डर से अगर आप डर गए तो वह पीछे लग जाता है। बाघ की तरह। तब वह आपके पीछे दबे पांव चल पड़ता है। आपका शिकार करने के लिए। यह तर्क बेकार हो जाता है कि अगर आप उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखते रहेंगे तो वह हार कर चुपचाप लौट जाएगा। मौका पाते ही वह आपके जिस्म में अपने पैने-लंबे दांत गड़ा देता है और खून में उतर जाता है। एक-एक बूंद में समा जाता है। फिर आप उससे कभी मुक्त नहीं हो सकते। वह पल-पल मौत की तरह सिर पर मंडराता है… वही जिंदगी बन जाता है…! मौत से खौफजदा जिंदगी…!!
एक सीरियल किलर के पीछे लगे जासूस की कहानी पढ़ने में मुझे मजा आ रहा था कि बिजली गुल हो गई। मोबाइल फोन के स्क्रीन पर चमका, 01:52। रात आधी गुजर चुकी थी। जून की पहली बारिश के बावजूद गर्मी का ताप शबाब पर था। उस पर उमस। पंखा बंद होते ही बदन पसीना-पसीना। हर तरफ अंधेरा। खिड़की से नीचे झांक कर देखा तो इक्का-दुक्का स्ट्रीट लाइटें जल रही थीं। सड़कें सूनी थीं। अचानक बिजली चले जाने से आस-पास की इमारतों में हल्का शोर मचलने लगा। क्या आपने महसूस किया कि अंधेरे में उठता शोर रहस्यमयी होता है! वह चौंकाते हुए कोई भी रूप धर सकता है। इसीलिए वह डराता है।
डर से अगर आप डर गए…। बिजली गुल होने से पहले पढ़ी पंक्तियां दिमाग में कौंधी तो मन में छुपे हुए एक रहस्य पर से बेखयाली में पर्दा उठ गया और अंधेरे में दो खूंखार आंखें मुझ पर टिक गईं।
बाघ की आंखें…!!
जी हां। आप शायद हंसें कि क्या मूर्खता है। मगर यही मेरा सबसे बड़ा डर है।
मैं अंधेरे कमरे में अकेला बंद हूं और सामने बाघ आ गया!!
यह कल्पना तक मेरा रोम-रोम सिहरा देती है …और अब तो डर मेरे कमरे में, मेरे सामने खड़ा है! आप सवाल कर सकते हैं कि महानगर की घनी आबादी वाले इलाके में, ठेठ मुख्य सड़क से लगी बारह मंजिला इमारत के सातवें माले के फ्लैट के बंद दरवाजे को पार करके, आधी रात को बाघ अचानक कैसे अंदर पहुंच सकता है?
मैं तब भी कहूंगा कि क्या सचमुच आपको नहीं दिख रहा? गहरे अंधेरे में मुझे घूरते हुए बाघ की दो क्रूर आंखें क्या चमकती नहीं दिख रहीं? उसके पैने-लंबे दांत उसकी ही आंखों की रोशनी में चमक रहे हैं!
वह मेरे सामने खड़ा है…! उसकी नुकीली सुइयों जैसी लंबी मूंछें और हल्की गुर्राहट…!!
प्लीज, मत कहिए कि यह मेरा वहम है?
लेटे-लेटे किताब को थोड़ी दूर खिसका कर, मैं उठ के बैठ गया और स्लाइडिंग विंडो के कांच को आशा भरी नजरों से देखने लगा। खिड़की के पार आसमान था और कांच पर छोटे-छोटे सितारों का डिजाइन था। कोई सामने की इमारत से टॉर्च की रोशनी फेंक रहा था और हल्के उजले गोल घेरे में पारदर्शी कांच पर एक छिपकली पतंगे के इंतजार में दम साधे थी। पंजों के सहारे कांच से चिपकी छिपकली का सपाट मुंह, गला, पेट और पूंछ नमूदार थी। आपने रबर की छिपकली कभी अपनी हथेली पर उल्टी रख कर देखी होगी! वह वैसी ही थी। नकली छिपकली जैसी… असली!! मैंने एक झटके से खिड़की खोल दी। छिपकली छलांग लगा कर अदृश्य हो गई। हवा के झोंके के साथ तारों का हल्का प्रकाश कमरे के अंदर आया तो बाघ धीरे-से सरक कर बाहर के कमरे में चला गया! यह किसी से छुपा नहीं है कि बाघ हमेशा घुप्प अंधेरे में आता है। अपनी गुफा तक में वह रोशनी की एक किरण को नहीं आने देता।
वैसे आप जरूर जानना चाहेंगे और मैं खुद भी जानना चाहता हूं कि मेरे भीतर कब और कैसे यह डर पैदा हुआ कि मैं अंधेरे कमरे में अकेला बंद हूं और सामने बाघ आ गया! मुझे इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला। एक लेखक होने के नाते मैंने इस पर कई बार गहराई से सोचा कि शायद किसी ने बचपन में मुझे इस तरह डराया हो! कभी किसी जंगल से मैं अकेला गुजरा हूं! बंद कमरे में डरा देने वाली बाघ की कहानियां सुनी हों! कभी मेरे स्कूल की विशाल इमारत में बाघ घुस आया हो! ऐसी कोई स्मृति मेरे पास नहीं है। सर्कस के रिंग में खुला घूमता और रिंग मास्टर के इशारों पर करतब दिखाता बाघ मैंने खूब देखा है। अलग-अलग शहरों में रहते हुए जाने कितनी बार मैं चिड़ियाघरों में गया और घंटों बाघ को निहारता रहा। वह मुझे हमेशा सुंदर लगा। उसकी खूंखार-डरावनी आंखों में मुझे हमेशा खूबसूरती नजर आई! …और आप विश्वास करें कि एक दिन मैं बाघ को लेकर फिल्म भी बनाना चाहता हूं। मेरे मन में उसके प्रति इतना आकर्षण है!
दुनिया के तमाम इंतजार उबाऊ, उदास और निराश करने वाले नकारात्मक लगते हैं लेकिन बिजली की प्रतीक्षा करना मुझे सकारात्मक लगता है। उसके आने के खयाल में जैसे सदियों की जानी-पहचानी राहत और अनजानी खुशी होती है। ऐसी ही उम्मीद से भरे पल को थामे मैं खिड़की से टिक कर बैठा था। दूर तक पसरे अंधेरे आसमान को देखता। कुछ तारे यहां-वहां छिटके थे। सन्नाटा हवा की सर-सर से टूट रहा था। दूसरे कमरे में चले गए बाघ की कोई आहट नहीं थी। वह जरूर घात लगाए हुए बैठा होगा!
