संस्मरण : ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला –  मधु कांकरिया  

संस्मरण : ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला –  मधु कांकरिया  

 

 

 

इस सदी की सबसे खूबसूरत तस्वीर 

यह तस्वीर अफगानिस्तान सेना के एक जाबांज शहीद मेजर अब्दुल रहीम की है। वर्ष 2020 में काबुल में हुए एक बम विस्फोट में मेजर अब्दुल रहीम शहीद हो गए थे। बम निरोधक विशेषज्ञ मेजर अब्दुल रहीम ने 2012 में बम डिफ्यूज करते समय अपने दोनों हाथ खो दिए थे। करीब दो हजार से अधिक बम डिफ्यूज करने वाले अब्दुल को तीन साल बाद भारत में नए हाथ मिले। ये हाथ उन्हें कोच्चि के टीजी जोसेफ से दान में मिले थे। जोसेफ सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड हो गए थे। उनके परिवार ने अब्दुल रहीम की मदद के लिए अंग दान किया था। कोच्चि में अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में डॉ. सुब्रह्मण्य अय्यर के नेतृत्व में डॉक्टरों ने हाथों की प्रत्यारोपण प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। ठीक होने के बाद अब्दुल फिर से सेना में शामिल हो गए थे।तीन धर्मों का समावेश था उस प्रत्यारोपण प्रक्रिया में। हाथ दान देनेवाला ईसाई ,पाने वाला मुस्लिम ,लगाने वाला डॉक्टर हिन्दू।

 

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जाते जाते यह भी देखना था। ढाका से अब दाना पानी उठने के दिन आ गए थे। हमने सोचा था कि इस बार ढाका में दुर्गा पूजा देखने निकलेंगे। ढाका प्रवास की अंतिम पूजा। पर 7 सितम्बर ,22 की एक खबर जो ढाका के प्रतिष्ठित अखबार ‘प्रथम आलो ‘ में छपी थी उसने हमें सोचने को मजबूर कर दिया कि हम पूजा देखने जाएं या नहीं।

खबर इस प्रकार थी – नयी आतंकवादी गतिविधियों में संग्लग्न  आठ युवाओं ने हिजरत के नाम पर घर छोड़ा। लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी के पास खबर थी कि प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन ‘ अंसार अल इस्लाम ‘ से प्रेरित होकर ये सातों युवा जो 17 से 23 वर्ष की उम्र के हैं जिनमे अधिकतर कॉलेज छात्र हैं ,और उनमें से कुछ कुमिल्ला में रहते थे ,कुछ सिलहट में रहते थे ,इन्होनें अपना घर छोड़ दिया था ।इनमें से एक तो ,निहाल अब्दुल्लाह कुमिल्ला के सरकारी कॉलेज के  कक्षा 12 का छात्र है। आठवें छात्र की पहचान स्थापित नहीं हो पायी है। इन युवाओं के माता पिता ने बताया कि सभी २३ अगस्त से एक ही समय से अपने घरों से लापता हैं। इन सातों में से छह के परिवार वालों ने मिसिंग की रिपोर्ट लिखवाई है। इसमें दो युवाओं के पिता ने यह भी जानकारी दी है कि इनके पुत्रों का सम्पर्क तब्लीगी जमात के नेताओं से था। जिनसे मिलने वे चिल्लाह जाते थे। एक के पिता ने बताया कि उनका पुत्र कोचिंग सेंटर से तब्लीगी का भाषण सुनने गया और फिर लौट कर नहीं आया।

लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी ने अपनी तरफ से अलर्ट जारी कर दिया है। यह खबर इसलिए भी चिंताजनक थी कि छह साल पहले ढाका में जो भयंकर आतंकवादी हमला हुआ था ,होली आर्टिसन बेकरी में ,उस समय भी ठीक इसी तरह कुछ कॉलेज के छात्र घर से मिसिंग थे। बाद में उन्हीं छात्रों ने होली बेकरी के खूनी खेल को अंजाम दिया था। बांगला देश के इतिहास में उससे भयंकर जेहादी हमला गैर मुस्लिमों पर पहले कभी नहीं हुआ था  जिसमें 24  विदेशियों को मार डाला गया था। इस बार जो युवा लापता थे वे सभी अंसार अल इस्लाम के सदस्य हैं। अंसार अल इस्लाम खुद को अल कायदा का बांग्ला देशी विंग कहता है।

