गर्मियों की छुट्टियों में पहाड़ पर सैलानियों की भीड़। झील के किनारे बैठे हर उम्र के लोग। गंगा किनारे की भीड़ । गोवा में समुद्र किनारे रेत पर खेलते बच्चे और व्यस्क। लम्बे दिन के काम के बाद घर आकर सोफे पर पसरे लोग।सारा दिन स्कूल से पढ़ कर घर आये बच्चे। बच्चे को पार्क में घूमती मां- और भी ऐसे ही कई दृश्य जो हमारी ज़िंदगी को एक रौनक, रंग और संगीत से भरे रखते हैं। सब मोबाइल फ़ोन में, कंप्यूटर और इंटरनेट के सैलाब में डूबते जा रहे हैं। किसी को फुर्सत नहीं । सभी हर वक्त, हर दृश्य में, मोबाइल पर कुछ लिखते, बात करते या फोटो /सेल्फी लेते दीख जायेंगे। मुद्दत बाद मिले मित्र या सगे लोग, सभी मोबाइल पर व्यस्त। सभी उस मशीन जैसे ही लगते हैं जिस में वे खोये रहते हैं। फेक न्यूज़, फोटो शॉप की गयी तस्वीरें, झूठी ID के साथ बनी डेटिंग वेबसाइट पर प्यार, इंटरनेट पर बच्चों को फ़साने वाले, नशीली दवाएं और आतंकवाद का फैलाव- इतना सब पढ़ कर भी हम चौंकते नहीं, आगे बढ़ जाते हैं। कुछ यूट्यूब पर देखते हुए। हर वक्त इंटरनेट की सुरक्षा का खतरा हर इंसान पर, हर संस्था में , हर देश पर, हर सैन्य सुरक्षा बल पर मंडराता रहता है। हम उस सब से बेखबर और गहरे डूबते रहते हैं, इस नशे में। एक तीव्रता है, एक सैलाब – जो हमें अपनी चपेट में लेता जा रहा है, हम डूब रहे हैं, और उस नशे में खोये समझ नहीं पा रहे कि धंस रहे हैं, डूब रहे हैं। दैनिक जीवन में तीव्रता और एक क्षमता आने बाद भी हम सब एक खौफ में रहते हैं और एकदम अकेले हैं। नितांत अकेले।
जिन्हे ग्रेट जनरेशन कहा जाता है पश्चिम में- (1901-27), वे लोग हमारे यहाँ भी महानतम लोगों में थे। समय बदला, विश्वयुद्ध दो के बाद के लोगों को बेबी बूमर्स (1946-64)कहा जाता है । जो भी अच्छा हम आज महसूस कर सकते हैं, जो भी हमारे मधुर स्मृति पटल पर दर्ज है, जो भी आदर्शवादी विचार हैं, उन सब के लिए हम इन दो Generations के ऋणी हैं। बहुत कुछ मानवधिकारों के क्षेत्र में इसके बाद भी हुआ, जनरेशन X (1965-80) ने उस दिशा में खूब काम किया । जिन्हें Millennials और GEN Z ( 1997-2010) कहा जाता है -उन्हें जो धरोहर हम दे रहे हैं, वह एक चिंता जनक विषय है। धरती से आसमान तक , पर्यावरण की बात हो या मूल्यों की या कुछ और। प्रकृति , मानव सम्बन्ध, और किताबों से दूर करके हम उन्हें हम अपने बच्चों और युवाओं को सिर्फ मोबाइल, I-Pad ही पकड़ा रहे हैं।
हम वहां हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती
ग़ालिब
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संचार क्रांति के कुछ दशकों में जो कुछ घटा है कुछ साल पहले हम सिर्फ उनका सपना ही ले सकते थे। दैनिक ज़िंदगी के हर पहलू को संचार क्रांति ने ऐसे छुआ है कि पहला सब कुछ जैसे कभी कहानियों की बात थी। अभी बहुत पुरानी बात भी नहीं, पर इन दो तीन दशकों ने दैनिक जीवन का स्वरूप पूरी तरह से बदल दिया है। सब कुछ आसान, फटाफट, आँख झपकते ही हो जाता है, काम धंधे, हर ऑफिस में काम का तरीका बदल गया है। बिल भरना हो, पिक्चर देखनी हो, कोई टिकेट- कहीं का भी बुक करना हो, कहीं शिकायत करनी हो, किसी को सन्देश भेजना हो , दूर बैठे किसी से वीडियो पर या फ़ोन पर बात करनी हो , सब कुछ चटपट! और लगभग मुफ्त! किसी दूर दराज़ कि गाँव में बैठे आप न्यूयार्क में काम कर सकते