Month Archives: August 2023

 तकनीकी तीव्रता और दैनिक जीवन की व्यर्थता – गगन सेठ

गर्मियों की छुट्टियों में पहाड़ पर सैलानियों की भीड़। झील के किनारे बैठे हर उम्र के लोग। गंगा किनारे की भीड़। गोवा में समुद्र किनारे रेत पर खेलते बच्चे और व्यस्क। लम्बे दिन के काम के बाद घर आकर सोफे पर पसरे लोग। सारा दिन स्कूल से पढ़ कर घर आये बच्चे। बच्चे को पार्क में घूमती मां - और भी ऐसे ही कई दृश्य जो हमारी ज़िंदगी को एक रौनक, रंग और संगीत से भरे रखते हैं। सब मोबाइल फ़ोन में कंप्यूटर और इंटरनेट के सैलाब में डूबते जा रहे हैं। किसी को फुर्सत नहीं। सभी हर वक्त, हर दृश्य में, मोबाइल पर कुछ लिखते, बात करते या फोटो /सेल्फी लेते दीख जायेंगे। मुद्दत बाद मिले मित्र या सगे लोग, सभी मोबाइल पर व्यस्त। सभी उस मशीन जैसे ही लगते हैं जिस में वे खोये रहते हैं।

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संस्मरण : ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला –  मधु कांकरिया  

इस सदी की सबसे खूबसूरत तस्वीर  यह तस्वीर अफगानिस्तान सेना के एक जाबांज शहीद मेजर अब्दुल रहीम की है। वर्ष 2020 में काबुल में हुए एक बम विस्फोट में मेजर अब्दुल रहीम शहीद हो गए थे। बम निरोधक विशेषज्ञ मेजर अब्दुल रहीम ने 2012 में बम डिफ्यूज करते समय अपने दोनों हाथ खो दिए थे। करीब दो हजार से अधिक बम डिफ्यूज करने वाले अब्दुल को तीन साल बाद भारत में नए हाथ मिले। ये हाथ उन्हें कोच्चि के टीजी जोसेफ से दान में मिले थे। जोसेफ सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड हो गए थे।

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कहानी : झूठे थे वे माफ़ीनामे! – मधु कांकरिया

अम्मा जी आसमान बन चुकी थी। धरती पर लावारिस सी पड़ी उनकी डायरी पर  एकाएक मेरी नज़र  पड़ गयी थी। डायरी का पहला पृष्ठ खोला। उसके बीचो बीच लिखा हुआ था ;   ‘वापस लेती हूँ उन माफियों को जिन्हें मुझे परिवार से मजबूरन मांगनी पड़ी ,पर सच्चे मन से मैंने कभी नहीं मांगी वे माफियां क्योंकि मेरी जिन आवाज़ों को दबाया गया वे  सिर्फ़ सच्चाइयों की बुलंद आवाज़ थी ,लेकिन दवाब में मुझे अपनी सच्ची आवाज़ के लिए भी  'सॉरी ‘ कहना पड़ा लेकिन वे  सिर्फ़ मेरे अल्फाज थे रूह से निकले जज्बात नहीं। 

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कहानी – बाघ, एक रात – रवि बुले

डर से अगर आप डर गए तो वह पीछे लग जाता है। बाघ की तरह। तब वह आपके पीछे दबे पांव चल पड़ता है। आपका शिकार करने के लिए। यह तर्क बेकार हो जाता है कि अगर आप उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखते रहेंगे तो वह हार कर चुपचाप लौट जाएगा। मौका पाते ही वह आपके जिस्म में अपने पैने-लंबे दांत गड़ा देता है और खून में उतर जाता है। एक-एक बूंद में समा जाता है। फिर आप उससे कभी मुक्त नहीं हो सकते। वह पल-पल मौत की तरह सिर पर मंडराता है... वही जिंदगी बन जाता है...! मौत से खौफजदा जिंदगी...!!

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हाऊ इज द जोश! रवि बुले

सबके दिमाग में अपनी-अपनी पिच्चर चल्लई है... सब साले हीरो बनना चाह रहे हैं अपनी पिच्चर में। इ साला हिंदुस्तान में जब तक सनीमा है... लोग चूतिया बनते रहेंगे।
-रामाधीर सिंह, गैंग्स ऑफ वासेपुर-2, 2012
हिंदुस्तान के लोगों के बारे में क्या यह सिर्फ सस्ता-सा फिल्मी ‘ऑब्जर्वेशन’ है, फिल्म में रामाधीर सिंह बताता है कि वह इसलिए नहीं वासेपुर पर राज कर रहा ‘काहे कि असली बाहुबली है’ बल्कि वह सनीमा नहीं देखता। मतलब सनीमा देखने वाले धोखे में जी रहे हैं। इसी धोखे में आदमी वासेपुर का कबूतर बन जाता है और ‘यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ता है और दूसरे से अपना इज्जत बचाता है।’

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जन आंदोलन में बॉब डिलन के गीतों की भूमिका – भवी सिंह

Bob Dylan हमारे समय के शीर्ष गायक, संगीतकार और विद्रोही कवि के रूप में सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, विश्व भर में समादृत हैं । उन्होंने गीतों के अतिरिक्त दो पुस्तकें गीत साहित्य के दर्शन पर भी लिखी हैं।  केवल गीतकार या गायक होना ही उनकी विश्वव्यापी प्रसिद्धि का कारण नहीं है । अपने समय की देह और आत्मा को अपनी विद्रोही रचनाओं की शक्ति से इस तरह उद्वेलित करने वाले कवि - गायक किसी भी समाज में बहुत कम होते हैं। अमेरिका का अश्वेत आंदोलन जहां मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं से प्रेरित- संचालित था, वहां अन्याय के खिलाफ बॉब डिलन के गीत जनसमुदाय के मन मस्तिष्क को विचलित कर रहे थे। ऐसा वातावरण था कि कुछ भी हो सकता है।  सम्भवनाओं का ऐसा विस्तृत आसमान बॉब डिलन के विद्रोही गीतों ने पैदा किया कि  भीतरी बाहरी सब कुछ थिरक उठा।    
                                                                                                  -संपादक

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दो कविताएं – कृष्ण किशोर

यह तांबई रंग का चांद कब ऊपर उठेगा
कब खिलेगा पूर्ण गोलाकार चांदी का कमल आकाश में
कब मुझे ऐसा लगेगा कि मैं सुरक्षित हूं
कि अब कोई नहीं आवाज देगा मुझे कहीं से भी
और मैं दूर तक आकाश जैसा फैल जाऊंगा
रिक्त हो कर बिखर जाऊंगा

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शख्सियत : जौहर की गत जौहरी जाने – मीना बनर्जी

राशिद ख़ान! राशिद ख़ान!- भई क्या आवाज पाई है और क्या अंदाज़ है। जो भी सुने, इन बातों का कायल हुए बिना नही रह सकता। सो चाहने वालों की कमी भी नहीं। वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, कवि, संगीतकार या फिर विद्यार्थी, दुकानदार यहाँ तक कि टैक्सी चालक तक। इंदीपॉप और फिल्मी गानों के इस दौर में शास्त्रीय गायक की ऐसी लोकप्रियता से आश्चर्य? नहीं, राशिद के संगीत की तासीर ही कुछ ऐसी है।

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