कविताएं – अरुण कमल
जो देश मुझे इतना प्यारा था
वहाँ इतनी धूल है पत्तों पर मानों बरसों से बारिश नहीं हुई
और रात में भी रोशनी और हलचल से भरी सड़कें इतनी स्याह सुनसान
जैसे बरसों से कोई कभी रहा नहीं
कभी कभी लगता है मेरी आँख कमजोर हो रही है
जो देश मुझे इतना प्यारा था
वहाँ इतनी धूल है पत्तों पर मानों बरसों से बारिश नहीं हुई
और रात में भी रोशनी और हलचल से भरी सड़कें इतनी स्याह सुनसान
जैसे बरसों से कोई कभी रहा नहीं
कभी कभी लगता है मेरी आँख कमजोर हो रही है
सीता का रोना सुनकर
मोरों ने नाचना छोड़ दिया
पेड़ों ने फूल गिरा दिये
घास खा रही हरिणियों ने
अपने मुह की घास गिरा दी
सीतासम दुःख व्याप गया वन में
विलपने लगा वन ।
कितनी तरह की हवाएं होती हैं
जो हमसे होकर गुजरती हैं
आख़िर आज मैने जाना
कुछ मन को गीला करती है
कुछ उसे सुखा देती हैं
वे हवाएं जो पठारो से होकर आती हैं
यह तांबई रंग का चांद कब ऊपर उठेगा
कब खिलेगा पूर्ण गोलाकार चांदी का कमल आकाश में
कब मुझे ऐसा लगेगा कि मैं सुरक्षित हूं
कि अब कोई नहीं आवाज देगा मुझे कहीं से भी
और मैं दूर तक आकाश जैसा फैल जाऊंगा
रिक्त हो कर बिखर जाऊंगा