हैं, कोई भी सूचना प्राप्त कर सकते हैं। सब कुछ कितना आजाद हो गया है इस भागदौड़ वाली जिंदगी में। दो बटन दबाते ही कुछ भी घर पर मंगवाया जा सकता है। कहीं भी बात की जा सकती है। दुनिया में कहीं का ,कुछ भी देखा जा सकता है। कोई भी किसी को धमका नहीं सकता, उसकी रिकॉर्डिंग की जा सकती है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ले कर कोई भी अभियान सोशल मीडिया पर चलाया जा सकता है। कुछ भी सोशल मीडिया पर लिखा जा सकता है। राजनीती, दूसरों से जुड़ना, इतना बदलाव कि गिनाया ही नहीं जा सकता। बाहर की दुनिया भर सी गई है चीजों से। घरों की तरह। और अंदर की दुनिया बिलकुल खाली हो गयी है। अपने शरीर और नशे को पूरा करते हम लोग अपने आप को भुला बैठे हैं ।
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संचार क्रांति के कितने गुण हैं , कितनी परतें हैं उन गुणों की जिनके हम सब आदी हो गए हैं। यह प्रश्नित नहीं है कि इंटरनेट ने हमें कितना सशक्त किया है। प्रश्न यह है कि हम एक तकनीकी दौड़ में अपने मन की दुनिया को खो बैठे हैं। क्या हम पहले से ज्यादा सुखी हैं ? क्या हमारा जीना और सार्थक हो गया है?
रोमांचित करने वाली अन्य गतिविधियां सिमट गयी हैं। ज़िंदगी की सब असली चीज़ें पीछे छूट रहीं हैं इस भाग दौड़ में।Debbie Herbenick एक प्रोफेसर हैं( Indiana University School of Public Health, USA में), उन्होंने and Tsung-chieh (Jane) Fu के साथ मिल कर एक रिसर्च किया और वह हाल में ही साइंटिफिक अमेरिकन में छपा ।, हैरानी की बात है , उन्होंने रिसर्च में पाया कि लोगों की सेक्स में रुचि पहले से बहुत कम हो गयी है। यह केवल अमेरिका के आंकड़े नहीं। । ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान तक इस अध्यन में लोग शामिल किये गए। बिलकुल वही बात है, जैसे बाकी सब नशे की लत लगने के बाद होती है। शराब हो या नशीली दवाएं। हमारे मस्तिष्क में भी कंप्यूटर की तरह के अनेकों ,अनगिनत तार हैं। वे तार अरबों Neurons से जुड़े होते हैं। सन्देश भेजने के लिए, ये neurotransmitter छोड़ते हैं,- जो एक सन्देश वाहक की तरह सन्देश को एक से दुसरे Neuron तक ले जाते हैं। कोई भी नशा इन Neurons को सक्रिय ( activate ) कर सकता है। धीरे धीरे उसी सक्रियता की आदत बन जाती है । उसके बिना हमारे न्यूरॉन्स खाली खाली, रिक्त महसूस करते हैं। और छटपटा जाते हैं। जैसे नेटवर्क न होने पर लोग झल्ला जाते हैं।
Internet Addiction Disorder ( IAD) नाम की एक नई बीमारी मेडिकल की किताबों में जुड़ गयी है। हम उसकी बात नहीं कर रहे। वह एक ख़ास किस्म की एडिक्शन है। लेकिन दैनिक जीवन की व्यर्थता हमारे आस पास कूड़े करकट की तरह बिखर गयी है। और हम उस कचरा -सभ्यता का भाग बन रहे हैं।
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Time machine उपन्यास में Aldous Huxley ने साल 802,701 का चित्रण किया था। लेकिन यथार्थ में तो वह सब 1945 में ही घटित होना शुरू हो गया था। और बहुत जल्दी ही इतना आसान और इतना सुविधाजनक की हैरानी होती है। सबसे पहला कंप्यूटर एक कमरे में पूरा आता था, ENIAC (1945) । तीस टन भारी यह मशीन पांच हज़ार बार जमा घटा कर सकती थी। इसकी उपयोगिता को देखते हुए PC , personal computer Micral N(1973 )का अविष्कार हुआ । 1981तक लैपटॉप और 1984 तक तो Mac आ चुका था। और उसी साल ही मोटोरोला मोबाइल फोन का आविष्कार हुआ। फोन दो किलोग्राम वज़न का था। स्टीव जॉब्स का I- phone 2007 में बाज़ार में आया था। कितना कुछ अचानक ही बदल गया और कितना किफायती हर इंसान किसी न किसी दाम पर कोई न कोई स्मार्ट फ़ोन पा सकता है।