अल्पसंख्यक होना गुनाह हो गया है आज की दुनिया में । पिछले सप्ताह अफगानिस्तान में तक़रीबन सौ से अधिक हाईस्कूलिया बच्चों को बम ब्लास्ट में मार दिया गया था । ये बच्चे अल्पसंख्यक समुदाय से थे। इनमें लड़कियों की संख्या अधिक थी।

इन दो ख़बरों ने फिर एक बार जो भी सत्य और सुन्दर बसा था आत्मा में उसे पतझड़ के पत्तों सा झाड़ दिया।

 

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लेकिन दुर्गापूजा तक आते आते हमपर इन खबरों का प्रभाव जैसे घटते घटते लगभग शून्य पर आ गया था। हम निकल ही  गए  पूजा देखने।  बनानी का पूजा मंडल। हर जगह चाक चौबंद सुरक्षा। दोनों ही समुदाय के लोग।सजे धजे ,बने ठने। एक तरफ खाने और आइसक्रीम के स्टाल। लगा संस्कृति धर्म से ज्यादा ताकतवर है।लगा नहीं कि मुस्लिम देश में हूं। ढाका की दुर्गापूजा में धार्मिकता का आधिक्य था जबकि कोलकाता की दुर्गापूजा में उत्सवधर्मिता का। उत्सवधर्मिता का आलम यह कि बड़े बड़े होर्डिंग्स लगाने के लिए बड़े बड़े पेड़ों को काटने से भी कोई गुरेज नहीं। एक डेढ़ किलो मीटर के अंदर चार चार पूजा। करोड़ों का खर्च ,क्लबों के बीच प्रतिस्पर्धा !

उत्सवधर्मिता के साथ वहां  की पूजा में सर्वधर्म समभाव का भाव भी शामिल था। पिछले साल कोलकता के श्री भूमि स्पोर्टिंग क्लब द्वारा दुबई के बुर्ज खलीफा के मॉडल पर दुर्गापूजा का पंडाल बनाया गया। इस साल दुर्गापूजा का पंडाल वैटिकन सिटी की शक़्ल में बनाया गया है.तो उससे ने से भी पहले पशुपतिनाथ के मंडित की शक्ल में बनाया गया था। यही तो पश्चिम बंगाल की ताक़त है..”सृष्टि रूपेण संस्थिता”.

कोलकाता की एक विशेषता यह भी है कि वहां धर्म और कलाओं का सम्मिलन है, जो धर्म के सौंदर्य को सार्वभौम बना देता है।  इसलिए वहां दुर्गा देवी से ज्यादा एक उत्सव है – सामूहिकता का उत्सव। वहां दुर्गापूजा जन उत्सव है। इसमें प्रत्येक परिवार आर्थिक चंदा देता है.प्रत्येक मंडप के आसपास मार्क्सवादी साहित्य की बिक्री की दुकानें लगी होती हैं। विभिन्न दलों के स्टॉल भी हैं जिनमें इन दलों के नेता स्थानीय जनता के साथ संपर्क-संबंध बनाने का काम करते  हैं। इस आयोजन में कम्युनिस्टों से लेकर कांग्रेसियों की शिरकत सहज देखी जा सकती है।दुर्गापूजा के मौके पर की गयी खरीददारी पर पश्चिम बंगाल का समूचा बाजार टिका होता है। अरबों-खरबों रूपयों की आम जनता खरीददारी करती है। इस अर्थ में दुर्गापूजा संस्कृति,सभ्यता और बाजार का परमानंद है। जबकि ढाका की  दुर्गा पूजा में धर्म और थोड़ी संस्कृति का सहमेल है।

 

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चल खुसरो घर आपने !

लौट रही हूँ अपने महबूब देश । पर क्या सचमुच वो देश बचा हुआ है मेरे सपनों के देश के रूप में ?क्या सचमुच धरती पर बचा हुआ है कोई ऐसा देश जो आपमें  यह अहसास भर दे कि हम सभी एक हैं – अपनी धरती के लोग ! एक ही हवा ,माटी  और पानी के हिस्सेदार !

आते आते महमूद भाई ने पूछा – क्या लेकर जा रही हैं आप हमारे मुल्क से ?

