों का खेल
मैं अनचाहा गर्भपात

कहाँ जाऊँ अब इतना घना कुहासा इतना अँधेरा
रात का वह पहर जब सबसे ज़्यादा रात होती है
और मैंने मौत का पहला स्वाद चखा
उस सूखे कुँए के पास बस याद रह गयी है जल की
और एक नाग का जहर!

तलाश

मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती
क़र्ज़ इतना चढ़ गया है कि उम्र बीत जाएगी चुकाते चुकाते
माँ के रोग में लिया था फिर आदमी का काम बंद था
न माँ बची न आदमी ही साथ रहा
अब तो दोनों बच्चे भी समझो बंधक ही हैं यहाँ
रास्ता क्या है
दिन रात खटती हूँ बच्चे भी लगे रहते हैं
न कहीं आना न जाना बहुत हुआ तो मालकिन के साथ फूलडोल लिए मंदिर तक
पेट पोसा रहा है देह भी कहने भर अपना है

बोलो मैं क्या करू्ँ
जानती हूँ तुम सँभाल लोगे
देह हाथ ठीक है तो कहीं भी गुजर हो जाएगा
पर निकलूँ कैसे , वो बच्चों को साथ निकलने नहीं देती
और मैं उन्हें छोड़ नहीं सकती
देह का नाता भी ग़ुलामी है कैसे छोड़ दू्ँ
तुम्हारा भी तो अब कोई नहीं महामारी के बाद—
हम दोनों बंद घरों की छत से देख रहे हैं एक दूसरे को—
कितना दिन और देखें , यह खोह कभी भरेगा नहीं गहरा होता जाएगा भीतर भीतर और एक दिन धँस जाएगा मुझको लिए दिए
फिर बच्चों का क्या होगा नहीं जानती
लड़का तो कुछ न कुछ कर लेगा,लड़का है, उसकी ज़्यादा फिकिर नहीं
लेकिन बेटी की चिंता है,इन लोगों का ज़रा भी भरोसा नहीं
यही सोचती हूँ
तुम पर एतबार हैं फूल पत्ती से लेकर पालदारी भी कर लोगे
लेकिन मैं तो नधी हुई भैंस हूँ
पूरा जीवन जेलखाना घूमते रहो उसी में

चलूँ, मालकिन आती होगी तुमको भी अभी बहुत काम बाकी है—
यह गुलाब कितना लाल है—
नहीं फूल मत दो पता चल जाएगा
नहीं, फूल तो छुपा लूँगी पर सुगंध का क्या करू्ँगी मेरे सुग्गा?

सबसे छोटा दिन

आज सबसे छोटा दिन है।
आज सुबह से एक ही घोड़ा ले निकला है दिनेश।
कम काम का सुस्ती भरा दिन।जल्दी शाम की लालसा भरा दिन।
जल्दी छुट्टी की घंटी का दिन।
प्रकाश का कम,तम का अधिक यह दिन।
घना कुहरा है सुबह से।कुछ कुछ धूप है।
बड़ी होगी रात।बड़ी और अघोर अँधेरी।
तेज पछया की रात।सुनसान रास्तों की रात।धूल भींगने की रात।
ऐसे सन्नाटे की रात कि दूर किसी घर में बच्चे का रोना भी पास लगे।
किसी घात किसी हत्या की रात।
सट के सोने की रात।देह के जर्जर होने की रात।
मौत को पास बुलाती हुई रात।
ओस बरसाती हुई उदार रात।
आज सबसे छोटा दिन है।एक भूरे पिल्ले सा दिन।
लगातार देग में चाय की भारी भाप का दिन।
खेल बीच में रोक घर लौटने का दिन।
सबसे छोटी छायाओं का दिन।
अपना हिस्सा अगले दिन को भेंटता हुआ प्यारी फूलगोभी सा दिन।
आँवले के हरित नाद से भरा हुआ
सबसे छोटा दिन भी दिन ही तो है ।

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