इस डर में मैं सो कैसे सकता था?
…और तभी दरवाजे पर दस्तक हुई! तेज दस्तक!!
आपको शायद लगे कि इस बात से मैं और घबरा सकता हूं। परंतु नहीं, मैंने टीवी के लिए ऐसे कई काल्पनिक और सच्ची घटनाओं पर आधारित हॉरर शो लिखे हैं, जहां डर पैदा करने के लिए दरवाजे पर तेज दस्तक वाले दृश्य ऐन मौके खोज कर खास तौर पर रचे जाते हैं। ये बातें मुझे नहीं डरातीं क्योंकि मुझे पता है कि जल्द ही अब डर का रहस्य खुल जाने वाला है। जाहिर है कि रहस्य खुलते ही डर हवा हो जाता है।
धम् धम् धम्…
क्या यह तेज दस्तक मेरी कल्पना है…? बाहर घात लगाए बैठे बाघ को भुलाने की?
हो सकता है। लेकिन बार-बार की तेज दस्तक से साफ है कि कोई दरवाजे पर सचमुच हथेलियों से प्रहार कर रहा है।
मैं बिस्तर से दस्तक तक पहुंचने का हिसाब जोड़ने लगा। बैडरूम से निकल कर दस कदम का गलियारा। उसके बाद ड्रॉइंग रूम। वह खत्म होने पर पांच कदम और। फिर दरवाजा। दस्तक जारी थी। मेरे फ्लोर पर तीन फ्लैट हैं। बाकी दो में कौन रहता है, मुझे पता नहीं! शायद उन्हें भी मेरा पता न हो! फिर कौन…? आधी रात के अंधेरे में… जबकि बाघ बाहर घात लगाए है… मैं कैसे निकल सकता हूं?
लेकिन दस्तक बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। उसमें एक पुकार थी।
आखिरकार मुझे साहस जुटना पड़ा।
आप हंसेंगे कि एक से दूसरे दरवाजे के बीच दीवार को धीरे-धीरे टटोल कर बढ़ते हुए मैंने आंखें मूंद रखी थीं कि बाघ दिख न जाए! सोफे के नीचे या कुर्सी पर बैठे। लेकिन मुझे पता था कि वह दरवाजे पर नहीं हो सकता… क्योंकि दस्तक को बर्दाश्त कर पाना उसके लिए संभव नहीं। वह सन्नाटे में रहने का आदी है और उसे सिर्फ कच्चे मांस को चीरे और चबाए जाने से पैदा होने वाली ध्वनि ही पसंद है… सो, दस्तक से थरथराता दरवाजा उससे सुरक्षित था।
एक बार फिर जैसे ही दस्तक हुई मैंने दरवाजा खोल दिया… ‘कौन?’
‘प्लीज… क्या आप मुझे अंदर आने देंगे?’ एक औरत की सहमी हुई आवाज थी।
मैं चौंका जरूर लेकिन दरवाजे से हट गया।
वह साये-सी भीतर आकर सोफे पर बैठ गई। घुटने मोड़कर सीने से चिपका लिए। अपना सिर उसने घुटनों पर रख लिया। वह डरी हुई थी। उसका चेहरा नहीं दिख रहा था और खिड़की से आ रही हल्की रोशनी में विशेष अनुमान लगाना संभव नहीं था। उसके बाल खुले थे। वह शायद कंपकंपा रही थी। मैं देखता रहा। दरवाजा बंद करके मैं जहां का तहां खड़ा था। पता नहीं किस बात के इंतजार में। शायद इसके कि वह सिर उठाए और कुछ कहे। लेकिन वह तो बुत में बदल गई! मेरे पास चुपचाप सोफे पर बैठने के अलावा रास्ता नहीं था।
उसके अचानक इस तरह आने से मैं कुछ पल को भूल गया कि बिजली नहीं है! मेरा पूरा ध्यान उस पर केंद्रित हो गया। कहीं कोई हादसा तो नहीं गुजरा…?
‘आप ठीक तो हैं…’ मैंने धीमी आवाज में कहा।
‘हूं…’ उसकी आवाज आई। मैंने राहत महसूस की। सोचा पानी के लिए पूछूं… पर बाघ किचन में हुआ तो?
चुप रहना ही सही था।
मैं बिजली का इंतजार छोड़ कर प्रतीक्षा करने लगा कि वह कुछ कहे। आवाज आई, ‘पानी मिलेगा… ठंडा?’
उसने मुझे डर की तरफ धकेल दिया। मैंने पूरी ताकत से डर पर काबू पाया और फ्रिज से पानी की बोतल लाकर उसके हाथों में थमा दी।
‘थैंक यू…’ पानी पीकर ढक्कन बंद करते हुए उसने बोतल अपने पास रख ली।
‘ऐसा पहली बार हुआ…’ वह जैसे अपने आप से बोली।
‘क्या…’ मैंने पूछा।
‘अक्सर देर रात को लौटती हूं मगर पहली बार लाइट गई…’
‘हूं… मुझे भी याद नहीं कि ऐसा कभी हुआ हो… वेस्टर्न सबअर्ब्स में तो ये समस्या नहीं है…’ मैंने कहा।
फिर लंबी खामोशी छा गई।
‘क्या काम करते हैं आप?,’ उसकी आवाज आई।
‘राइटर हूं…’
‘क्या लिखते हैं?’
‘टीवी सीरियल…’
‘फिर तो आपसे बातें की जा सकती है…’
‘सीरियलों की… सास-बहू वाली…!’
‘नहीं… मेरा ये मतलब नहीं…’ उसकी आवाज में हल्की-सी खनक आई। बोली, ‘ऐसा वक्त तो बातें करने से ही कट सकता है और साथ में अगर कोई समझदार इंसान न हो तब बातें दिलचस्प कैसे हो सकती हैं?’ एक पल ठहर कर उसने फिर कहा, ‘क्या आप हर किसी से, बिना जान-पहचान के आसानी से बातें कर लेते हैं…?’