क्या कहती ,कभी लगा ही नहीं कि गैर मुल्क में हूँ। जब भी अपनी तुला पर तौला ढाका को ,विशेष परिस्थितियों को छोड़कर इसे अपने देश सा ही पाया। गयी रात बंगलादेश संग्राम पर एक मार्मिक फिल्म 1971 देखी थी जिसे सर्वश्रेठ नेशनल अवार्ड भी मिला था ,जिसमें दिखाया गया था कि 1971 के हमारे 70 जांबाज सैनिकों को बंदी बनाकर पकिस्तान ,दुनिया से ,रेडक्रॉस से ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन .. सबसे छिपाकर अमानवीय परिस्थितियों में उन्हें पकिस्तान की भिन्न भिन्न जेलों में ठूंसा हुआ था। अपना देश उन्हें भुला चुका था। दुनिया की निगाह में वे मर चुके थे। एकबार जब रेड क्रॉस ह्यूमन राइट्स के साथ मिलकर किसी की शिकायत पर पाकिस्तानी जेलों का मुआयना करने आती हैं तो उन सब को चकाला जेल में रख दिया जाता है जहाँ उनको छिपाया जा सके।१४ अगस्त का दिन है ,जेल में पकिस्तान की आज़ादी के जश्न का माहौल है। मौके का फायदा उठाते हुए उनमें से छह जांबाज सैनिक  किसी प्रकार चकाला कैंप के जेल से भाग खड़े होते हैं। घटनाओं के घात प्रतिघात के संयोग से वे पकिस्तान की एक मशहूर गायिका की गाडी का इस्तेमाल करते हैं । गायिका को जब पता चलता है कि वे pow हैं तो वह उनसे गुजारिश करती है कि वे उसे बेहोश न करें ,वह उनके लिए रेड क्रॉस से बात करेगी। जरूर बात करेगी। जब भारतीय कैदी उसका सहजता से यकीन नहीं करते हैं तो वह कहती है – हो सके तो मेरे मुल्क से थोड़ा सा यकीन ही लेते जाओ।

मैंने भी उनके शब्दों में अपने शब्द जोड़ते हुए कहा – मुट्ठी भर भाईचारा ,चुटकी भर माटी और भरोसा लेकर जा रही हूँ आपके मुल्क से। बांग्ला देश जिंदाबाद !

‘हिंदुस्तान  जिंदाबाद !’ जवाब देते हैं महमूद भाई।

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विदा मेरी देशी राग ! मेरी नन्हीं देवियां ! मेरे अपने चित्त का प्रतिबिम्ब तुम दोनों !जब जब तुम बजती ,यहाँ की धरती ,आसमान ,चाँद  तारे सब अपने बन जाते ! हवाएं ठंडी हो जाती .फूल खुशबू देने लगते। तुम्हारी घनी सतरंगी छाँव में मेरा बिगडा मन मिजाज संभल जाता। तुम धरती का नमक ,तुम मेहनत की महारानियाँ ! हमारे जीवन पथ को बुहारने वाली तुम!अब शायद ही फिर कभी फिर मिल सकूं तुम दोनों से। जा रही हूँ तुम्हारे कर्जे के साथ .भर रखी है मैंने अपनी झोली तुम्हारी हंसी के फूलों से ,जब कभी उदास होगा मन ,खेला करूंगी इन्हीं हंसी के फूलों से ! घूम आया करूंगी स्मृतियों  की इन्हीं बस्तियों में !

विदा ढाका! मेघेर ढाका ढाका (मेघों से घिरा ढाका ) !मेरे बंगाल का ही प्रतिरूप ढाका ! मेरे नायकों की जन्मभूमि ! साझी स्मृतियों और साझे सपनों का ढाका !ढाका और चटगांव के बिना भी अधूरी  रहेगी  भारत की महागाथा।

नहीं जानती कि तुमने मुझे कितना रचा ,तराशा और बदला ।बस इतना भर जानती हूँ कि मैं ही ढाका में नहीं रही तुम भी मेरे भीतर रहे ,मेरे मन के भीतर। थोड़ी बहुत ढाका तो वैसे भी मैं हो ही गयी हूँ। बेटा तो कई बार चिढ़कर कहता भी है कि तुम्हारी हंसी ढ़ाकाई होती जा रही है।

कितनी विचित्र बात कि बस आधे घंटे की हवाई यात्रा और मुल्क बदल जाएंगे। तुम अपने वतन में रह जाओगी और मैं उदास हवाओं के उसपार तथाकथित अपने वतन में।बदल जाए वतन , माटी तो फिर भी एक ही रहेगी हमारी ! जमीन पर खिंची इन रेखाओं का खेल हम क्यों माने ? मालिक ने तो हमें एक ही धरती दी थी ! इसकी आंच ,मिटटी और हवाएं सदैव रहेगी याद मुझे !

