अम्मा जी आसमान बन चुकी थी। धरती पर लावारिस सी पड़ी उनकी डायरी पर एकाएक मेरी नज़र पड़ गयी थी। डायरी का पहला पृष्ठ खोला। उसके बीचो बीच लिखा हुआ था ;
‘वापस लेती हूँ उन माफियों को जिन्हें मुझे परिवार से मजबूरन मांगनी पड़ी ,पर सच्चे मन से मैंने कभी नहीं मांगी वे माफियां क्योंकि मेरी जिन आवाज़ों को दबाया गया वे सिर्फ़ सच्चाइयों की बुलंद आवाज़ थी , लेकिन दवाब में मुझे अपनी सच्ची आवाज़ के लिए भी ‘सॉरी ‘ कहना पड़ा लेकिन वे सिर्फ़ मेरे अल्फाज थे रूह से निकले जज्बात नहीं। ‘
फिर जिया जमीर का एक शेर था ;
दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ
देखिए रूह से कब दाग़ पुराने जाएँ
डायरी क्या कुछ आत्मस्वीकृतियाँ थी। रूह पर लगे कुछ पुराने दागों का जिक्र था जो अनंत की राह पर उड़ने से पहले गाहे बगाहे लिखे गए होंगे । अम्मीजी मतलब मेरे पति की माँ । मैं डायरी को कचरे में फेंकने जा ही रही थी कि डायरी के सुनहरे कवर ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया। कवर को देखते देखते उत्सुकतावश मैं डायरी को उलटने पलटने लगी कि मुझे अपना नाम दिख गया। अब तो मैं जैसे पतंग देखते देखते आसमान देखने लगी थी ।
मैं उत्सुक हो उसे पढ़ने लगी। पढ़ते ही स्मृतियों के ठहरे जल में जैसे एकाएक भूचाल उठ गया , लहरें मचलने लगीं ।
पहले पृष्ठ पर ही लिखा था – गाढ़ी रोशनाई से लिखी यह डायरी, डायरी नहीं, मुहब्बत से भरा मेरा वो रेशमी रुमाल है जो हर दिन मेरी आत्मा की जमीन पर लगे मेरे रोजमर्रा की जिंदगी के गर्दगुबार को पोंछ डालता था।
दूसरा पृष्ठ,
बचपन में कभी पढ़ा था – सत्य सदैव सुन्दर होता है। लेकिन ऐसा नहीं होता है। गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा सच है – झूठ,सबसे चटक रंग। जिंदगी में मेरे झूठ का रंग न होता तो हार जाती मैं वो जंग!
बदली तारीख में फिर लिखा था ,
धरती सपनों में खोयी हुई थी। पूरा संसार सो रहा था पर मैं जाग रही थी, डूबते सूर्य की उदासी मचल रही थी मेरे भीतर। दुःख का मोगरा महक रहा था था। बुढ़ापे में हर इंसान एक टेढ़ी लकीर हो जाता है पर मैं लगातार सीधी लकीर हो रही थी।
कुछ कटी लाइनों के बाद फिर लिखा हुआ था ,
काश मन का भी होता कोई घर तो रह लेती पल भर वहां। जानते हो क्यों ? क्योंकि इस दुनिया को समझते समझते और झूठ बोलते बोलते मैं पक गयी हूँ। मैंने आज फिर एक बार बोला ‘सॉरी‘ जो सिर्फ मेरे अल्फाज थे मेरे मन के जज़्बात नहीं, झूठ मूठ का वह सॉरी मुझे चाकू की तरह चुभ रहा था। मैंने गंगा से चिरौरी की – न समझे जाने की आदिम पीड़ा से गुजर रही हूँ गंगे! मेरे इस झूठ को अपने साथ बहा ले जा, इसका कोई भार मुझ पर न रहे!
एक जगह लिखा था – बेचैनियां और दुश्चिंताएँ कभी शांति से सो नहीं सकती इसलिए मैं भी आज जल्दी से ही उठ गयी और सोचने लगी क्या है जीवन? जीवन न समझे जाने की आदिम पीड़ा है! झूठ का गुलदस्ता है!
मेरे जीवन में सॉरी शब्द उसी तरह शामिल था जैसे जल में मछली, प्रेम में आवेग।
कुछ सॉरी मेरी आत्मा से निकले तो कुछ बेरूह सॉरी जिनका कोई मतलब नहीं था। ये वे सॉरी थे जो झूठ और सिर्फ झूठ थे जिन्होनें मेरी आत्मा को गढ़ने की बजाय मुझे आत्महीन ही ज्यादा बनाया।
यही यथार्थ है। अपने सही होने को नकारना ! अपने को नकारना !अपने इन झूठे सॉरी पर जब मैं दुखी होती तो मेरी सहेली मुझे समझाती – जब जिंदगी उस मुकाम तक पहुंच जाती हैं कि हम कह सकें कि हमें कुछ फर्क नहीं पड़ता , सही जानो कि तभी जिंदगी में फर्क पड़ता है.
