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औपनिवेशिक आधुनिकता और हिंदी साहित्य – राजकुमार

यदि मान लें कि आधुनिक युग की शुरुआत उन्नीसवीं सदी में हुई तो फिर यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। उन्नीसवीं सदी से पहले हिन्दी साहित्य शिष्ट और लोकसाहित्य से संवाद करते हुए विकसित होता रहा। किन्तु उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक शासन के दौरान शिष्ट और लोक के अतिरिक्त एक अन्य तत्त्व भी जुड़ गया। इसका सम्बन्ध पश्चिमी आधुनिकता से है। उन्नीसवीं सदी में अँग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत के साथ भारतीय प्रबुद्ध वर्ग पश्चिमी आधुनिकता से परिचित हो गया। पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

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रघुवंश (कालिदास) – चौदहवें सर्ग के कुछ अंश : अनुवाद- राजकुमार

सीता का रोना सुनकर 
मोरों ने नाचना छोड़ दिया
पेड़ों ने फूल गिरा दिये
घास खा रही हरिणियों ने
अपने मुह की घास गिरा दी
सीतासम दुःख व्याप गया वन में
विलपने लगा वन ।

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विचारधारा, एकअपर्याप्त टिप्पणी – विश्वनाथ त्रिपाठी

हाल ही में कुछ वर्षों से विचारधारा की बात कम की जा रही है। आन्दोलनों को विचारधारा से आवश्यक तौर पर जोड़ा जाता था। मुझे लगता है कि अब विचारधारा में चिन्तन से ज़्यादा जोड़ा जाता है, आन्दोलन से कम। इसका कारण यह कि अब सामाजिक दृश्य पर आन्दोलन कम होते हैं, चिन्तन ज़्यादा होता है। उदाहरण के लिए भारत में ही देखिए तो दलित चिन्तन, स्त्री-चिन्तन तो खूब होता है यानी लिखा-पढ़ा बोला जाता है, किन्तु आन्दोलन कम। अब जुलूस समारोह पहले जैसा बहुत कम होते हैं, पत्रिकाओं में लेख, परिचर्चा आदि जरूर खूब होते हैं।

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मानव की सहजात है करुणा – नंदकिशोर आचार्य

जब मानव को आत्मचेतन प्राणी कहा जाता है तो उसका आशय यह होता है कि वह अपने को शेष सृष्टि से न केवल अलग अनुभव करता है, बल्क‍ि इस अलग होने पर विचार करने के साथ-साथ इस अलगाव, इस पार्थक्य के भाव को मिटाकर पुन: शेष सृष्टि से एकत्व महसूस करना तथा उसके उपायों की तलाश पर भी विचार करता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एरिक फ्राॅम का मानना है कि मानवीय आचरण को प्रभावित करनेवाले प्रबल तत्त्व उसके अस्तित्व की स्थितियों अर्थात उसके मानव होने की स्थिति में ही निहित होते हैं।

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स्वायत्तता या मूल्य हीनता से आगे का रास्ता – सुखजोत

विश्व युद्ध के दौरान बच्चों से भरा एक विमान प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरते हुए एक निर्जन और बीहड़ द्वीप पर दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। छह से बारह वर्ष की उम्र के सब बच्चे, किसी भी तरह की  रोकटोक से मुक्त, नाते रिश्तों से मुक्त, किसी भी तरह के नियम, व्यवस्था या क़ानून से मुक्त, केवल अपनी इच्छा से कुछ भी, कभी भी करने को स्वतंत्र हो जाते हैं। एक अकल्पनीय, पूर्ण आज़ादी - जो किसी भी जीव की एकमात्र चाह है। एक स्वायत् शासन - कोई नियम-मर्यादा नहीं। जहां किसी को किसी का कोई डर नहीं। जहां कोई बड़ा-छोटा नहीं।

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पंडित जी – एक संस्मरण – विभूति नारायण राय

दीपावली कहना हमेशा मुश्किल सा लगता है । दीवाली ज़्यादा सहज स्वाभाविक ढंग से बोलचाल मे निकलता है । इस दीवाली पर न जाने क्यों इंटरमीडिएट के अपने संस्कृत अध्यापक पंडित जयानन्द मिश्रा याद आ रहें हैं । उम्र के इस पड़ाव पर स्मृतियों का क्या ? आगे पीछे दौड़तीं हैं । पिछली दीवाली की चीजें धुँधली हैं पर अचानक पचास वर्ष पूर्व कालिदास के रघुवंशम को रस ले कर पढ़ाते हुये अपने अध्यापक का चेहरा पानी मे आधा डूबता आधा उतराता सा दीखता है ।

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