‘हां… इसमें क्या मुश्किल है? लोग चाहे परिचित हों या अनजाने, लेखक दूसरों के अनुभव से भी अमीर बनते हैं।’
‘अनुभवों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं। मेरी दिलचस्पी तो रोचक बातों में रहती है। मैं आपकी तरह लेखक नहीं हूं ना…’
‘तो क्या हैं आप…?’
वह खामोश हो गई। बातों की रोशनी गुल होने से सन्नाटा गहरा गया।
यह सवाल न करता तो अच्छा होता। लेकिन क्यों…? मैं उसे जानता नहीं और तब भी वह इस अंधेरे में यहां अकेली चली आई है! वह अजनबी है… पर मैंने उसे आने दिया। उसने मेरे बारे में जानना चाहा तो बता दिया। …और मेरे सवाल पर वह चुप है। आश्चर्य! लेकिन मैंने कोई गलत सवाल तो नहीं किया। पहले परिचय में सहज ही यह बात उठती है। वह चाहे तो न बताए। वैसे उसने कहा था कि अक्सर देर रात लौटती है…!
मतलब?
ये मुंबई है मेरी जान!! दिल जोर से धड़का। मैं उसे देखने लगा। वह खिड़की की ओर मुंह फेरे थी।
कौन है? फिर से पूछना ठीक होगा? वह बताना चाहती तो कह चुकी होती। लेकिन यहां क्यों आई? रात कट ही रही थी। इससे बतियाते हुए क्या होगा? जाने को कह दूं? यहीं रहती भी है या नहीं? किस वजह से आई, इसने नहीं बताया? क्यों मैंने मूर्ख की तरह दरवाजा खोला? मगर मुझे क्या पता था कि कौन है… और क्या आप भी दरवाजे पर दस्तक होने पर यही नहीं करते?
‘मैं स्ट्रगलर हूं… फिल्मों में… महबूब स्टूडियो में एक शूटिंग थी। निकलते हुए लेट हो गई…’ उसकी आवाज उभरी, ‘टीवी में भी छोटे-मोटे रोल मिल जाएं तो कर लेती हूं… कभी…’
‘यह तो अच्छा है…’
‘क्या अच्छा है…? स्ट्रगलर की जिंदगी…!’ उसकी आवाज में शिकायत जैसी थी।
‘कम ज्यादा करके सब यहां स्ट्रगल ही कर रहे हैं… जिन्हें लोग स्टार कहते हैं वह भी अंदर से बड़े असुरक्षित हैं…,’ मैंने आराम से कहा।
‘ये सिर्फ दिल को तसल्ली देने वाली बात है। स्ट्रगलर की जिंदगी स्ट्रगलर ही समझ सकता है…,’ उसने गहरी सांस ली।
‘ऐसे तो आप जल्दी हार जाएंगी… कब से हैं यहां?’ मैंने फिर सवाल किया।
उसने खामोशी ओढ़ ली। लगता है फिर बुरा मान गई। मैंने सोचा, शायद उसे लगा हो कि इससे मैं उसकी उम्र का अनुमान लगा लूंगा! हो सकता है। मैंने अभी तक इस बारे में सोचा नहीं लेकिन मेरे अंदर उसे जानने की इच्छा तो पैदा हो ही गई है! इसमें गलत क्या है?
बैठे-बैठे क्या करें… करना है कुछ काम… शुरू करो अंत्याक्षरी… लेकर प्रभु का नाम! बचपन के दिनों में बिजली गुल होने पर यह मेरा प्रिय शगल था। बड़ा हुआ तो अंत्याक्षरियों में रूमानी अनुभव भी मिले।
नहीं नहीं… खामखां बात बढ़ सकती है।
‘मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि इस वक्त यहां से चली जाएं…,’ अचानक मैंने बेहद ठंडे भाव से कहा।
उसने उतनी ही हठी प्रतिक्रिया दी। जैसे सुना नहीं। मैंने फिर कहा, ‘मुझे गलत मत समझिए लेकिन मैं नहीं चाहता…’
‘मैं नहीं जाऊंगी…’ उसकी दृढ़ आवाज आई।
मैंने साफगोई अपना ली, ‘देखो तुम एक औरत हो और मैं एक मर्द… समझीं… इस अंधेरे में अकेले…’
‘अकेले नहीं, हम दो हैं…’ उसने बात काटी और बोली, ‘अंधेरे में मुझे डर लगता है… और अकेले तो बिल्कुल नहीं रह सकती। तुम समझ नहीं पाओगे लेकिन फिर भी बताती हूं कि अकेले होने पर, कमरे के घुप्प अंधेरे में मुझे घूरते हुए बाघ की दो क्रूर आंखें चमकती दिखने लगती हैं! उसके पैने-लंबे दांत उसकी ही आंखों की रोशनी में चमकते है! यह मेरा सबसे बड़ा डर है कि मैं अंधेरे कमरे में अकेली बंद हूं और सामने बाघ आ गया। यह कल्पना तक मेरा रोम-रोम सिहरा देती है…’, डूबती हुई आवाज के साथ उसकी बात खत्म हुई। फिर मानो वह बुदबुदाई, ‘तुम कैसे समझ सकोगे यह…?’
एकाएक मैंने महसूस किया कि कमरे का अंधेरा बेहद घना और गाढ़ा हो गया है। एक साथ सैकड़ों ठोस-पैनी-नुकीली सुइयां मेरे सिर में घुस गई हैं और उनकी तेज चुभन से मेरे सोचने की शक्ति सुन्न पड़ रही है। मेरी खोपड़ी और आंखों से खून की धारें बह रही हैं और मेरा चेहरा तर-ब-तर हो रहा है। कमरे के लगातार बढ़ते तापमान के बीच शरीर ठंडा पड़ने लगा। मेरा माथा, मेरी हथेलियां, मेरा सीना और मेरे बाजू भीतर से बर्फ की तरह जम गए मगर बाहर उन पर गर्म लपटें उठने लगीं। मुझे बुखार चढ़ गया।
अचानक वह हंसी। बोली, ‘डर गए क्या?’