लेकिन मैं जिंदगी को अपनी नज़र से देखने वाली , उस मुकाम तक न पहुंची थी न पहुंचना चाहती थी। यदि मैं कुछ कहूँ तो उसका मुझ पर फर्क पड़ता था और पड़ना भी चाहिए था। जीवन मेरा भले ही कितना भी साधारण क्यों न रहा हो पर मैं इसे पूरी ईमानदारी के साथ जीना चाहती थी। पर मेरी बिडम्वना यह थी कि मेरी जिंदगी का कुछ हिस्सा जिनसे जुड़ा था वे मुझसे अलग दुनिया के वाशिंदे थे – मी, माय और माइसेल्फ की दुनिया के नागरिक जिनका जीवन दर्शन था – मनी, मीडिया और मार्केटिंग।
इस कारण उस दुनिया में अपनी जगह सुनिश्चित करने जब जब मैं झूठ मूठ का सॉरी बोलती मुझे लगता जैसे मेरी रंगशाला का कोई रंग उड़ गया है।और इस प्रकार एक एक कर उड़ते गए रंग और जाल समेटने की बेला तक मेरी रंगशाला बेरंग हो चुकी थी। मन बेघर हो चुका था। पंख कमजोर और नाव जर्जर हो चुकी थी।
ऐसे में मेरी सहेलियां समझाती मुझे, उन्हें क्षमा कर दो जिन्होनें मुझे झूठ मूठ के सॉरी बोलने को विवश किया। यह भी कहा उन्होंने कि जिस जैन धर्म से हूँ मैं उसमें तो क्षमा को ही परम धर्म माना गया है। बल्कि उसके लिए एक दिन भी नियत है जब सब आत्मीय जाने अनजाने हुई अपनी भूलों के लिए ‘खमत खामणा’ कहते हैं। पर मुझे जैनियों का सवंत्सर पर्व जरा भी प्रेरित नहीं करता था। व्यवहार में वहां भी झूठ ही हवा की तरह फैला हुआ था – सिर्फ औपचारिक क्षमा याचना। जिनके हम सचमुच के गुनाहगार थे उनसे तो हम बात तक नहीं करते थे, घर में दिन रात पसीना बहाने वाली, घर को चकाचक रखने वाली बाइयों का, ड्राइवरों का, चौकीदारों का हर दिन हम दिल दुखाते थे पर क्या हमने कभी कहा उन्हें – सॉरी!
पर कोई मेरे भीतर दबे पड़े इन मोहनजोदड़ो को खोदे तो उसमें से निकलेंगे झूठे माफीनामे के उड़ते सूखे पत्ते।
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जाने अनजाने अम्मी जी किसी रहस्यमयी चिड़िया की तरह खरामा खरामा मेरे भीतर अपने पंख फैलाने लगी थी ।
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कुछ कविताओं के बाद फिर कुछ ऐसा लिखा मिला जो मुझमें दिलचस्पी जगा रहा था ;
सॉरी के इतिहास से भरे हुए हैं जिंदगी के पन्ने! दरअसल जैसे किसी हल्की चीज को जबरदस्ती पानी में डूबो कर रखें तो क्या होगा? जैसे ही दवाब हटेगा, चीज सतह पर आ जाएगी। मेरे साथ भी यही होता, जैसे ही बच्चों का दवाब हल्का पड़ता मैं अपने पर आ जाती, कुछ ऐसा कर बैठती कि बच्चों को असुविधा होने लगती, वे नाराज हो जाते या अबोला शुरू हो जाता। दिन बीत जाता, रात के ढलने की प्रतीक्षा जानलेवा हो जाती, भोर के दीये सी मैं बुझने लगती तो उस मारक अबोले की घुटन से बचने के लिए मैं कह बैठती सॉरी, ऐसी सॉरी जिसमें सिर्फ लफ्ज होते जज़्बात नहीं!
मन की मुंडेर पर स्मृतियाँ चुग रही है दाने! ऐसी ही एक स्मृति!
एक शाम ने सरगम रची। घर में नयी गाड़ी आयी थी।अब भला कौन ऐसी माँ होगी जो बेटे की इस उपलब्धि पर खुश नहीं होगी। हिसाब से जितना खुश होना चाहिए था मुझे , मैं हुई भी पर मुझे उस समय असभ्य हंसी आ गयी जब पुत्र और काबिल बहूरानी दोनों गाड़ी की मुंह दिखाई के लिए गाड़ी के मुंह पर स्वस्तिक बना, उस पर गुलाब फूल की माला चढ़ा भगवान् के यहाँ ले गए। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी। हद तब हुई जब पंडित जी संकरे से गलियारे में गाड़ी को इस प्रकार खड़ी करने को कहने लगे कि भगवान की मूरत का चेहरा और गाड़ी का अग्रिम भाग आमने सामने हो जाए। जिससे भगवान् जी गाड़ी को निहार लें और गाड़ी को अपना आशीर्वाद दे दें। इस सर्कस में सत्रह मिनट चालीस सेकंड और लग गए। मैं हाथों में नारियल लिए खड़ी थी , कि भगवान् की नजर गाड़ी पर पड़े तो नारियल की सद्गति हो। पास में ही दो कुत्ते कुत्ती मस्ती की पिनक में जमकर सहवास कर रहे थे, जिनके पीछे कई और कुत्ते भौं भौं करते कतार में खड़े थे , मैं अजीब सी आदिम लज्जा और संकोच से घिरी जा रही थी कि कहीं पुत्र और मेरी नजर एक साथ इस खुलल्मखुल्ले प्रेम दृश्य पर न पड़ जाए. विचार बेकाबू हो बंदर की तरह उछल कूद मचाने लगे इसलिए उतावली मचाते और झल्लाते हुए मैंने कहा – अरे इतने विराट भगवान् जिसने चाँद, सूरज, पर्वत, सागर और नदियां बनायी उन्होंने क्या पिद्दी सी गाड़ी नहीं देखी होगी ? छोड़ो यह मुंह दिखाई का चोंचला !
