सम्पादकीय : कविता के क्षितिज –  कृष्ण किशोर

लिखी जाने से पहले, पढ़ी जाने से पहले, अपनी अनंतता में बहती हुई कविता हमेशा से थी, वातावरण में ही थी। उस वातावरण में जिस ने भी प्रवेश किया, वह भीतर ही भीतर कवितामय हो गया। न भाषा, न विषय, न वस्तु। बस एक वातावरण और एक लय। भाषा, शब्द इत्यादि सब बाद की बनावटे हैं। केवल अर्थ- जो गूंजता है भीतर, सुनाई देता है सिर्फ स्वयं को।

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विचारधारा मुक्त विचार की शक्ति – मृदुला गर्ग

मनुष्य एक विचारशील जीव है। पशु और मनुष्य में यही अंतर है कि पशु सब काम अंत:प्रज्ञा से करते हैं। जबकि मनुष्य हर प्रश्न को भावात्मक और वैचारिक दोनो नज़रियों से देख परख कर  निर्णय लेने की सामर्थ्य रखता है। यही उसे पशु से अलग जीव बनाता है। ऐसा नहीं है की वह अंत: प्रज्ञा से काम करता ही नहीं। करता है। सतत विचार करने के अभ्यास से ही यह सहज प्रवृत्ति विकसित हो जाती है और कई काम हम इतनी सहज वृत्ति से करते हैं कि अनायास होते जाते हैं

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कविताएं – अरुण कमल

जो देश मुझे इतना प्यारा था
वहाँ इतनी धूल है पत्तों पर मानों बरसों से बारिश नहीं हुई
और रात में भी रोशनी और हलचल से भरी सड़कें इतनी स्याह सुनसान
जैसे बरसों से कोई कभी रहा नहीं
कभी कभी लगता है मेरी आँख कमजोर हो रही है

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भाव, विचार और विचारधारा – अरुण कमल

विचार-प्रसार के भीतर ही भाव-प्रसार भी होता है - रामचंद्र शुक्ल
कविता शब्दों से लिखी जाती है,विचारों से नहीं - मलार्मे
विचार सूख जाते हैं,परंतु जीवन का वृक्ष हरा रहता है - गोयथे
अक्सर भाव और विचार को परस्पर विरोधी और विलोम माना जाता है।कुछ दार्शनिक पद्धतियों और साहित्य आंदोलनों में भाव की स्वायत्त श्रेष्ठता मानी जाती है और विचार को हीनतर अथवा अवांतर माना जाता है।

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अनेकधारा* : भाषागत विविधिता – रमाकान्त अग्निहोत्री

चाहे भाषागत व सांस्कृतिक विविधिता हो या फिर एकता, भारत को लेकर दोनों ही सबको  एक अचम्भे में डाल देती हैं. इतना विशाल देश और इतनी विविधिता पर फिर भी, किसी भी मोड़ पर, कहीं भी सम्प्रेषण टूटता नहीं. आप कन्या कुमारी से कश्मीर या गुजरात से आसाम चले जाइए, आप ट्रेन में हों या किसी धार्मिक मेले में, सम्प्रेषण नहीं रुकता. वास्तव में कहा तो यह जाता है कि हमारी विविधिता ही हमारे सम्प्रेषण का राज़ है.

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औपनिवेशिक आधुनिकता और हिंदी साहित्य – राजकुमार

यदि मान लें कि आधुनिक युग की शुरुआत उन्नीसवीं सदी में हुई तो फिर यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। उन्नीसवीं सदी से पहले हिन्दी साहित्य शिष्ट और लोकसाहित्य से संवाद करते हुए विकसित होता रहा। किन्तु उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक शासन के दौरान शिष्ट और लोक के अतिरिक्त एक अन्य तत्त्व भी जुड़ गया। इसका सम्बन्ध पश्चिमी आधुनिकता से है। उन्नीसवीं सदी में अँग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत के साथ भारतीय प्रबुद्ध वर्ग पश्चिमी आधुनिकता से परिचित हो गया। पश्चिमी ज्ञान और साहित्य का उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

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रघुवंश (कालिदास) – चौदहवें सर्ग के कुछ अंश : अनुवाद- राजकुमार