‘इसमें डरने जैसा क्या है?’ खुद को संभालते हुए मैंने झूठ कहा। लेकिन यह कैसे संभव था कि हमारे डर बिल्कुल एक जैसे हों? इससे ज्यादा डरावना क्या हो सकता था! शरीर में सिरहन दौड़ गई। यह बाघ का षड्यंत्र तो नहीं? मुझे कमरे से बाहर निकालने के लिए उसने रूप तो नहीं बदल लिया? मैंने पढ़ा है कि बाघ के पास जादुई शक्तियां होती हैं। शिकार को लुभाने के लिए वह तरकीबें आजमाता है।
वाकई…?
मेरी पसलियों में दर्द उठा। पीठ में ऐंठन महसूस हुई। मैं उठ कर खड़ा हो गया।
‘लाइट आते ही मैं चली जाऊंगी।’
‘वह तो पता नहीं कब आएगी?’
‘तब फिर बैठ जाओ…’
मैं चुपचाप बैठ गया। मैं घिर चुका था। मेरी नसों में बहते खून में बाघ का डर घुलने लगा। वह किसी भी पल छलांग लगा कर दबोच सकता है। मैं हार गया। अब क्या करूं?
प्रार्थना…!
लाइट आ जाए…!!
वह अपनी जगह से उठी और सोफे पर मेरे पास आकर बैठ गई। परफ्यूम की हल्की गंध उड़ी। वह थोड़ी-सी मेरी तरफ झुकी और बोली, ‘तुम क्या कह रहे थे… इस अंधेरे में हम…’
मैं चुप रहा।
‘अकेले…!!’ वह जैसे खेलने के अंदाज में बोली।
‘अकेले…? तुम्हें पता नहीं… हमारे साथ यहां बाघ भी है…’ मैंने कहा।
अंधेरे में उसके होठों पर मुस्कान नाची। बोली, ‘डरा रहे हो!’
‘नहीं… सच कह रहा हूं।’
‘तुम्हीं तो बाघ नहीं हो… पता नहीं कब झपट पड़ो मुझ पर!’
सीधा हमला करके उसने मुझे हैरत में डाल दिया। मैंने रक्षात्मक लहजे में कहा, ‘मैं वैसा आदमी नहीं हूं…’
‘तभी कह रहे थे कि इस वक्त चली जाओ… एक मर्द… एक औरत… क्या मैं ये इशारे नहीं समझती?’
‘मैं तुम्हें समझा नहीं सकूंगा।’
‘पर मैं समझना चाहूंगी…’ उसके अंदाज में शरारत शामिल हो गई। आवाज में थोड़ी लरज के साथ बोली, ‘ क्या तुमने कभी औरत देखी है… अकेले में!!’
‘बात बढ़ाने क्या मतलब। लाइट का इंतजार करते हैं…’ मैंने रूखे स्वर में कहा।
वह खामोश हो गई। मुझे लगा कि बाघ ने मुझे चंगुल में फंसा लिया। अब वह किसी भी पल मेरा काम तमाम कर सकता है। आस-पास हल्के परफ्यूम की गंध में धीरे-धीरे पसीने की गंध शामिल हो रही थी। किसी तैयारी की उत्तेजना का हल्का ताप उसमें घुला था। बाहर टॉर्चों की रोशनियां खत्म हो चुकी थीं और पारदर्शी कांच के सितारों वाले डिजाइन बुझ गए थे। मैंने सोचा कि कमरे की खिड़की खोल देनी चाहिए ताकि माहौल कुछ हल्का हो। मैं उठने को ही था कि वह बोली, ‘तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया।’
‘कौन सी…?’
‘कि तुमने कभी औरत देखी है…?’
‘तुम्हें इससे क्या…?’
‘तुम्हारी फितरत पता चलेगी…’
‘तुम बात बढ़ा रही हो।’
‘फिर भी… कुछ तो कहो।’
‘क्या कहूं तुम्हें… दो महीने पहले तक मैं लिव-इन में था। मेरी गर्लफ्रेंड थी। तुम्हारे जैसी स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस। हमारे बीच सब ठीक था पर वह बेहद मूडी थी। जब राइटर खुद मूडी होता है तो दूसरे का मूड संभालना, तुम सोच सकती हो कि मेरे लिए कितना कठिन रहा होगा। फिर भी हम चार साल तक साथ रहे। मगर धीरे-धीरे उसका टेंपर हाई होता गया। मैंने कहा न कि स्ट्रगल तो यहां हमेशा है… परंतु लगातार रिजेक्शन से उसके मूड स्विंग और टेंपर मिलकर इतने खतरनाक हो गए कि संभालना मुश्किल हो गया। हमने काउंसिलिंग और मेडिकल हेल्प भी ली पर फर्क नहीं पड़ा। फिर वह सब छोड़ कर अपने घर चली गई।’
‘तुमने रोका नहीं?’
‘वह रुकी नहीं।’
थोड़ी देर वह खामोश रही। फिर बोली, ‘कुछ महीने में वह वापस आ जाएगी।’
‘कैसे…?’
‘मैं भी एक बार सब छोड़छाड़ कर चली गई थी। मगर फिर आ गई!’ उसकी आवाज में ईमानदारी थी।
‘इस शहर में जो आजादी है और किसी भी पल सपना सच होने की जो उम्मीद… वही ताजिंदगी चिपकाए रखता है इससे।’ मैंने कहा।
‘बिल्कुल नहीं। यह सिर्फ दिल को तसल्ली देने वाली बात है। असल तो यह है कि जिसे जिंदगी जीना है वह यहां आता ही नहीं। यहां वो आते हैं जिन्हें मर-मर कर जीने में मजा मिलता है। जिन्हें दूसरों को तिल-तिल मरते देखने में मजा आता है। एक किस्म का सैडिस्टिक प्लेजर जिसे कहते हैं, दो तरफा, उसमें यहां सबकी दिलचस्पी है। क्या है यहां…? कुछ भी तो नहीं। हर पल पागल दौड़। पता नहीं किस चीज के लिए। न सुबह का पता, न रात की खबर। आदमी खुद जी नहीं रहा। दूसरे को तड़पते-मरते देख कर सांसें ले रहा है। गजब है…’
‘जब तुम जानती हो तो क्यों वापस आई?’