जैसे बिजली गिर गयी हो। सबके चेहरे पर काले बादल घिर आए। ललाट पर जाने कितनी सिलवटें! बेटे ने धीरे से दांत किटकिटाते हुए कहा – बिना रंग में भंग किये मेरी कॉमरेड माँ को चैन कहाँ पड़ने वाला था। उसने कहा और मेरे दिल में हाहाकार मच गया – या रब वे न समझे हैं,न समझेंगे मेरी बात ! बहुरानी ने कहा तो कुछ नहीं पर अपने गले की एक लड़ी मोती की माला को डुलाते हुए जिन तल्ख नजरों से घूरा मुझे कि मेरी तो दिमाग की नसें ही तड़तड़ाने लगी। भीतर फिर एक जंगल उगने लगा।
झर झर आँसू!
काश, इस मन से उस मन तक पहुंच पाती मैं!
रेत रेत बिखर गया मन! मैं फिर नहीं समझी गयी और पुत गया गोबर मेरी नवजात खुशियों पर! अपनी नजरों के नूर की नजरों से उतरना कैसा होता है! वे चढ़ती धूप, उनकी धूप से बचने के लिए मुझे छांव चाहिए थी। इस छाँव के लिए मैं गाड़ी के रूप लावण्य की प्रशंसा के पुल बाँधने लगी। वे निरपेक्ष रहे, बल्कि यह भी हुआ कि गुजरते पलों के साथ उनकी अदृश्य धिक्कार मेरी चीत्कार में बदल गयी। हे भगवान्! मैं कैसे भूल गयी कि उनका क्या दोष, वे तो बस अपने वक़्त के टुकड़ा थे। मुखड़ा थे। अपना अंश होते हुए भी अब हमारी मिटटी अलग अलग हो गयी थी। भूल गयी कि अब वे दो बच्चे बच्चे नहीं रहे थे वरन मेरी बगिया के दो ऐसे मदमाते फूल थे जो अपनी ही महक से बौराये रहते, दूसरों के विचारों की खुशबू से उनका कोई लेना देना नहीं था। हमारे खूबसूरत से घर में सबकी इज़्ज़त थी लेकिन विचारों की नहीं थी। वे किसी कोने में पालतू कुत्ते की तरह दुम हिलाते पड़े रहते थे। वैसे भी मैं घर की गाड़ी का अतिरिक्त पांचवां पहिया थी जिसकी परिवार को बहुत कम जरूरत रह गयी थी। लेकिन एक माँ के भीतर जाने कितनी माएँ समायी रहती हैं कि भीतर की ममतामयी माँ उन दारुण और टूटे हुए पलों में कसमसा उठी – क्या जरूरत थी ज्ञान पेल रंग में भंग करने की। कनखियों से देखा, मेरी चोंच के निशान बेटे के चेहरे पर साफ़ नजर आ रहे थे!
दिन भर बेचैन रूह के परिंदे सी आत्मधिकार के पोखर में डूबती उतराती रही। जब जिंदगी बंदगी बन जाए तो गले में फांस की तरह चुभने लगता है अपना ही कहा अनकहा। कुछ पलों बाद ही समझौते की लड़ी पिरोते हुए, दिल में सॉरी का नक्शा बनाते हुए, शब्दों की फिजूलखर्ची से बचते हुए मैंने कहा – सॉरी !
माफीनामा तो बनता ही था!
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एक और दाना !
बहूरानी को दिन चढ़े थे। देश में कोरोना चढ़ रहा था।जिंदगी के रंग और स्वप्न लगातार उतर रहे थे।हर घर पर जैसे कौआ ही बैठ गया था। ऐसे में एक सुहानी शाम बेटे ने कहा – हमारा खाना नहीं बनेगा।
- पर क्यों? किस ख़ुशी में!