सीता का रोना सुनकर 
मोरों ने नाचना छोड़ दिया
पेड़ों ने फूल गिरा दिये
घास खा रही हरिणियों ने
अपने मुह की घास गिरा दी
सीतासम दुःख व्याप गया वन में
विलपने लगा वन ।

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विचारधारा, एकअपर्याप्त टिप्पणी – विश्वनाथ त्रिपाठी

हाल ही में कुछ वर्षों से विचारधारा की बात कम की जा रही है। आन्दोलनों को विचारधारा से आवश्यक तौर पर जोड़ा जाता था। मुझे लगता है कि अब विचारधारा में चिन्तन से ज़्यादा जोड़ा जाता है, आन्दोलन से कम। इसका कारण यह कि अब सामाजिक दृश्य पर आन्दोलन कम होते हैं, चिन्तन ज़्यादा होता है। उदाहरण के लिए भारत में ही देखिए तो दलित चिन्तन, स्त्री-चिन्तन तो खूब होता है यानी लिखा-पढ़ा बोला जाता है, किन्तु आन्दोलन कम। अब जुलूस समारोह पहले जैसा बहुत कम होते हैं, पत्रिकाओं में लेख, परिचर्चा आदि जरूर खूब होते हैं।

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मानव की सहजात है करुणा – नंदकिशोर आचार्य

जब मानव को आत्मचेतन प्राणी कहा जाता है तो उसका आशय यह होता है कि वह अपने को शेष सृष्टि से न केवल अलग अनुभव करता है, बल्क‍ि इस अलग होने पर विचार करने के साथ-साथ इस अलगाव, इस पार्थक्य के भाव को मिटाकर पुन: शेष सृष्टि से एकत्व महसूस करना तथा उसके उपायों की तलाश पर भी विचार करता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एरिक फ्राॅम का मानना है कि मानवीय आचरण को प्रभावित करनेवाले प्रबल तत्त्व उसके अस्तित्व की स्थितियों अर्थात उसके मानव होने की स्थिति में ही निहित होते हैं।

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स्वायत्तता या मूल्य हीनता से आगे का रास्ता – सुखजोत

विश्व युद्ध के दौरान बच्चों से भरा एक विमान प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरते हुए एक निर्जन और बीहड़ द्वीप पर दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। छह से बारह वर्ष की उम्र के सब बच्चे, किसी भी तरह की  रोकटोक से मुक्त, नाते रिश्तों से मुक्त, किसी भी तरह के नियम, व्यवस्था या क़ानून से मुक्त, केवल अपनी इच्छा से कुछ भी, कभी भी करने को स्वतंत्र हो जाते हैं। एक अकल्पनीय, पूर्ण आज़ादी - जो किसी भी जीव की एकमात्र चाह है। एक स्वायत् शासन - कोई नियम-मर्यादा नहीं। जहां किसी को किसी का कोई डर नहीं। जहां कोई बड़ा-छोटा नहीं।

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पंडित जी – एक संस्मरण – विभूति नारायण राय

दीपावली कहना हमेशा मुश्किल सा लगता है । दीवाली ज़्यादा सहज स्वाभाविक ढंग से बोलचाल मे निकलता है । इस दीवाली पर न जाने क्यों इंटरमीडिएट के अपने संस्कृत अध्यापक पंडित जयानन्द मिश्रा याद आ रहें हैं । उम्र के इस पड़ाव पर स्मृतियों का क्या ? आगे पीछे दौड़तीं हैं । पिछली दीवाली की चीजें धुँधली हैं पर अचानक पचास वर्ष पूर्व कालिदास के रघुवंशम को रस ले कर पढ़ाते हुये अपने अध्यापक का चेहरा पानी मे आधा डूबता आधा उतराता सा दीखता है ।

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संसार मे प्रजातंत्र : अपेक्षायें और उपेक्षायें – विभूति नारायण राय

लोकतंत्र मनुष्य के सभ्य होते जाने की गाथा है। यह एक बेहद लम्बी और तवील यात्रा है जो भिन्न भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भो मे मानव प्रजाति ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से तय की है। यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस यात्रा मे इतने उतार चढ़ाव आये हैं कि कई बार फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि हम आगे बढ़े हैं या पीछे? आदिम साम्यवाद और कबीलाई यथार्थ या यूटोपिया जैसे काल्पनिक आदर्शों से गुजरती मनुष्यता की यह यात्रा संस्थाबद्ध धर्म, व्यक्तिगत संपत्ति, परिवार और राज्य के निर्माण की साक्षी बनी।