‘यहां जिंदगी नहीं, नशा है… नशे में डूबने के बाद कुछ पता नहीं चलता। एहसास मर जाते हैं… और उनके बिना जीने में कोई तकलीफ नहीं होती… इसलिए यहां लोग जीते रहते हैं… मर-मर कर जीते रहते हैं…,’ उसकी आवाज में दर्द छलका।
‘गहरी चोट खाई है तुमने…’
‘बिल्कुल फिल्मी डायलॉग मारा तुमने…’ कहते हुए वह जोर से हंसी।
रात लंबी हो रही थी। मैं समझ चुका था कि वह बातों में माहिर है और जिंदगी का अनुभव उसे है। परंतु मुझे उससे क्या? वक्त अब नहीं कट रहा था। गर्मी बढ़ गई थी। अंदर के कमरे में जाने का कोई अर्थ नहीं था। मनहूसियत पसर रही थी। सोचिए कि एक मर्द और एक औरत, एक कमरे में अंधेरे में इतने नजदीक हैं कि उनकी सांसें टकरा रही हैं और मनहूसियत पसर रही है! यह संसार के सबसे नीरस क्षणों में होना चाहिए!
तो और यह क्या है!!
वह मुझ पर हमला ही क्यों नहीं कर देती? बैठे रहने से तो अच्छा होगा! तो मैं ही क्यों हमला नहीं कर देता? मैंने देखा, वह अपने में डूबी थी। लंबा चेहरा। खुले बाल। गला पतला। हाथ लंबे। कद औसत।
स्ट्रगलर…!!
एक ही शब्द नंगा कर देता है! कुछ छुपता नहीं। मुझे उस पर तरस आने लगा।
‘तुम बोर हो रहे हो?’ उसकी आवाज आई।
‘नहीं तो…’
‘मैं तुम्हें एंटरटेन कर सकती हूं…’ अबकी बार आवाज सधी थी।
‘तुम बकवास कर रही हो…’
‘तुम बेवकूफ हो…’
‘क्यों…?’
‘बिना सोचे समझे दरवाजा खोल दिया! कैसे राइटर हो…? कहीं पढ़ा नहीं कि औरत पर विश्वास नहीं करना चाहिए… त्रिया चरित्र…!!’
‘सच्ची, भलाई का जमाना नहीं है…’
‘…कि अकेली औरत देख कर ललचा गए?’
‘तुम घटिया बात पर उतर आई हो… अरे! मैंने कोई तुम्हें देखकर दरवाजा खोला थाॽ’ मैंने तल्ख अंदाज में कहा।
‘एक आदमी मुझसे रेप के केस में अंदर है मिस्टर…’ अचानक उसका स्वर सख्त हुआ, ‘इसे मजाक मत समझना।’
मुझे जैसे जोर का करंट लगा। क्या मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी है? उसे अंदर ले कर फंस गया। इससे तो अच्छा होता कि बाघ मुझे खा जाता। अब क्या हो सकता है? मैं पसीने से तर-ब-तर हो गया। यह सोचना कितना भयानक है कि यह औरत किसी भी पल मुझ पर संगीन आरोप लगा सकती है। …और यह मजाक भी हो तो भद्दा है! यह चीखने-चिल्लाने लगी तो मैं क्या कर पाऊंगा? मेरी नसें शिथिल पड़ने लगीं।
‘प्लीज आप चली जाइए…’ मैंने ठंडे स्वर में कहा।
‘अरे… मैं तो आपको एंटरटेन कर रही थी।’ वह हल्के-से हंसी।
‘देखिए, मैं आपको यहां देखना नहीं चाहता। रिक्वेस्ट कर रहा हूं…’
‘वैसे मैंने कुछ झूठ नहीं बोला… सचमुच… एक…’
‘मुझे बकवास नहीं सुननी… आप जाइए।’ कड़क आवाज में बात खत्म करते हुए मैं उठ कर खड़ा हो गया।
वह सुबकने लगी।
त्रिया चरित्र…!! उसने ठीक कहा था।
मैं ठहरा रहा। यह उसकी तरकीब है। उस पर और विश्वास नहीं करना चाहिए।
क्या मुझे ही बाहर नहीं निकल जाना चाहिए?
इससे क्या होगा?
बाघ उसे अकेला पाकर खा जाएगा!!
वह सुबकती रही। मैं चुपचाप खड़ा रहा।
‘मैं कुछ कहना चाहती हूं… ईमानदारी से…’
‘मैं तुम पर भरोसा नहीं कर सकता…’
‘मत करो लेकिन सुन तो लो। मैं नहीं जा सकती… मैंने कहा ना कि अंधेरे में अकेले बाघ…’
‘मुझे भी बाघ से डर लगता है… अंधेरे में अकेले कमरे में होता हूं तो लगता है कि अचानक वह कहीं से प्रकट होकर मुझे खा जाएगा… क्या करूं मैं फिर… तुम नहीं आतीं तो वह अब तक मुझे खा जाता… तुम भी… जहां भी होती, वह वहां पर तुम्हें भी खा जाता… और यही ज्यादा अच्छा होता… तुम…,’ मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा।
‘ये तमाशा बंद करो…’ उसने अचानक मेरा हाथ पकड़ा और साफ शब्दों में कहा, ‘हम आराम से बैठ कर बात करते हैं, प्लीज…’ आवाज में हल्का अपनापन-सा जागा। उसकी छुअन रेशमी थी। उसकी अंगुलियां कोमल थी। क्या वह सचमुच ऐसी है… नाजुक! उसने बैठते हुए मेरा हाथ अपनी नर्म हथेलियों में कस लिया। उसकी सांसें तेज थीं। वह सोच में पड़ी थी। शायद वह डर गई? शायद गलती का एहसास हुआ… या कोई नया पैंतरा आजमाने की तैयारी में थी!! देर तक वह चुप रही। मैं भी कुछ नहीं कहना चाहता था। हम जैसे किसी पाताल की गहरी काली गुफा के सन्नाटे में घुल रहे थे और संसार का अस्तित्व क्रमशः खत्म हो रहा था। अजीब-सी शांति छा रही थी। जो बेहोश कर देती है। होश की डोर टूटने को थी कि उसकी मद्धम आवाज आई, ‘तुमने मछलियां देखी हैं… समुंदर में… झुंड की झुंड तैर रही होती हैं कि छपाक से जाल गिरता है… और सब खत्म! कोई-कोई किस्मत वाली होती हैं जो फंसने से बच जाती हैं।’
‘हूं…’
‘स्ट्रगल ऐसा ही है… लगता है कि सामने बड़ा खुला समुंदर है… यहां नहीं तो वहां… वहां नहीं तो कहीं और… अभी नहीं तो कभी… लंबी भटकन के बीच तभी अचानक कोई जाल गिरता है और आप फंस जाते हैं। ज्यादातर के साथ यही होता है। जो यहां-वहां फंसते-उलझते कहीं पहुंचते भी हैं तो इसलिए कि किस्मत साथ देती है। मेरी किस्मत मेरे साथ नहीं थी।’ उसकी आवाज उदास हो गई।
ज्यादातर लोग अपनी कमजोरियां ढंकने के लिए दूसरों को, हालात को, किस्मत को कोसते हैं। जिसमें दमखम होता है, इच्छाशक्ति होती है, वह मुकाम बना ही लेता है। स्ट्रगल की हर कहानी में कमोबेश यह बातें रहती हैं। मैं नहीं जानता क्या? नया क्या है?