- हम बाहर, खाना खज़ाना में डिनर लेंगे।
- ऐसे कोरोना समय में? थोड़ा विरक्त हो कहा मैंने।
- अम्मा, मैंने रिसर्च कर लिया है, वहां सब ठीक है। सुलझा दिमाग फिर उलझे दिमाग से उलझ गया। मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया।
- रिसर्च? खाना बनते देखा है क्या ? खाने की भी रिसर्च होती है क्या ? अरे कुछ दिन नहीं जाओगे तो क्या हो जाएगा , बहू रानी को इस हालत में यूं भी बाहर का नहीं खाना चाहिए फिर कोरोना ऊपर से। उसने फिर कहा ;
- मम्मा, वहां सबकुछ हाईजिनिक है। उनकी फरर फरर अंग्रेजी के सामने अक्सर मेरी हिंदी शर्मा जाती थी इसलिए मैंने भी दमक कर कहा;
- मैन बिलिव्स व्हाट ही लव्स टू बिलीव। (आदमी वही विश्वास करता है जो वह करना चाहता है)।
बस, अब तो घर में नि:शब्द कुहराम ही मच गया।घर अब घर नहीं गर्म तवा था। मैंने कितनी बड़ी गुस्ताखी कर डाली थी , कामयाब जोड़े को हिदायत दे डाली! अब तो जो मैंने नहीं कहा था वह भी उनके द्वारा सुन लिया गया था।
कितना मजेदार समां था। जितना बड़ा घर, उतनी ही बड़ी मनाही सवाल करने की और भूल से कर लिया तो उतनी बड़ी सॉरी! जैसा देश था वैसा ही मेरा घर हो गया था। आप कहीं भी सच्ची बात नहीं कह सकते थे। ऐसे में मेरा पथ बुहारने वाली मेरी निडरता भी मेरा साथ छोड़ भाग खड़ी हुई थी। इसलिए जो कहा नहीं गया था वह भी सुन लिया गया था। एक उदास हंसी और साथ ही जेहन में चमक गए बशीर बद्र – जो कहा नहीं वो सुना करो / जो सुना नहीं वो कहा करो। मैंने इस शेर की पहली पंक्तियों को दिल में उतार लिया और वो सब भी सुन लिया जो उनकी सज्जनतावश मुझे कहा नहीं गया था।
वे गए तो नहीं पर घर में जैसे बारूद बिछ गया। घर की दीवारें भी जैसे रूठ गयी मुझसे। मेरी बनायी हुई चाय तक नहीं पीयी सुपुत्र ने। सदैव की तरह मेरी आँखें तो बदली सी नहीं ही बरसी पर यह जरूर लगा जैसे मेरी समूची पृथ्वी पर वे दोनों ही फैले हुए हैं, यह भी कि बुढ़ापे की भी अपनी पराधीनता होती है जो इन दिनों दिनों दिन अपना जलवा दिखाने लगी थी। टैगोर का एकला चालो भी बस कहने की ही बात लगी। असली बात दिल की यह चिंता थी कि बिंदु भर जगह जो थी मेरे पास, आज की घटना के बाद कहीं उसमें भी न हो जाए सुराख!
फिर जिस तेवर से गया वह कि मेरे दिन का सारा उजाला और रात की सारी चांदनी भी लेता गया अपने साथ। गर्म गर्म सांस भरती घायल शेरनी सी अपने बंद कमरे में पूरे तेईस घंटा और सत्ताईस मिनट चक्कर काटती रही। रिश्तों की माया ने मन को सांकल में जकड रखा था। किसी तरह खुद को दिलासा दिलाती रही कि जब बुद्ध और गाँधी तक यहाँ चैन से नहीं मर पाए तो मेरी क्या औकात। वैसे भी अपने आप में मैं थी भी क्या, सिवाय एक शून्य के। काश ! कालिदास की तरह मैं भी किसी बादल को दूत बना भेज देती जो बेटे के कान में कह देता – सॉरी और मैं कहने से बस जाती। पर ऐसा न हो पाया। अबोले का दंश इतना तीखा और कुरकुरा था कि मेरा अंश अंश खुद से ही विद्रोह कर बैठा। अंतत: अपनी औकात का अपने हाथों ही गला घोंटते दूसरी शाम सॉरी बोलने की छोटी सी मानसिक रिहर्सल के बाद संधि पत्र पेश करते कहा – सॉरी।
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मुंबई की एक सुबह! एक दर्दनाक कविता!
बेटा – ममा, क्या तुमने हाउस मैनेजमेंट को फ्लैट नंबर 10 डी की आंटी के विरुद्ध कोई शिकायत दर्ज़ की है?
- हां एकदम! बहुत ही जालिम हैं वे?
- क्या किया है उन्होंने?