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एक स्त्रीवादी यूटोपिया की तलाश – सविता सिंह

मेरे मन में एक गीत अपने को गाता और दोहराता रहता है- एक राह तो वो होगी....।  मेरे पहले कविता संग्रह में एक कविता है, " में तारों का एक घर". इसमें एक कल्पना है जो यथार्थ की तरह पेश की गई है। यहां एक स्त्री खुद को तारों का एक घर समझती है जिसमें कितने ही तारे उतरते हैं, लगभग हर रात। ऐसा होने से बहुत सारा प्रकाश कहीं और चला  जाता है, और ढेर सारी ऊष्मा भी। तारे स्त्री की देह में खुद को विलयित करने आते हैं, मनुष्यों की तरह अपनी देह छोड़ने।

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 तकनीकी तीव्रता और दैनिक जीवन की व्यर्थता – गगन सेठ

गर्मियों की छुट्टियों में पहाड़ पर सैलानियों की भीड़। झील के किनारे बैठे हर उम्र के लोग। गंगा किनारे की भीड़। गोवा में समुद्र किनारे रेत पर खेलते बच्चे और व्यस्क। लम्बे दिन के काम के बाद घर आकर सोफे पर पसरे लोग। सारा दिन स्कूल से पढ़ कर घर आये बच्चे। बच्चे को पार्क में घूमती मां - और भी ऐसे ही कई दृश्य जो हमारी ज़िंदगी को एक रौनक, रंग और संगीत से भरे रखते हैं। सब मोबाइल फ़ोन में कंप्यूटर और इंटरनेट के सैलाब में डूबते जा रहे हैं। किसी को फुर्सत नहीं। सभी हर वक्त, हर दृश्य में, मोबाइल पर कुछ लिखते, बात करते या फोटो /सेल्फी लेते दीख जायेंगे। मुद्दत बाद मिले मित्र या सगे लोग, सभी मोबाइल पर व्यस्त। सभी उस मशीन जैसे ही लगते हैं जिस में वे खोये रहते हैं।

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संस्मरण : ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला –  मधु कांकरिया  

इस सदी की सबसे खूबसूरत तस्वीर  यह तस्वीर अफगानिस्तान सेना के एक जाबांज शहीद मेजर अब्दुल रहीम की है। वर्ष 2020 में काबुल में हुए एक बम विस्फोट में मेजर अब्दुल रहीम शहीद हो गए थे। बम निरोधक विशेषज्ञ मेजर अब्दुल रहीम ने 2012 में बम डिफ्यूज करते समय अपने दोनों हाथ खो दिए थे। करीब दो हजार से अधिक बम डिफ्यूज करने वाले अब्दुल को तीन साल बाद भारत में नए हाथ मिले। ये हाथ उन्हें कोच्चि के टीजी जोसेफ से दान में मिले थे। जोसेफ सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड हो गए थे।

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कहानी : झूठे थे वे माफ़ीनामे! – मधु कांकरिया

अम्मा जी आसमान बन चुकी थी। धरती पर लावारिस सी पड़ी उनकी डायरी पर  एकाएक मेरी नज़र  पड़ गयी थी। डायरी का पहला पृष्ठ खोला। उसके बीचो बीच लिखा हुआ था ;   ‘वापस लेती हूँ उन माफियों को जिन्हें मुझे परिवार से मजबूरन मांगनी पड़ी ,पर सच्चे मन से मैंने कभी नहीं मांगी वे माफियां क्योंकि मेरी जिन आवाज़ों को दबाया गया वे  सिर्फ़ सच्चाइयों की बुलंद आवाज़ थी ,लेकिन दवाब में मुझे अपनी सच्ची आवाज़ के लिए भी  'सॉरी ‘ कहना पड़ा लेकिन वे  सिर्फ़ मेरे अल्फाज थे रूह से निकले जज्बात नहीं। 

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कहानी – बाघ, एक रात – रवि बुले