दो तीन दशक पीछे ही मुड़ कर देखें संचार क्रांति के पहले। गली, मोहल्ले और बाजार ऐसा लगता है कि ब्लैक एंड वाइट पिक्चर की तरह थे। सुबह-सुबह मां उठकर घर के लिए रोटी बनाती ,तो पक्षियों और गली के कुतों को भी डालती। कोई भी शादी ब्याह होता तो घर का आंगन भर जाता -नाच गाने और ढोलक की थाप से। हर चीज में संगीत था। गर्मी की शाम को एक लंबी सैर हो या स्कूल कॉलेज की पिकनिक, एक गहमागहमी से भरी रहती। यह सब शायद अब भी होता होगा। लोग इकट्ठा होते हैं। बार-बार मोबाइल फोन की घंटी बजती रहती है। मित्र आते हैं, घर पर खाना खाने। सामने टीवी पर बच्चे बैठे कुछ अमेरिकन फिल्म देखते रहते हैं। मध्यवर्ग में समृद्धता आई है। IT या हर सेक्टर में काम करने वाले हमारे युवा भूत प्रेत की तरह दिन रात कंप्यूटर पर काम करते रहते हैं, और खाली समय में फोन और सोशल मीडिया घेर लेता है। हर ऑफिस में काम बढ़ गया है कंप्यूटर की वजह से। हमारे काम पर गपशप या फिर एक दुसरे से मिल कर काम करने के लिए समय नहीं । क्षमता बढ़ी है, पर हर कोई परेशान ही नज़र आता है । मानवीय संबधों की परिभाषा बदल गई है। हम किसी से जुड़ना चाहें भी तो क्या समय है है ? क्या सिर्फ फेसबुक, या ट्विटर या व्हाट्सप्प पर जुड़ना होगा ?
हमारे मन की दुनिया खो गई है। क्या हम कुछ भी महसूस करते हैं जो करना चाहते हैं? जो कुछ हम लोगों को फेसबुक या पर दिखाते हैं क्या हम वही हैं? क्या हम उसी तरह उल्लास से भर जाते हैं होली दिवाली आने पर? क्या हम एक ईमेल या मैसेज पाकर उसी तरह से खुश होते हैं जैसे चिट्ठी आने पर होते थे? बार-बार पढ़ते थे। ऐसा सब हम कहते ही जा सकते हैं। यह सब हमारी निराशावादी या उदासी की अनाप शनाप बात नहीं।
दैनिक जीवन में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है हमारे मन की दुनिया का। सबसे ज्यादा प्रदूषण हुआ है हमारे मनों के माहौल का। जिस मन की शक्ति थी हमारे आस पास के माहौल में, संगीत में, लोक गीतों में, दोस्तों के साथ घंटों बैठे साहित्य या कोई भी राजनीति की बात करने में, वह सब सोशल मीडिया की भेंट हो गया है। कुछ भी हम करें, सोशल मीडिया पर दिखावे के लिए होने लगा है। हम कहीं घूमने गए, अपने प्रिय जन का हाथ पकड़ा, कोई जन्मदिन मनाया ,बच्चे को चूमा, सब कुछ दर्ज हो जाता है कैमरा में। हम नदी किनारे घूम रहे हैं या समुद्र किनारे लहरों
को देखें, सब कैमरा के लेंस से देखते है। मन मस्तिष्क पर कोई छाप नहीं बनती। कोई भी माहौल नहीं बन पाता, जिसके साफ़ आसमान के नीचे लंबी सांस लेकर हम निश्चिंत हो जाएं। हर वक्त हम दिखाना चाहते हैं या कोई हमें देख रहा होता है। जो जिंदगी जीने की असली चीजें थी, हमने पीछे छोड़कर आगे निकलते जा रहे हैं। क्लासिक्स को छोड़कर थ्रिलर्स की तरफ जा रहे हैं।