- उन्होंने अपनी बाई ऊषा के डेढ़ महीने के वेतन को देने से इंकार कर दिया क्योंकि ऊषा के हाथ से उनका एक मरियल सा कांच का गिलास टूट गया था जिसे वे इटालियन क्रॉकरी के सेट के बर्बाद होने से जोड़ रही थी। इसलिए मुझे मजबूरन उनकी शिकायत मैनेजमेंट से करनी पड़ी।
- क्या सबूत था तुम्हारे पास कि मैडम ने उसको डेढ़ महीने का वेतन नहीं दिया ? मेड झूठ भी बोल सकती है।
- वह अपने घर समेत चार घरों में काम करती है, उसने किसी पर भी यह आरोप नहीं लगाए। फिर उसने मुझसे नहीं कहा कि मैं उसकी मालकिन से उसका वेतन दिलवाऊं, वह तो अपनी दूसरी मेड को अपनी व्यथा कथा कह रही थी, यह तो मैंने सुन लिया फिर उससे खोद खोद कर पूछा तो सच्चाई सामने आयी, फिर उसके यहाँ काम करनेवाली दूसरी बाई से बात की तो उसने भी इसी सच्चाई की पुष्टि की कि उसने भी मैडम और ऊषा की बात सुनी थी।
- और इसी आधार पर तुमने लिखित शकायत ठोक दी ? जानती हो मेरे पास मैनेजमेंट की चार पेज की लम्बी शिकायत आयी है कि आप की माँ सोसाइटी में वैमनस्य फैला रही है झूठ का साथ दे रही है, वे या तो सबूत दें या अपने इस झूठे आरोप के लिए फ्लैट नंबर 10 की मैडम से माफ़ी मांगे ! कितनी बार तुमको समझाया है मम्मा कि जितना मदर टेरेसा बनना है बनो ,लेकिन घर से बाहर ! घर में चिल करो। अब लिखो छोटा सा माफीनामा !
- वाह ! इसे कहते हैं उल्टा चोर कोतवाल को डांटे ! मैंने कोई गलती नहीं की ,क्यों मांगू माफी ?स्वर्ण से पीले पड़े इन चेहरों को श्रम से पीले पड़े चेहरे कहाँ दिखते हैं !
- सवाल बहुत करती हो तुम मम्मा ! कहते हुए उस मधुर सम्भाषण पर विराम लगा अपने रिबॉक के जूते को ठक ठक ठक ठकाते वह यह जा वह जा !
खुदा मेहरवान तो गधा पहलवान !
दिन निकला पर डूबा रहा मेरा मन। धधकता रहा कलेजा मणिकर्णिका के घाट सा। तपिश ऐसी की पूरा समुन्दर उंडेल दूँ तो भी न घटे।पचास मन के करीब बोला होगा कम बोलने वाला वो, मेरा खून, मेरी आत्मा का अंश लेकिन सारांश तीस ग्राम जितना भी न था। सॉरी कहूँ तो मन की सांकल और कस जाए , नहीं कहूँ तो बेटा! आत्मा झूठ बोलने से रोकती रही और जीवन सत्य बोलने से। भरपूर पाकर भी अतृप्त रह जाना शायद इसे ही कहते हैं। किसकी सुनूँ , मन की, आत्मा की या कि जग की। मैंने सॉरी नहीं लिखा।कर दिया खुद को हवाओं के हवाले।
रात आयी पर गयी नहीं। खाने के बाद घर के मुगल-ए-आजम ने पूछा – जवाब दिया मेल का? अभी तक नहीं? मिचमिची आँखों से मेरी ओर देखा उसने। संकोच का कोई छोटा सा बादल पल भर के लिए आकर बैठ गया माँ बेटे के बीच। उसे जबरन परे ठेलते हुए कहा उसने ‘अभी तक नहीं?अरे! लिखने से आप छोटी हो जाएंगी क्या?’
उसके महीन गुस्से की उफनती दाल में सॉरी के दो बूँद तेल डालते हुए कहा मैंने;
– तथास्तु !
लिख दिया माफीनामा। ओढ़ ली ख़ामोशी की चादर। समझा लिया खुद को कि सबकी जीवन दृष्टि एक सी नहीं होती। किसी के लिए वेद गड़ेरियों के गीत हैं तो किसी के लिए जीवन दृष्टि! पर क्या समझा पायी खुद को?
रात! धरती चांदनी की चूनर ओढ़े सो रही थी और मैं आग सी दहक रही थी। कोने कोने से आती एक ही आवाज़ – तुम कुछ नहीं हो! तुम कुछ नहीं हो!
झड़ गया जीवन से एक और रंग , बेसुरा हो गया एक और सुर।
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एक और मजेदार घटना फुदक रही है – लिखो , मुझे भी! मुझे भी!
