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संसार मे प्रजातंत्र : अपेक्षायें और उपेक्षायें – विभूति नारायण राय

लोकतंत्र मनुष्य के सभ्य होते जाने की गाथा है। यह एक बेहद लम्बी और तवील यात्रा है जो भिन्न भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भो मे मानव प्रजाति ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से तय की है। यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस यात्रा मे इतने उतार चढ़ाव आये हैं कि कई बार फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि हम आगे बढ़े हैं या पीछे? आदिम साम्यवाद और कबीलाई यथार्थ या यूटोपिया जैसे काल्पनिक आदर्शों से गुजरती मनुष्यता की यह यात्रा संस्थाबद्ध धर्म, व्यक्तिगत संपत्ति, परिवार और राज्य के निर्माण की साक्षी बनी।

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एक स्त्रीवादी यूटोपिया की तलाश – सविता सिंह

मेरे मन में एक गीत अपने को गाता और दोहराता रहता है- एक राह तो वो होगी....।  मेरे पहले कविता संग्रह में एक कविता है, " में तारों का एक घर". इसमें एक कल्पना है जो यथार्थ की तरह पेश की गई है। यहां एक स्त्री खुद को तारों का एक घर समझती है जिसमें कितने ही तारे उतरते हैं, लगभग हर रात। ऐसा होने से बहुत सारा प्रकाश कहीं और चला  जाता है, और ढेर सारी ऊष्मा भी। तारे स्त्री की देह में खुद को विलयित करने आते हैं, मनुष्यों की तरह अपनी देह छोड़ने।

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 तकनीकी तीव्रता और दैनिक जीवन की व्यर्थता – गगन सेठ

गर्मियों की छुट्टियों में पहाड़ पर सैलानियों की भीड़। झील के किनारे बैठे हर उम्र के लोग। गंगा किनारे की भीड़। गोवा में समुद्र किनारे रेत पर खेलते बच्चे और व्यस्क। लम्बे दिन के काम के बाद घर आकर सोफे पर पसरे लोग। सारा दिन स्कूल से पढ़ कर घर आये बच्चे। बच्चे को पार्क में घूमती मां - और भी ऐसे ही कई दृश्य जो हमारी ज़िंदगी को एक रौनक, रंग और संगीत से भरे रखते हैं। सब मोबाइल फ़ोन में कंप्यूटर और इंटरनेट के सैलाब में डूबते जा रहे हैं। किसी को फुर्सत नहीं। सभी हर वक्त, हर दृश्य में, मोबाइल पर कुछ लिखते, बात करते या फोटो /सेल्फी लेते दीख जायेंगे। मुद्दत बाद मिले मित्र या सगे लोग, सभी मोबाइल पर व्यस्त। सभी उस मशीन जैसे ही लगते हैं जिस में वे खोये रहते हैं।

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संस्मरण : ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला –  मधु कांकरिया  

इस सदी की सबसे खूबसूरत तस्वीर  यह तस्वीर अफगानिस्तान सेना के एक जाबांज शहीद मेजर अब्दुल रहीम की है। वर्ष 2020 में काबुल में हुए एक बम विस्फोट में मेजर अब्दुल रहीम शहीद हो गए थे। बम निरोधक विशेषज्ञ मेजर अब्दुल रहीम ने 2012 में बम डिफ्यूज करते समय अपने दोनों हाथ खो दिए थे। करीब दो हजार से अधिक बम डिफ्यूज करने वाले अब्दुल को तीन साल बाद भारत में नए हाथ मिले। ये हाथ उन्हें कोच्चि के टीजी जोसेफ से दान में मिले थे। जोसेफ सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड हो गए थे।

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कहानी : झूठे थे वे माफ़ीनामे! – मधु कांकरिया

अम्मा जी आसमान बन चुकी थी। धरती पर लावारिस सी पड़ी उनकी डायरी पर  एकाएक मेरी नज़र  पड़ गयी थी। डायरी का पहला पृष्ठ खोला। उसके बीचो बीच लिखा हुआ था ;   ‘वापस लेती हूँ उन माफियों को जिन्हें मुझे परिवार से मजबूरन मांगनी पड़ी ,पर सच्चे मन से मैंने कभी नहीं मांगी वे माफियां क्योंकि मेरी जिन आवाज़ों को दबाया गया वे  सिर्फ़ सच्चाइयों की बुलंद आवाज़ थी ,लेकिन दवाब में मुझे अपनी सच्ची आवाज़ के लिए भी  'सॉरी ‘ कहना पड़ा लेकिन वे  सिर्फ़ मेरे अल्फाज थे रूह से निकले जज्बात नहीं। 

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