मैं संगीत का वह राग हूँ जो सरहद को नहीं मानता है ,जो जहाँ भी बजता है बस एक जैसा ही बजता है। काश ! हम एक ही वतन के होते ! तुम हिंदुस्तान की होती या मैं बंगला देश की होती या प्रवासी परिंदे ही होते हम तो यूं न बिछुड़ना पड़ता हमें। बहती हवाओं और बहते पानी की तरह कभी बहते बहते आ जाना मेरे द्वार भी !तब जब तुम आओगी देखोगी कि मैं खुद को तुमसे बतियाते देख रही हूँ।

देखो ये हवाएं भी चुपके से गुनगुना रही हैं ,

“धीरे चल रे

कहरा

देखी लेबै

बाबुल के बहियार”(धीरे धीरे चल कहार ,जिससे देख लूँ  बाबुल के खेतों को )

खुली हुई है गाडी की खिड़की ।  खुली ही रहने देती हूँ मैं ,सहला रही है मुझे  यहाँ की धूल ,माटी और पुरवैया । आंसुओं की झिलमिल के पार देख रही हूँ इस माटी को , फिजाओं को,ऊंचे ऊंचे दरख्तों को,हिलते पत्तों को  ।सुन रही हूँ इन बहती हवाओं को ।इंशाअल्लाह ! जैसा छोड़ के जा रही हूँ वैसा ही मिले मुझे ढाका ,नहीं बिके  इसकी धूप ,इसकी हरियाली,इसकी नदियां ,इसकी पहाड़ियां। बेटा कहता है अब दुबारा  नहीं आना होगा ,शायद नहीं हो लेकिन मैं अपने सपनों को दाना देती रहूंगी। इसी माटी में मेरी पोती सो रही है।गहरा संबंध है इस धूल माटी से… कभी शायद फिर लौट पाऊं इन फिजाओं में जैसे लौटती हैं पत्तियां पेड़ों पर। उड़ती है कोई तितली ख्यालों की ,कि तभी बेटे की आवाज़ गूंजती है – बंद करिये खिड़की के ग्लासों को,कितनी धूल आ रही है भीतर।

मैं सुना अनसुना कर देती हूँ। और जल्दी जल्दी जितनी हो सके भर लेती हूँ इन हवाओं को अपने भीतर।

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टिक टिक बीत रहा है समय। सुन रही हूँ अपने को ,अपने एकांत को जो बरस रहा है  बाहर ,पानी की तरह टप ! टप !

फिर भींग रही है पलकों की झालर !

समझ नहीं पाती कि ढाका में मैं हूँ या मुझमें है ढाका।

संस्कृति का रखवाला !

विचारों का संग्रहालय !

भरोसों का गठबंधन !

आधुनिकता की आब  और परम्पराओं की ताब वाला ,

युग युग तक जीओ मेरे ढाका !

कभी व्याकुल हो उठूँ तुम्हारी यादों में तो थाम लेना मुझे बांह फैलाकर !

नहीं जानती कि ये मेरी दुआएं थीं या थीं अजान ! याद आ रहे हैं अमीर खुसरो जो कह गए थे अपनी रंगरेज़िन से -ऐसे चढ़े इसका रंग कि कभी छूटे ही नहीं..धोबिया धोए चाहे सारी उमरिया…सही ,ऐसी गाढ़ी रोशनाई से लिखा गया है ढाका मेरे जेहन में। काश ! इसके गौरव में एक ईंट अपनी तरफ से मैं भी लगा पाती। ढाका ! तुम हमेशा रहोगे मेरे मन के आकाश में ,मेरे स्वप्न समय में जैसे भोर के उजास में रह जाता है थोड़ा – सा चन्द्रमा !

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