बेटे का दोस्त और दोस्त की पत्नी आये थे, न्यू जर्सी से। बचपन से ही बेटे का दोस्त आता रहा था,इसलिए महफ़िल में मैं भी शामिल थी। उनकी शादी को आठ साल हो चुके थे। मैंने एकाएक पूछ लिया – कितने बच्चे हैं ? उन्होंने जवाब दिया ;
- दो बिल्लिया हैं। मैं ढपोरशंख! मैंने जवाब दिया ;
- बेटियों को बिल्लियां कह रहे हो, और हो हो कर हंस दी।
वे संजीदा हो गए।
- आंटी ! वे सचमुच की बिल्लियां ही हैं …बोलते हुए वे हँसे , एक सावधान हंसी। फिर उन्होंने मोबाइल से उनकी तस्वीरें भी दिखानी शुरू कर दी। कहीं उनके बिस्तर पर धमाचौकडी मचाती बिल्लियां , तो कभी स्टडी टेबल पर गंभीर छात्र की तरह बैठी कोई एक बिल्ली। तो कभी दूध पीती बिल्लियां। कभी अपने छोटे से साफ़ सुथरे जालीदार घर में आराम फरमाती बिल्लियां।
पता नहीं, मुझे क्या हुआ कि मुझे दूर बचपन में पढ़ी रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता याद आ गयी – श्वानों को मिलता दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं …मेरी यादों को भी उसी पल बदला लेना था मुझसे। मुझे सोमालिया, इथोपिया, कालाहांडी और बांग्लादेश के भूखे नंगे, कुपोषित, फुले हुए पेट और सींकिया हाथ पैरों वाले बच्चों की याद आ गयी। मैं थोड़ी अवसादित और थोड़ी रोमांचित हुई। फिर उनके चेहरे देख मैं भी हंस दी , एक असावधान हंसी। बहू थोड़ी नाराज हो कर बोली;
- मम्मा, बहुत सेक्रीफाइस किया है उन्होंने बिल्लियों के लिए। जब से पाली हैं उन्होंने बिल्लिया, कभी एक साथ घर से बाहर नहीं निकले कि बिल्लियों की रखवाली कौन करेगा? इसीलिए इतने साल भारत भी नहीं आये। इस बार आये, जब उन्हें एक अच्छा कैट केयर मिल गया और वह भी कितना मंहगा!
मैं फिर हंस दी, एक असभ्य हंसी। ओंठ भी शायद थोड़े विद्रूप हो टेढ़े हो गए थे। मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया;
- सेक्रीफाइस तो बिल्लियों का है। आपने तो जबरदस्ती उनकी आज़ादी छीन इंसानों के साथ रहने को मजबूर किया हुआ है उन्हें। सोचिये यदि आपको जबरन कैद कर बिल्लियों के साथ रहने को मजबूर किया जाय तो कैसा लगेगा आपको? काश किसी इंसान के बच्चे को ले लेते गोद तो उसका भी भला होता और बिल्लियों का भी।
मेरे बोलते न बोलते बम फूट गया। सबकी निगाहों की नुकीली नोक पर टंग गयी मैं। साफ़ तिरस्कार! राख में दबा आक्रोश फिर सुलग उठा। घर फिर देश बन गया। जिंदगी से फिर बाहर निकल जाना पड़ा मुझे। वैसे भी जिंदगी मेरी भीतर बाहर का खेल ही रही मुझसे। कुछ दिन भीतर रहती फिर कुछ निकल जाता ऐसा, घरवाले हो जाते नाराज और मैं फिर जिंदगी से बाहर!
अपने समय से पराजित मैं ! खुद को दिलासा देती रही – घर में रहते बेघर रहना ही तो निर्वाण है, मुक्ति है।
हा! हा! निर्वाण! मुक्ति!
दो दिन के दमघोंटू और जानलेवा अबोला के बाद मैंने बर्फ तोड़ी और कहा – सॉरी!
*****
आसपास सुन्दर रहे तो मन भी सुन्दर रहता है। धारा के विरुद्ध तैरने की ताकत भी रहती है। याद आए गाँधी जी। चम्पारण की घटना पर जज ने कहा – आप माफ़ी मांग लीजिये सब ठीक हो जाएगा। गाँधी जी ने कहा – मैंने आपका कानून तोडा है पर वह कानून ही गलत था इसलिए मैंने कोई गलती नहीं की, मैं माफ़ी क्यों मांगू? आपसे बढ़कर ईश्वर का कानून है मैं उसे मानता हूँ। जज की सहानुभूति थी गाँधी जी के साथ। लेकिन कानून अपनी जगह। लाचार जज ने गाँधी जी पर एक रुपये का जुर्माना लगा दिया – ठीक है माफ़ी न सही, आप एक रुपया का जुर्माना ही भर दें।
गाँधी – मैं वह भी नहीं भरूंगा। जुर्माना भरना मतलब अपने अपराध को मान लेना है ।
आखिर जज ने अपनी तरफ से ही जुर्माना भर दिया।
मेरा दुःख, मैं गाँधी नहीं बन पा रही थी क्योंकि मेरे पंख कमजोर थे, नौका जर्जर थी और मेरा आस पास सुन्दर नहीं था। जो आसपास था वह मुझे बिना अपराध के ही झुकना, माफ़ी माँगना और दबना सीखा रहा था। बहुत पहले मेरी हम उम्र बहन ने कहा था कि अब मेरे घर में मेरी वह स्थिति आ गयी है कि यदि मुझे सम्मानपूर्वक अपने घर में रहना है तो बुद्ध बनकर ही रहना होगा।