डर से अगर आप डर गए तो वह पीछे लग जाता है। बाघ की तरह। तब वह आपके पीछे दबे पांव चल पड़ता है। आपका शिकार करने के लिए। यह तर्क बेकार हो जाता है कि अगर आप उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखते रहेंगे तो वह हार कर चुपचाप लौट जाएगा। मौका पाते ही वह आपके जिस्म में अपने पैने-लंबे दांत गड़ा देता है और खून में उतर जाता है। एक-एक बूंद में समा जाता है। फिर आप उससे कभी मुक्त नहीं हो सकते। वह पल-पल मौत की तरह सिर पर मंडराता है... वही जिंदगी बन जाता है...! मौत से खौफजदा जिंदगी...!!

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हाऊ इज द जोश! रवि बुले

सबके दिमाग में अपनी-अपनी पिच्चर चल्लई है... सब साले हीरो बनना चाह रहे हैं अपनी पिच्चर में। इ साला हिंदुस्तान में जब तक सनीमा है... लोग चूतिया बनते रहेंगे।
-रामाधीर सिंह, गैंग्स ऑफ वासेपुर-2, 2012
हिंदुस्तान के लोगों के बारे में क्या यह सिर्फ सस्ता-सा फिल्मी ‘ऑब्जर्वेशन’ है, फिल्म में रामाधीर सिंह बताता है कि वह इसलिए नहीं वासेपुर पर राज कर रहा ‘काहे कि असली बाहुबली है’ बल्कि वह सनीमा नहीं देखता। मतलब सनीमा देखने वाले धोखे में जी रहे हैं। इसी धोखे में आदमी वासेपुर का कबूतर बन जाता है और ‘यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ता है और दूसरे से अपना इज्जत बचाता है।’

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जन आंदोलन में बॉब डिलन के गीतों की भूमिका – भवी सिंह

Bob Dylan हमारे समय के शीर्ष गायक, संगीतकार और विद्रोही कवि के रूप में सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, विश्व भर में समादृत हैं । उन्होंने गीतों के अतिरिक्त दो पुस्तकें गीत साहित्य के दर्शन पर भी लिखी हैं।  केवल गीतकार या गायक होना ही उनकी विश्वव्यापी प्रसिद्धि का कारण नहीं है । अपने समय की देह और आत्मा को अपनी विद्रोही रचनाओं की शक्ति से इस तरह उद्वेलित करने वाले कवि - गायक किसी भी समाज में बहुत कम होते हैं। अमेरिका का अश्वेत आंदोलन जहां मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं से प्रेरित- संचालित था, वहां अन्याय के खिलाफ बॉब डिलन के गीत जनसमुदाय के मन मस्तिष्क को विचलित कर रहे थे। ऐसा वातावरण था कि कुछ भी हो सकता है।  सम्भवनाओं का ऐसा विस्तृत आसमान बॉब डिलन के विद्रोही गीतों ने पैदा किया कि  भीतरी बाहरी सब कुछ थिरक उठा।    
                                                                                                  -संपादक

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दो कविताएं – कृष्ण किशोर

यह तांबई रंग का चांद कब ऊपर उठेगा
कब खिलेगा पूर्ण गोलाकार चांदी का कमल आकाश में
कब मुझे ऐसा लगेगा कि मैं सुरक्षित हूं
कि अब कोई नहीं आवाज देगा मुझे कहीं से भी
और मैं दूर तक आकाश जैसा फैल जाऊंगा
रिक्त हो कर बिखर जाऊंगा

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शख्सियत : जौहर की गत जौहरी जाने – मीना बनर्जी

राशिद ख़ान! राशिद ख़ान!- भई क्या आवाज पाई है और क्या अंदाज़ है। जो भी सुने, इन बातों का कायल हुए बिना नही रह सकता। सो चाहने वालों की कमी भी नहीं। वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, कवि, संगीतकार या फिर विद्यार्थी, दुकानदार यहाँ तक कि टैक्सी चालक तक। इंदीपॉप और फिल्मी गानों के इस दौर में शास्त्रीय गायक की ऐसी लोकप्रियता से आश्चर्य? नहीं, राशिद के संगीत की तासीर ही कुछ ऐसी है।

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