उसने कहा, ‘मुझे पांच छोटे भाई-बहनों को पालना था। पढ़ाना-लिखाना था। पिताजी की छोटी-सी किराने की दुकान थी। हम वाराणसी में रहते थे। मेरा बड़ा भाई गलत रास्ते पर चल पड़ा था और पुलिस एनकाउंटर में मारा गया…’
‘फिल्मी कहानी सुना कर मुझे एंटरटेन कर रही हो?’ मैंने छेड़ने के ढंग से कहा।
‘मेरा सच तुम्हें फिल्मी लग रहा है?’
‘फैमेली, क्राइम, इमोशन… एकदम साफ है!’
‘ठीक है तो मैं बीच में से बताती हूं,’ वह बोली, ‘सावन माथुर वाला केस पता है तुम्हें?’
‘ वो… फिल्म प्रोड्यूसर?’ मैंने कहा, ‘वह तो खूब उछला मीडिया में। माथुर अंदर है।’
‘लेकिन क्या किसी ने उस लड़की को देखा है, जिसने उसे अंदर कराया?’
‘नहीं…’
‘मैं वही हूं…’ उसने हल्की आवाज में कहा, ‘तुम्हारे सामने…’
मैं चौंक गया। अगर वह सिर्फ बात बना रही है तो चालाक किस्सागो है और सच कह रही है तो वाकई खतरनाक है।
दो महीने ही पहले सावन माथुर को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। यूं तो उसका नाम सफल फिल्म प्रोड्यूसरों में लिया जाता है मगर इंडस्ट्री में दबी जुबान में हमेशा चर्चा रही कि दर्जनों लड़कियों को फिल्मों में ब्रेक देने का वादा करके उसने बर्बाद किया। उसकी राजनीतिक साख ऊंची है, बिल्डर के रूप में वह अकूत धन कमाता है, अंडरवर्ल्ड से उसके कनेक्शन बताए जाते हैं। कभी किसी ने उसके खिलाफ मुंह नहीं खोला। मगर अचानक एक सुबह इस खबर ने हलचल मचा दी थी कि बॉलीवुड के इस कामयाब प्रोड्यूसर को पुलिस ने सांताक्रूज हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया। वह दुबई जा रहा था। एक युवती ने उस पर रेप और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए। उस पर युवती को ड्रग्स लेने के लिए मजबूर करने का भी आरोप लगा। इससे उसकी मुसीबतें बढ़ गई। पुलिस को उम्मीद थी कि और लड़कियां भी, जिनकी मजबूरी का उसने फायदा उठाया था, सामने आएंगी। परंतु यह नहीं हुआ। जबकि एफआईआर दर्ज कराने वाली युवती आरोपों पर कायम रही। हां, मीडिया में उसने चेहरा नहीं दिखाया। पुलिस ने भी उसकी पहचान उजागर नहीं की।
‘अगर यह सही है तो दूध की धुली तुम भी कहां हो…’ मैंने साफ शब्दों में कहा, ‘तीन साल से उसके दिए फ्लैट में रह रही थीं तो इसका मतलब भी क्या छुपा हुआ है? तुम अपने लालच की वजह से फंसी।’ मैंने कहा।
‘उसने मुझे लीड एक्ट्रेस का रोल प्रॉमिस किया था। क्या मुझे इंकार कर देना चाहिए था?’ उसने तर्क किया।
‘सबको पता है वह कैसा आदमी है। तुम्हें भी पता रहा होगा!’
‘उतना नहीं, जितना बाद में पता चला…’ उसकी आवाज में गर्मी आ गई। वह चुप हो गई। जैसे नाराज है।
गिरफ्तारी के बाद सावन माथुर के नाम पर खूब कालिख पुती लेकिन जिस युवती ने उसे फंसाया, उसकी भी बातें सामने आईं। वह नई-नवेली स्ट्रगलर नहीं थी। कुछ बॉलीवुड फिल्मों में छोटे-छोटे रोल कर चुकी थी। साउथ की तीन फिल्में उसने की थी। बॉलीवुड में बड़े मौकों की तलाश के दौरान एक सहेली के माध्यम से उसकी माथुर से मुलाकात हुई और इसके कुछ घंटों बाद वह उसके फ्लैट पर पहुंच गई थी। धीरे-धीरे वह उससे लगातार मिलने लगी और माथुर ने जुहू में अपना एक फ्लैट उसे रहने को दे दिया। खबरों में बताया गया कि माथुर के साथ वह बिजनेस ट्रिप्स और छुट्टियों पर जाने लगी और धीरे-धीरे ड्रग्स भी लेने लगी। बाद में उसे एहसास हुआ कि माथुर की उसके करिअर में कोई दिलचस्पी नहीं है। मगर तब तक दो बरस से ज्यादा गुजर चुके थे। जाने कितनी बार वह उसे भोग चुका था। जब युवती ने आवाज उठाई तो माथुर ने उसे पीटना और धमकाना शुरू कर दिया। कहा कि अगर शोर मचाया तो दुबई के किसी शेख के हरम में भिजवा देगा। जहां से वह कभी निकल नहीं सकेगी। इसके बाद युवती को होश आया कि वह कितने बड़े खतरे में है! उसने खुद को संभाला। हालात को परखा और आखिरकार पुलिस में सावन माथुर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई।
उसकी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी थी। वह बिना हिले-ढुले निढाल-सी बैठी थी। बिजली के इंतजार में इतना लंबा वक्त गुजर चुका था कि ‘टाइम पास’ जैसी मनःस्थिति नहीं बची थी। उसने सच सामने रख दिया। मुझे गहरी निराशा हुई। वह उदास स्वर में बोली, ‘उसने मेरा दिल दुखाया।’
मुझे हंसी आ गई। उसने हैरान होकर देखा।
मैंने कहा, ‘क्या ये लव स्टोरी थी? वह अपना मतलब साध रहा था। तुम अपना उल्लू सीधा कर रही थीं। जब तक तुम्हें लगा कि वह बड़ा ब्रेक दे सकता है, तुम चुप रहीं। उसके फ्लैट में रहीं। उसके इशारों पर नाचीं। साथ घूमी-फिरी… सब किया… फिर रेप का आरोप लगा दिया… कितना आसान है!’