- बुद्ध बनकर? मैं पिनपिनायी।
- हाँ हाँ ! बुद्ध बनकर। बुद्ध मतलब निर्लिप्त, निरासक्त , निरपेक्ष , निस्संग! मैंने तो कल की कहासुनी के बाद बुद्ध बनने की कवायद शुरू भी कर दी।
- बुद्ध या बैल? मैंने ठिठोली की थी।
आज यह ठिठोली खुद मेरे साथ हो रही है।
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दो पृष्ठों के बाद लिखा था ;
जिंदगी की ही तरह कुछ कहानियां कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचती। ताउम्र अधूरापन ही भोगती रहती हैं। इस कहानी के भाग्य में भी रहता यही अधूरापन, पर कहानी का भाग्य कि बचपन के पचपन बरस बाद ही सही कहानी को उसका दूसरा सिरा मिल गया और इसप्रकार यह कहानी पूरी हुई।
निगाहें घूम गयी दूर बचपन में। मैंने सोचा था कि वह घटना बीत गयी लेकिन आज महसूस कर रही हूँ कि बीतता कुछ भी नहीं है सब कुछ ठिठका पड़ा रहता है भीतर के अँधेरे तहखानों में। हल्की सी थपथपाहट और हिल जाता है पर्दा! निकल आती है अधूरी छूटी हुई अनकही कहानी।
तब सारा संसार मेरे खिलाफ खड़ा था लेकिन मैं अपने साथ थी।
लेकिन आज सारा संसार मेरे साथ है लेकिन फिर भी मैं कुछ नहीं हूँ क्योंकि मैं वह नहीं हूँ जो मैं हूँ। अपने खिलाफ खड़ी हूँ मैं !
*****
मैं रही हूँगी कोई आठ वर्ष की …उन दिनों मैं लहरों को सुनती थी, तारों के साथ खेलती थी, तितलियों को पकड़ती थी, परियों की कहानियां दादी से सुनती थी।
वह भी एक खूबसूरत सी शाम थी, परिवार के साथ डाइनिंग टेबल पर हल्की हल्की हवा में सामने लगे ऊंचे से पेड़ के हिलते हिलते पत्तों को देख रही थी कि अचानक घर के सिरमौर्य मेरे फूफा जी ने कहा ‘बड़ों को लात नहीं लगाते। मैं समझी नहीं, मुझे क्यों कह रहे हैं ऐसा? माँ ने सुना, बुआ ने सुना, सब ने सुना। बुआ ने कहा – कोई बात नहीं फूफा जी को बोल दो ‘सॉरी’। मैंने कहा ‘ जब मैंने लात लगायी ही नहीं तो क्यों मांगू ‘माफी’ क्यों बोलूँ ‘सॉरी’। अम्मा ने कहा ‘तो क्या फूफा जी झूठ बोल रहे हैं? मैंने जबाब दिया ‘यदि मेरा पैर उन्हें लगता हो मुझे भी तो महसूस होता, मेरे दोनों पैर अपनी जगह से हिले ही नहीं।’ अम्मा डांटने पर उतारू हो गयी। ‘एक तो लात लगा दी ऊपर से माफ़ी मांगने में भी छोटे बाप की हुई जा रही है, हिम्मत देखो’। बुआ ने कहा, ‘ठीक है तुमने लात नहीं लगायी पर बड़ों से माफ़ी मांगने में हर्ज ही क्या है? मेरी बाल बुद्धि मुझे संतुष्ट नहीं कर पायी, जो अपराध मैंने किया ही नहीं क्यों मांगू उसके लिए माफ़ी? मैंने माफ़ी नहीं मांगी। अम्मा ने मेरी ढीटता में अपना अपमान देखा। उनकी अच्छे बच्चों की माँ की छवि धूमिल हो रही थी। गुस्से से फुफ्कारते हुए उन्होंने मुझे तीन चपत लगाई पर मैं फिर भी टस से मस नहीं हुई। उस सारी शाम सब मजा करते रहे और मैं उस पूरी शाम सबसे अलग थलग अपने ‘स्व’ से जूझती बरामदे में खड़ी रही। मैं नहीं चाहती थी कि दुनिया मेरे आंसू देखे इसकारण मैं घर की सूनसान छत पर चली गयी और अबोध की तरह बूझती रही उस घटना के आलोक में अपने होने का अर्थ … मैंने उस दिन किसी की न सुनी सिवाय अपने मन की, अपने अंत:करण की। मुझे सत्य बोलने का दंड मिला था मेरे अपने ही लोगों द्वारा। मैं समझ गयी कि मैं एक अच्छी लड़की नहीं हूँ, कम से कम वैसी तो हरगिज नहीं जैसी मेरे घरवाले चाहते हैं।
उस शाम मेरी माँ पर तो जैसे भूत सवार था बेटी की हेकड़ी को ठिकाने लगाने का। उसने आधा घंटे के लिए मुझे एक कमरे में बंद कर दिया था – जब तक नहीं बोलेगी सॉरी, नहीं निकल पाएगी। मैं भी बंद कमरे की खिड़की से सामने खड़े नीम के पेड़के हिलते पत्तों को देखती रही, वह भी जैसे उसी के साथ पागलपन पर उतर आया था। पेड़ों से गुजरती हवाओं का पागल संगीत भी जैसे कह रहा था – दुनिया न सही, हम हैं तुम्हारे साथ!