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मन की बात को रहने भी दें -कितना कुछ जटिल हो गया है। फ़ोन हो या कार , मोटर की मुरम्मत, सब कुछ कहीं करना पड़ता है। विशेषज्ञों ने बार-बार टेक्नोलॉजी के स्वास्थ्य पर बुरे असर की बात की है। आंखों पर तनाव, अनिद्रा, मोटापा, साइबर बुलिंग , अकेलापन ! शरीर की दुनिया के बारे में वैसे भी सब ज्यादा ही जागरूक हो गए हैं। उस सब में मन बचा कहां है? उसके बचने की गुंजाइश भी नहीं। रोजाना ही कोई न कोई दुर्घटना मिल जाती है पढ़ने को, इंटरनेट पर हुए अपराध को ले कर। चोरी चकारी तो कभी होती थी। इंटरनेट Scam, आइडेंटिटी थेफ़्ट, इंटरनेट hackवेब की दुनिया घर बन गयी है, हर तरह की दहशतगर्दी का। ऐसी चीजें आम सुनने को मिल जाएंगी।
सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है , गरीब का जिसे इस तेज दौड़ में हम ने और ज्यादा अनदेखा कर दिया है । आधे अरब से भी अधिक लोग पचास साठ रूपया दिन का कमाते हैं। एक अरब से भी अधिक रिफ्यूजी कैम्पों में रहते हैं। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में हम आंख उठाकर देखते भी नहीं अपने फोन से ऊपर, कितने बच्चे अखबार में बेच रहे हैं या कचरा बीन रहे हैं। उन्हें देखते हुए किसी भी बेतुके मैसेज का जवाब देते रहते हैं। या सेल्फी लेते हुए उन्हें Edit कर देते हैं । वे हमारे View में नहीं हैं । शायद कुछ विदेशी प्रयटक ज़रूर सिर्फ उन्हें ही देखते हैं। किसी भी अविष्कार की मूल प्रेरणा समाज को बेहतर बनाने में थी। पर अब तक का सच यही है कि बड़े से बड़े अविष्कार के साथ जैसे जैसे दुनिया और तेजी से आगे बढ़ती गई उसमें जिंदगी की असली चीजें पिछड़ती चली गईं।इलेक्ट्रॉनिक्स का सारा कचरा धरती आसमान को दूषित कर रहा है। यह एक तथ्य है। हमारे रहने की जमीन को, हमारे सांस लेने की आसमान को, हमारे पीने के पानी को। हमारे समुद्र ,हमारे आसमान में उड़ते पक्षी और पानी में रहने वाली मछलियां तक भी इस कचरे के प्रदूषण से बच नहीं पाईं।
हमारी सारी स्मृतियां हमारी नदियों की तरह ही सूख गई हैं। इंटरनेट के सामने अपने सब दुख दर्द भूल कर हम घंटों बेवजह बैठे रहते हैं और समय निकलता रहता है। और इंटरनेट है एक झूठ का शहर। Fake news से कितना झूठ और नफरत फैली है हवा में कि सांस लेना दूभर हो। पर हम कीचड़ में धंसे रहते हैं, सब कुछ भुला कर, झूठ देखते हुए, झूठ में सांस लेने की आदत में। हर वक्त स्पैम या वायरस के भय से, घर के अंदर बैठे हुए भी इंटरनेट की चोरी चकारी से असुरक्षित, हम फिर भी उसके नशे में , उसी बदहवासी में रहते हैं।
हर एक इंसान के अंदर कितने ही सपने, और कितनी ही बातें हर वक्त जन्म लेती रहती है। अपने आप से डायलॉग चलता ही रहता है। अपनी आत्मा की आवाज क्या गलत है और क्या सही हमें बताती रहती है, हमारा मार्ग निर्देशित करती रहती है। हम जो कुछ भी देखते सुनते हैं वह हमारा ही हिस्सा बन जाता है। जो भी हम कुछ कहते हैं , वह हमारे अंदर ही कहीं से निकल कर आता है। किसी गीत फिल्म को देख कर रो या मुस्करा देना हमारे अंदर के ही तारों की ही झनझनाहट होती है। एक गीत, कविता या कहानी कैसे हमारे मन की दुनिया बदल देते हैं , या क्या यह सब हमारा अतीत था?
“We must accept finite disappointment, but never lose infinite hope.” – Martin Luther King, Jr.
इतना निराशावादी होकर भी कैसे बैठें। पीछे देखने से आगे छलांग लगाना मुश्किल तो है, पर पीछे देखने से पुराने सपने भी दीखते हैं और यह भी कि क्या छूटा जा रहा है। इस तीव्रता और दैनिक जीवन की व्यर्थता का दौर जरूर ख़त्म होगा ।