‘आसान…! तुम मर्द हो इसलिए नहीं समझ सकते,’ वह बोली।
‘इसमें मर्द-औरत का तर्क बेकार है। तुम दोनों ही अपना-अपना स्वार्थ देख रहे थे…’
‘बिल्कुल झूठ। तुमने ध्यान से नहीं सुना कि मैंने क्या कहा… उसने मुझे लीड एक्ट्रेस का रोल प्रॉमिस किया था… प्रॉमिस समझते हो… वादा… यानी उसने जाल फेंका… फंसाने के लिए!!’
‘चलो माना… पर तुम्हें तो समझदारी दिखानी थी।’
‘कैसे…?? ऐक्टिंग मेरा प्रोफेशन है… मैं बेहतर से बेहतर करना चाहती हूं… अच्छे से अच्छे रोल की उम्मीद करती हूं… सबको पता है… और कोई इस बात का फायदा उठाए, मुझसे झूठ बोले तो क्या उसे सजा नहीं मिलनी चाहिए।’
‘तुमने उसे हालात का… अपना फायदा उठाने दिया।’ मैंने जोर देकर कहा।
‘क्या मैंने तुम्हें इन हालत का… अपना फायदा उठाने दिया?’ उसने सधी हुई आवाज में सवाल किया तो मैं अवाक् रह गया। उसने बोलना जारी रखा, ‘क्या मैंने कोई ऐसी हरकत की जिससे तुम्हें लगे कि मैं गलत हूं… गंदा काम करती हूं… मैं अच्छी औरत नहीं हूं। …और अच्छी औरत क्या होती है? अगर मैं उसके साथ रही, उसके साथ सोई तो अच्छी नहीं रही?’ दो पल रुक कर फिर उसने जैसे जानबूझ कर चोट की, ‘तुम नहीं चाहोगे मेरे साथ सोना?’
कमरे का सन्नाटा पल भर में गहरा हो गया। अनुत्तरित प्रश्न की अनुगूंज सन्नाटे में तैरने लगी। मैं चुप रहा। कोई हलचल नहीं थी। खिड़की बंद होने से कमरे में हवा भी नहीं आ रही थी। बस, उमस थी। जिसमें उसके आखिरी शब्दों के साथ एक अजीब गंध तैर गई थी।
क्या शब्दों की भी कोई गंध होती है? …और इस गंध का अर्थ शब्दों के अर्थ से भिन्न होता है?
वह मेरी तरफ देख रही थी। क्या उसके इस तरह देखने का भी कोई अर्थ था? कोई भिन्न अर्थ?
क्या मुझे उतना ही सीधा जवाब देना चाहिए, जितना सीधा उसने सवाल किया?
क्या आपसे कभी औरत ने इस तरह सीधे पूछा है? वह खेल रही है या सचमुच उसका इरादा है? वह क्या बताना चाहती है? माथुर ने उसके साथ जो किया वह धोखा था और वह वाकई अच्छी औरत है! मेरे दिमाग में सिर्फ सवाल घूम रहे थे। उत्तर नहीं थे। परेशान करती गरमी और उमस के साथ उसकी इन हैरान करने वाली पहेलियां बुझाती बातों के बीच मुझे लगने लगा कि यह अंधेरा अब सदा के लिए है! रोशनी कभी नहीं आएगी। मन चिड़चिड़ा रहा था। मैं मना रहा था कि जो कुछ भी जैसा है, अभी की अभी खत्म हो जाए। यह कैसे हालात हैं? जैसे किसी भारी पत्थर के नीचे दबा हुआ हूं। एक रत्ती भी हिल नहीं सकता।
‘तुम्हें क्या लगता है कि मैं रेप के लिए बनी हूं?’ उसने धमाका किया, ‘ …और किसी तरह देख नहीं सकते मुझे?’ मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझ पर झुक गई। हमारे चेहरे आमने-सामने थे। सांसें टकरा रही थीं। ‘क्या मैं यही चाहती हूं… बस?’ उसने अपने होंठ मेरे होठों पर रख दिए। फिर एक तड़प के साथ अपने करीब खींच लिया। उसकी बांहों का घेरा मुझ पर कस चुका था। उसका चेहरा मेरे चेहरे को छू रहा था। उसके गालों पर आंसुओं की धारें थी। दिल में भावनाओं का ज्वार उछल रहा था। वह आक्रामक होने लगी। उसके दांत और नाखून मेरे शरीर में चुभने लगे। उसने कहा, ‘अगर मैं प्यार करती हूं तो क्या सिर्फ इसके लिए…?’
‘सब एक जैसे नहीं होते,’ मैंने कहा।
‘सब एक जैसे ही होते हैं… एक ही तरह से देखते हैं… वही हवस… वही नीच सोच… सिंगल है…? वर्जिन है कि नहीं… नहीं हूं मैं वर्जिन… तो क्या? मुझे नहीं पसंद कि एक्स-रे जैसी नजरों से देखो… मुझे यहां-वहां घूरो… तुम्हारी इच्छा के कपड़े क्या… मैं कुछ भी नहीं पहनना चाहती, फिर…? ऐसे ही घूमना चाहती हूं…’ कहते हुए झटके से टी-शर्ट उतार फेंकी।
उसने ब्रा नहीं पहनी थी!