लेकिन मुझे तो कोई परवाह ही जैसे नहीं थी दुनिया से अपने रिश्तों की। तब कुछ नहीं था मेरे पास पर सब कुछ था। आज सब कुछ है पर कुछ नहीं है। तब मुझे परवाह थी तो सिर्फ यही कि झूठ नहीं बोलना है क्योंकि मुझे क्लास में यही सिखाया गया था। मैं न झुकी, न टूटी बस बिसूरती रही। आखिर हार कर अम्मा ने अंतिम विकल्प रखा – ठीक है मन से नहीं बोल, लिखकर ही दे दे ‘सॉरी ‘!
मैंने गर्दन हिला दी – झूठमूठ का क्यों लिखना?
चटाक! चटाक! अम्मा का धैर्य अब जवाब दे चुका था।
वह आंतरिक मुक्ति की पहली आवाज़ थी!
पहला आंसू!
पहली पीड़ा!
उस बात को और बचपन को गए आज हो गए पचपन साल। आज वह युवती एक माँ है, एक खूबसूरत बहू की सास है। सीख गयी है वह आज दुनिया से अपने रिश्ते निभाना। सीख गयी है वह – घरको एकजुट रखना। आज बात बात पर दिन में दसियों उसे रोना पड़ता है और बार बोलना पड़ता है उसे सॉरी, उन गलतियों के लिए जो उसने की और उन गलतियों के लिए भी जो उसने नहीं की। क्योंकि उठकर चल देनेका विकल्प नहीं है उसके पास। लेकिन जब जब वह बिना किसी कारण बोलती है सॉरी, दूर पीछे से मुंह चिढ़ाती नजर आती है वही दस साल की छोकरी।
तूफानी लहरों से गुजर कर किनारे लगा बंदा शायद ज्यादा देखता है पीछे मुड़कर। उन्हीं ठिठके हुए क्षणों को।
कई बार वह जिद्दी लड़की झांकती है मेरे भीतर से।अपने तमाम रंगों और तेवरों के साथ … आँखें तरेरते हुए कहती है ‘सॉरी कोई मंदिर का घंटा नहीं कि सोचे बिना सोचे, बात बिना बात बजा दिया उसे।’ पर तभी सयानी हुई, दुनिया देखी भाली वह औरत मुस्कुरा देती है,ए क उदास मुस्कराहट – नहीं हो पाया, नहीं धर पायी चदरिया ज्यों की त्यों!
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डायरी के अंतिम पृष्ठ पर लिखा था – सुन रही हूँ झड़ते पत्तों की आवाज़, झड़ जाना है मुझे भी, टूट जानी है देह की मीनार भी। बरसों से बंद थी जो रूह,उसे न गीतों में गा सकती थी न माला में मोतियों सी जड़ सकती थी सो लिख दिया उन्हें डायरी के इन पन्नों पर। अपनी आत्मा और उसके सगीत को बचाने के लिए। मैं धरती पर गिरा फूल ही सही पर जबतक चंद पंखुडिया भी बची है मुझमें, जारी रहेगा प्रतिकार अपनी तरह से।
कुछ खाली जगह….. फिर लिखा था – कभी मैं भयंकर रूप से बीमार भी पड जाऊं तो ही मेरी शल्य चिकित्सा मत करवाना, मेरे बच्चों क्योंकि जब मेरी देह पर चाकू लगाया जाएगा तो मेरी देह से लहू के फब्बारे नहीं झूठे माफीनामे फूटेंगे जो तुम्हें लज्जित कर देंगे।
ये तो चावल के कुछ दाने ही थे जिसका जिक्र किया है मैंने , ऐसे कई प्रसंग और भी हैं। सोच रही हूँ कि यह तो संयोग ही था कि मैंने पढ़ ली यह डायरी। बहुत सम्भव था कि यह डायरी रद्दी में बिकती। काश उनके जीते जी लग जाती यह डायरी मेरे हाथों तो रिश्ते इतने रेगिस्तानी होने से बच जाते ! उन्होंने तो उस पार जाने के पहले अपनी चादर ज्यों की त्यों धर दी, बचा लिया अपनी आत्मा के संगीत को। पर मैं क्या करूँ ? किस घाट जाकर रोऊं ? पांच वर्ष हुए इस डायरी को पढ़े हुए पर इसकी उदास छाया से आज भी घिरी हुई हूँ। सपनों में मेरे आज भी आती है यह डायरी। अजीब सा सपना आता है जिसमें घर और बुजुर्ग इस डायरी को हाथ में लिए दरवाज़े के बाहर खड़े दिखाई देते हैं। बुजुर्ग की शक्ल देखते देखते मेरी शक्ल में बदल जाती है।
