सम्पादकीय : कविता के क्षितिज – कृष्ण किशोर
लिखी जाने से पहले, पढ़ी जाने से पहले, अपनी अनंतता में बहती हुई कविता हमेशा से थी, वातावरण में ही थी। उस वातावरण में जिस ने भी प्रवेश किया, वह भीतर ही भीतर कवितामय हो गया। न भाषा, न विषय, न वस्तु। बस एक वातावरण और एक लय। भाषा, शब्द इत्यादि सब बाद की बनावटे हैं। केवल अर्थ- जो गूंजता है भीतर, सुनाई देता है सिर्फ स्वयं को।