‘तुम पागल हो गई हो।’ मैंने कहा।
‘पागल तुम हो… तुम्हें प्यार और धोखे में फर्क नहीं पता।’ उसने मुझे सोफे से नीचे धकेला और ऊपर सवार हो गई।
‘यह जबर्दस्ती…’
‘और जब तुम करते हो तब?’ उसने बात काटी और अधिकार भरे स्वर में कहा, ‘आगे एक शब्द मत बोलना।’ उसकी आवाज को जैसे कमरे की हर दीवार ने, कमरे में रखी एक-एक चीज ने आदेश की तरह माना और चुप हो गई। सन्नाटा कमरे के अंधेरे से एकमेक हो गया। जैसे किसी और शै का अस्तित्व नहीं रहा। सिर्फ वह, मैं और हमारी सांसें! उसकी छुअन का रोमांच धीरे-धीरे जिस्म को जगाने लगा। जज्बात की हल्की तरंगों का संगीत भावनाओं में पैदा हुआ। सांसों में चिंगारियां मचलने लगीं। वह माहिर थी। मेरी पराजय तय थी। यह नहीं कि इस खेल में मैं कच्चा था। मगर जब पता ही न हो कि सामने कौन है और उसके इरादे क्या हैं, तब क्या मजा? क्या ऐसे भी खेला जाता है? मगर उसे जैसे इस बात से कोई मतलब नहीं था। उसके नाखून मेरी त्वचा के भीतर उतर रहे थे। वह रो रही थी। वह पागल थी? मैंने उसे बांहों में कस लिया। उसने मुझसे अधिक ताकत लगाई। इतनी कि मेरी पसलियां टूट भी सकती थीं। उसके बाल खुल कर बिखर गए और हमारे शरीर पर कुछ बाकी नहीं रह गया। क्या वह यही चाहती थी? अपने बारे में मैं अब भी संशय से भरा था। लेकिन जिस्म हमारे काबू में नहीं थे! तूफान तेज था और एक-दूसरे की बांहों में डूब कर ही यह पार हो सकता था। वह रोए जा रही थी। आंसूओं के साथ नाखूनों की धार और दांतों का पैनापन तेज हो गया था। दर्द को सहने का मेरा धैर्य जवाब दे रहा था। अचानक उसने दांत गर्दन में गड़ा दिए। मैं तड़प उठा। उसके नाखून मेरी पीठ पर खरोंच बनाने लगे। उसका बर्ताव बदल गया। वह जानवर में तब्दील हो रही थी। उसकी आंखों में चमक रहे बिंदु आग के लाल रंग की तरह सुर्ख हो उठे। उनमें क्रूरता साफ झलक रही थी। मैं उसे अपने शरीर से अलग करने के लिए जितना जोर लगा रहा था वह उससे दुगनी शक्ति के साथ मेरे शरीर में नाखून और दांत गड़ा रही थी। उसकी सांसों में गुर्राहट का शोर था।
क्या वह मुझे खत्म कर देना चाहती है?
मैंने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाया और पलट कर उसे अपनी बांहों में जोर से कस लिया। जैसे किसी जानवर को काबू करते है। उसे पुचकारने लगा। उसकी गर्दन। उसके गाल। उसकी पलकें। उसके होंठ। उसके स्तन। वह कसमसाई। मगर मैंने बंधन ढीला नहीं किया। वह छटपटाने लगी। उसकी चुनौती से मेरे भीतर भी हिंसा जाग उठी थी। वह कैसे हार मानती? थोड़ी ही देर में वहां दो जानवर गुत्थमगुत्था थे। एक-दूसरे पर प्रहार करते, चोट पहुंचाते, टकराते, काटते, गुर्राते। उमस में पसीना-पसीना। दर्द से कराहते। अपने नंगे जिस्म से बहते गर्म रक्त की धारों को महसूस करते। कभी एक-दूसरे से दूर छिटकते और कभी एक-दूसरे में समा जाते। घृणा और प्रेम साथ दिखाते। पता नहीं यह कितनी देर चला। अपनी पूरी ऊर्जा निचुड़ जाने के बाद दोनों निढाल पड़ गए। एक-दूसरे का शिकार कर के। एक-दूसरे का शिकार बन कर। रात ठहरी थी। हवा निश्चल थी। रोशनी का एक कतरा तक नहीं था। सन्नाटा ऐसे गुजरा कि उसके पीछे एक अजीब खालीपन पूरे घनत्व के साथ सिमट आया। एक गहरा स्याहपन काली फ्रेम में जड़ा हो जैसे।
मृत्यु…!
होश खो देने से पहले मेरे मस्तिष्क में अंतिम शब्द कौंधा।
आंखें खुली तो रोशनी का सैलाब कमरे में था। फर्श पर पड़े बदन में नशे की खुमारी जैसी थी। सिर में हल्का दर्द। खरोंचों के निशान ताजा थे। हरी-नीली रेखाएं उभरी थीं। उनमें मीठी जलन सुलग रही थी। बदन भारी था। वह सपना था या हकीकत…? सब कुछ अपनी जगह सलामत और स्थिर था। क्या जिस्म की गवाही झूठी थी?
देर तक मैं पड़ा रहा। जड़। चाहे जो रहा हो! कुछ सोचने की इच्छा नहीं थी। दिमाग में एक खाली रील चल रही थी। कुछ नहीं दिख रहा था। आंखों ने कहां कुछ देखा था? लेकिन जिस्म में एहसासों की यादें बिखरी थीं। रह-रह कर टीस रही थीं। धीरे-धीरे सिर हिलाया। गर्दन हिलाई। करवट बदली। देर तक बंद खिड़की, छत और दीवारों को देखता रहा कि अचानक सोफे के नीचे कुछ दिखा! नजरें ठहर गईं।
क्या है…?
मैं उठ कर बैठा। सोफे की तरफ खिसका।
एक टी-शर्ट थी और थी लैगिंग्स!
दोनों पर बाघ के शरीर जैसी धारियां!!
टाइगर स्ट्रिप्स…!!!
रोशनी का सैलाब अचानक मद्धम पड़ गया। नजरें और सांसें डूबने लगीं। सन्नाटा घना हो गया। मुझे लगा कि मैं मर भी सकता हूं। क्या दुनिया खत्म हो रही है? अगर नहीं, तो क्या इसे इसी पल खत्म नहीं हो जाना चाहिए? मृत्यु और जीवन के विचारों के बीच निर्वाण जैसी अजीब भावना मन में जागी! टी-शर्ट-लैगिंग्स को संभाले लड़खड़ाते हुए मैं बैडरूम की तरफ भागा। जरूर अंदर होगी।
वह नहीं थी!
बाघ भी गायब था।
